बचपन की स्मृतियों में बसा आम का खास स्वाद
आम की भारत में 1000 से अधिक किस्में उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ ही किस्मों की बागवानी की जाती है, जो कि ज्यादातर स्वाद और साइज के कारण हैं। जंगली किस्में चूसने वाले हैं, परंतु इनमें मिनरल कंटेंट अधिक होता है। सन 2020 में में जिला सरगुजा में अंबिकापुर से करीब चालीस किलोमीटर दूर एक गांव में जाकर 15 दिन रहा। आसपास अन्य पेड़ों के अलावा आम्रकुंजों की बहुतायत है। प्रत्येक सुबह झोला निकल जाते और घंटा भर में इसे भर कर ले आते। करीब पांच-सात किलो। इससे पहले ऐसे आम सिर्फ नाना के बाग से खाए थे, लेकिन नाना ने छह बीघा की बाग को सन 1961 में कटवा दिया, क्योंकि पेड़ों पर आम लगने कम हो गए थे।
आम से शानदार इमारती लकड़ी मिलती है, जिसमें कभी कीड़ा नहीं लगता। मैंने बहुत अच्छी किस्म के आम हिमाचल प्रदेश के जिला मंडी में भी खाए हैं। यूपी में अभी बहुत बाग हैं। जिला शाहजहांपुर में आमों के बहुत बाग हैं और मलिहाबाद के आसपास तो दशहरी आम के आम्रकुंजों की संख्या इतना है कि हम गिन नहीं सकते कितनी संख्या में पेड़ होंगे। मलिहाबादी दशहरी खूब एक्सपोर्ट होता है। लंदन में मलिहाबादी एक सुंदर और रसदार आम की कीमत डेढ़-दो पौंड से कम नहीं। पाकिस्तान (पंजाब) और सिंध प्रांत में सिंधु दरिया के तटवर्ती क्षेत्रों में आम खूब होता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् और नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड आम की किस्मों और इसके व्यापार पर नजर रखता है। फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री आमरस का खूब उत्पादन करती है और आचार डालने वाली इंडस्ट्रीज को भी यह काफी मात्र में चाहिए। आम पापड़ भी बनाकर बेचा जाता है, लेकिन कच्चे आम की पन्नी जिसे शुद्ध गुड़ डालकर बनाया गया हो या मुरब्बा बेहद स्वादिष्ट होता है। यह पौष्टिक होता है। एक बार एक मित्र की मां ने कच्चे आमों को भूभल अथवा गर्म राख का ढेर में भून कर छील कूट कर पन्ना बनाया। इसका स्वाद बिल्कुल अलग थी। मुझे एक गिलास पीने को दिया। तृप्ति की जो फीलिंग इसे पीकर आई थी वह शायद अमृत के सन्निकट थी।
अल्फांसो (हैप्पस) आम अच्छा है, मैंने खाया है और कुछ-कुछ यह दशहरी-लंगड़ा आम के स्वाद जैसा है, लेकिन मैं इसे प्रेफर नहीं करता। यह देश के महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और मध्य प्रदेश प्रांतों में होता है। फल मध्यम आकार के, अंडाकार आकार में तिरछे, नारंगी पीले रंग के जिसमे गूदा और रस मध्यम-प्रचुर मात्रा में होता है। उत्कृष्ट रखरखाव गुणवत्ता, लुगदी बनाने और डिब्बाबंदी के लिए यह अच्छा है और मुख्य रूप से अन्य लोगों को ताजा फल के रूप में निर्यात किया जाता है। तोतापुरी आम देश में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु में होता है। फल मध्यम-बड़े, आयताकार आकार, नुकीले आधार और सुनहरे पीले रंग के होते हैं। बंगनपल्ली बनेशान, सफेदा आम आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में खूब होता है। फल बड़े आकार के, तिरछे अंडाकार आकार के, सुनहरे पीले रंग के होते हैं और गदराया फल बहुत मीठा होता है।
