विश्व जैव विविधता दिवस : विलुप्त होती प्रजातियां और मानव सभ्यता का संकट

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Published By Anjali Singh
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धरती पर जीवन का अस्तित्व किसी एक जीव, वनस्पति अथवा मानव सभ्यता पर आधारित नहीं है। पृथ्वी का संपूर्ण जीवन तंत्र असंख्य जीवों, वनस्पतियों, सूक्ष्म जीवों, नदियों, पर्वतों, जंगलों और जलवायु के बीच स्थापित संतुलन पर टिका हुआ है। यही संतुलन जैव विविधता कहलाता है। भारतीय ज्ञान परंपरा में प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि चेतना का स्वरूप माना गया है। अथर्ववेद का यह वाक्य- “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” आज के पर्यावरण विज्ञान की उस मूल अवधारणा को व्यक्त करता है, जिसे आधुनिक विश्व “इकोलॉजिकल इंटरडिपेंडेंस” अर्थात पारिस्थितिक पारस्परिकता के नाम से जानता है। भारतीय सनातन संस्कृति ने हजारों वर्ष पूर्व ही यह स्वीकार कर लिया था कि पृथ्वी पर स्थित प्रत्येक जीव, वनस्पति, नदी, पर्वत और वन एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। 

आज विश्व जैव विविधता दिवस ऐसे समय में मनाया जा रहा है, जब पृथ्वी अभूतपूर्व पर्यावरणीय संकट से गुजर रही है। जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित शहरीकरण, वनों की कटाई, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने जैव विविधता के अस्तित्व को गंभीर खतरे में डाल दिया है। वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि यदि यही स्थिति जारी रही तो आने वाले दशकों में पृथ्वी अनेक महत्वपूर्ण जीव प्रजातियों को सदा के लिए खो देगी। यह संकट केवल वन्यजीवों का नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव सभ्यता के अस्तित्व का संकट है। जब किसी क्षेत्र में विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु, वृक्ष, वनस्पतियां और सूक्ष्म जीव संतुलित रूप से विद्यमान रहते हैं, तब वहां की पारिस्थितिकी स्थिर रहती है। किंतु वर्तमान समय में यही जैव विविधता मानव गतिविधियों के कारण गंभीर संकट में पहुंच चुकी है। 

विश्व जैव विविधता दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि यह चेतावनी है कि यदि पृथ्वी की जैव विविधता समाप्त हुई, तो मानव सभ्यता का भविष्य भी सुरक्षित नहीं रहेगा और यह स्पष्ट हो चुका है कि पृथ्वी वर्तमान समय में छठे महाविलुप्ति काल की ओर बढ़ रही है और इस बार इसका सबसे बड़ा कारण स्वयं मनुष्य है। 

भारत में जैव विविधता की स्थिति : संयुक्त राष्ट्र तथा अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थाओं के अनुसार वर्तमान समय में प्रतिदिन अनेक प्रजातियां पृथ्वी से हमेशा के लिए समाप्त हो रही हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राकृतिक परिस्थितियों में किसी प्रजाति के विलुप्त होने की गति अत्यंत धीमी होती है, किंतु आज यह गति सैकड़ों गुना बढ़ चुकी है। जंगलों की कटाई, नदियों का प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक कचरा, रासायनिक खेती, अवैध शिकार और अनियंत्रित औद्योगीकरण ने प्रकृति के संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है। भारत विश्व के उन देशों में है, जहां जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। उत्तर प्रदेश का तराई क्षेत्र, हिमालय, पश्चिमी घाट और सुंदरवन विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण पारिस्थितिक क्षेत्र माने जाते हैं, किंतु यही क्षेत्र आज सबसे अधिक दबाव झेल रहे हैं। यदि हाल के वर्षों में संकटग्रस्त हुई प्रजातियों पर दृष्टि डालें तो अनेक चौंकाने वाले उदाहरण सामने आते हैं। 

भारत में पाई जाने वाली ग्रेट इंडियन बस्टर्ड अर्थात गोडावण आज विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है। कभी राजस्थान और गुजरात के घास के मैदानों में बड़ी संख्या में पाए जाने वाले ये विशाल पक्षी अब बहुत कम रह गए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार बिजली की ऊंची तारें और घास के मैदानों का कृषि भूमि में बदल जाना इसके सबसे बड़े कारण हैं। यह पक्षी ऊंचे तारों को पहचान नहीं पाता और उनसे टकराकर मर जाता है। वैज्ञानिक तथ्य यह है कि यह प्रजाति वृक्षों की सतत श्रृंखला पर निर्भर रहती है। जब जंगलों के बीच सड़कें या कटान हो जाता है, तब इनके लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना कठिन हो जाता है।

पारिस्थितिक संतुलन की अनदेखी : वनस्पतियों की बात करें तो हिमालयी क्षेत्र में मिलने वाला हिमालयी यू वृक्ष अत्यधिक कटाई के कारण संकट में है। इस वृक्ष से कैंसर उपचार में उपयोग होने वाली औषधियां बनाई जाती हैं। इसी प्रकार पश्चिमी घाट की दुर्लभ वनस्पति नीलकुरिंजी जलवायु परिवर्तन और पर्यटन के दबाव से प्रभावित हो रही है। यह पौधा बारह वर्षों में एक बार फूल देता है और इसका फूलना संपूर्ण पारिस्थितिक तंत्र के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ते तापमान ने इसके प्राकृतिक चक्र को प्रभावित किया है।

समुद्री जैव विविधता भी गंभीर संकट में है। पृथ्वी का बढ़ता तापमान अब केवल मौसम परिवर्तन का विषय नहीं रह गया, बल्कि यह जैव विविधता विनाश का मुख्य कारण बन चुका है। जंगलों की कटाई सबसे विनाशकारी मानवीय गतिविधियों में से एक है। परिणामस्वरूप मिट्टी की गुणवत्ता घट रही है और कृषि अधिक कृत्रिम संसाधनों पर निर्भर होती जा रही है।

 -डॉ. जितेंद्र शुक्ला वन्य जीव विशेषज्ञ