बॉम्बे ग्रीन नाम का आम उत्तर प्रदेश और हरियाणा में होता है। इस फल का आकार मध्यम, आकार अंडाकार और पालक हरे रंग का होता है। यह शुरुआती सीज़न की किस्म है। केसर आम गुजरात की नस्ल है। इसका फल मध्यम आयताकार, कंधों पर लाल ब्लश के साथ दिखने में आकर्षक लगता है, लेकिन इसमें पकने के बाद मिठास के साथ खटास भी होती है। लंगड़ा आम का नाम बनारसी लंगड़ा भी है। इसके बाग उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और पंजाब में हैं, लेकिन बनारस के आसपास गंगा के पानी के प्रभाव से जो आम पैदा होता है वह बेहद मीठा और रेशेदार होता है।
शेरशाह सूर ने एक आम को समरबहिश्त चौसा नाम दिया था। चौसा वही जगह ही जहां शेरशाह ने हुमायूं को हराया था और वह जान बचाकर भागा था। एक बार में चौसा के निकट से गुजरा था और वहां तब पेड़ आमों से लदे हुए थे। शायद मई महीने के अंतिम दिनों की बात है। मिर्ज़ा ग़ालिब ने एक बार मजाक में अपने मित्र से कहा भी थी कि 'गधे आम नहीं खाते', लेकिन चौसा से जुड़ा एक वाकया मुझे याद है। मेरे गांव ने निकट से एक बड़ी नहर बहती है। इस पर एक नहरी कोठी हुआ हुआ करती, जिसकी देखरेख नहर विभाग करता था। यह अंग्रेजी स्टाइल का बंगला था और इसे अंग्रेजों का इंस्पेक्शन बंगला कहते थे। शायद सन 1930-1935 में बनाया गया था, जिसकी ईमारत कमज़ोर होने के बाद इसे तोड़ दिया गया।
इसके लिए चारों तरफ चार एकड़ जमीन होती थी, जिसमें चौसा आम के बीसियों और अमरूद के चालीसों पेड़ थे। बात शायद 1966-1967 के आसपास की है। कुनबे के हम सब बालक खेत से वैसी के दौरान नहर में नहाने में पुल के ऊपर चढ़कर नीचे पानी में कूदते थे और दूर तक तैरते थे। मेरे ताऊ का पुत्र और मैं अचानक गीले बदन, सिर्फ कच्छे में ही कोठी के चौकीदार के पास गए और कहा कि 'काका, आम खाने हैं'। उसने एक बाल्टी भर हमें बीसियों आम दिया। बाल्टी से रस्सी बंधी थी। मैंने आमों से भरी बाल्टी को नहर के चलते पानी में लटका दिया। घंटा भर में वे ठंडे हो गए। फिर इन्हें खाया। जो आनंद तब आया था वह जिंदगी में चौसा खाकर फिर कभी नहीं आया। आम हर किसी को पसंद है और सीजन में उपलब्ध किस्मों -अलफोंसो, लंगड़ा, चौसा, सफेदा और दशहरी, में से कम से कम पांच किलो जरूर खाना चाहिए। मैं शायद दस किलो खा लेता हूं।
भारत की फूड प्रोसेसिंग इंडस्ट्री चार से पांच लाख मीट्रिक टन आम से पल्प बनाकर अनेक तरह के पेय, मुरब्बा और आम पापड़ बनाती है। हमारी फ़ूड इंडस्ट्री करीब साढ़े तीन लाख मीट्रिक टन आम का गूदा हर साल एक्सपोर्ट करती है। भारत की फ़ूड इंडस्ट्री द्वारा आम फल की प्रोसेसिंग के बाद इसके प्रोडक्ट्स की कीमत करीब 4500 करोड़ रुपये मूल्य होती है। इसमें से तीन हज़ार करोड़ रुपए के प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट किये जाते हैं। भारत की मिनिस्ट्री ऑफ़ फ़ूड एंड एग्रीकल्चर के अन्तरगत डायरेक्टरेट ऑफ़ एक्सटेंशन की फ़ार्म इनफार्मेशन यूनिट जुलाई 1955 में 90 पन्ने की एक किताब द मेंगो इन इंडिया प्रकाशित की थी जिसका मूल्य सिर्फ पचास पैसे था। इसके दो साल बाद मंत्रालय ने ही ‘द मेंगो’ 540 पन्नों की किताब प्रकाशित की।
