पृथ्वी बनते समय का जीवन

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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जीवाश्म (फॉसिल) वे अवशेष या निशान होते हैं, जो किसी प्राचीन जीव (पौधे या जानवर) के मरने के बाद लाखों-करोड़ों वर्षों तक चट्टानों में सुरक्षित रह जाते हैं। सरल शब्दों में, पत्थरों में कैद प्राचीन जीवन की कहानी जीवाश्म हैं। जीवाश्म हमेशा पूरे जीव के नहीं होते, बल्कि ये कई तरह के हो सकते हैं, जैसे हड्डियां या दांत (डायनासोर की हड्डियां जैसे), खोल या कवच (सीप या घोंघे), पत्तियों या लकड़ी की छाप, पदचिह्न, चलने के निशान, शरीर की छाप (जैसे एडिआकारन बायोटा के जीव)। एडिआकारन बायोटा अब तक खोजे गए सबसे अजीब जीवाश्मों में गिने जाते हैं। 

हम इनकी चर्चा करें, उससे पहले जान लेते हैं कि आखिर जीवाश्म बनते कैसे हैं? जब कोई जीव मरता है, वह मिट्टी, रेत या कीचड़ में दब जाता है। समय के साथ उसके ऊपर और परतें जमती जाती हैं। दबाव और रसायनों से वे अवशेष पत्थर जैसे हो जाते हैं और लाखों साल बाद वही पत्थर जीवाश्म बन जाता है। अब बात करते हैं कि एडिआकारन बायोटा जीवाश्मों में अजीब क्या है? जियोलॉजिकल सोसाइटी आॅफ अमेरिका के स्रोत बताते हैं कि ये कोमल, मुलायम शरीर वाले जीव थे, जिनके जीवाश्म आश्चर्यजनक रूप से अत्यंत सूक्ष्म विवरणों के साथ सुरक्षित मिले हैं, ऐसी चट्टानों में जहां सामान्यतः ऐसा संरक्षण संभव ही नहीं माना जाता। अब वैज्ञानिकों का मानना है कि रेत-पत्थर (सैंडस्टोन) में इनका बच पाना प्राचीन समुद्री जल की असामान्य रसायनिकी का परिणाम था, जिसने दफन होने के बाद इनके चारों ओर मिट्टी जैसे ‘सीमेंट’ बना दिए। इसी प्रक्रिया ने उन नाजुक आकृतियों को कैद कर लिया, जो सामान्यतः मिट जातीं। यह खोज यह समझने में मदद करती है कि कैंब्रियन विस्फोट से पहले जटिल जीवन कैसे उभरा।

विचित्र छाप-जीवाश्म- जिन जीवों के पास कठोर खोल या हड्डियां नहीं होतीं, जैसे जेलीफिश, वे लगभग कभी भी जीवाश्म रिकॉर्ड में सुरक्षित नहीं रह पाते। रेत-पत्थर में संरक्षण और भी कठिन होता है, क्योंकि यह मोटे कणों से बनी चट्टान होती है, जिसमें पानी आसानी से बह जाता है। यह चट्टान आमतौर पर लहरों और तूफानों से प्रभावित अशांत वातावरण में बनती है। ऐसे हालात में नाजुक जैविक अवशेष जीवाश्म बनने से बहुत पहले नष्ट हो जाते हैं। फिर भी, लगभग 57 करोड़ वर्ष पहले, पृथ्वी के इतिहास के एक चरण में, जिसे एडिआकारन काल कहा जाता है, कुछ असाधारण हुआ। समुद्र तल पर रहने वाले कोमल शरीर वाले जीव रेत में दब गए और अभूतपूर्व सटीकता के साथ संरक्षित हो गए। उनके विस्तृत छाप-जीवाश्म आज भी वैज्ञानिकों को हैरान कर देते हैं। लगभग 63.5 करोड़ वर्ष पहले से, लगभग 54.1 करोड़ वर्ष पहले तक, एडिआकारन काल पृथ्वी के इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण था। एडिआकारन काल में पहला बड़ा बहुकोशिकीय जीवन की बात करें इसमें पहली बार बड़े, जटिल और आंखों से दिखने वाले जीव प्रकट हुए। इस काल में कोमल शरीर वाले जीवन की बात करें, तो अधिकांश जीवों के पास न हड्डियां थीं, न कठोर खोल थे और त्रि-सममिति, सर्पिल, पत्तीनुमा और फ्रैक्टल जैसी विचित्र संरचनाएं थीं। अतः एडिआकारन काल वह समय था जब जीवन ने पहली बार जटिल बनने की हिम्मत की। यह प्रीकैम्ब्रियन युग का अंतिम काल था, जिसके बाद कैंब्रियन काल शुरू हुआ। 

जीवाश्म रिकॉर्ड  और परिस्थितियां

यह खोज उस पुरानी धारणा को चुनौती देती है कि आखिर एडिआकारन बायोटा इसलिए सुरक्षित कैसे रहे, क्योंकि उनके शरीर असाधारण रूप से मजबूत या रासायनिक रूप से प्रतिरोधी थे। इसके बजाय, अब यह स्पष्ट होता है कि इनका जीवाश्म रिकॉर्ड में बच पाना जैविक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय परिस्थितियों पर निर्भर था। येल विश्वविद्यालय की जीवाश्म विज्ञानी डॉ. लिडिया टार्हन और उनके सहयोगियों के अनुसार, “प्राचीन समुद्री जल और तलछट की रासायनिकी ही इस असाधारण संरक्षण की असली कुंजी थी।” टार्हन कहती हैं, “यह समझाना मुश्किल है कि प्रीकैम्ब्रियन काल के सूक्ष्म, मुख्यतः सूक्ष्मजीवी जीवन से एडिआकारन बायोटा और कैंब्रियन विस्फोट में दिखने वाले बड़े और जटिल जीवों तक का परिवर्तन कितना नाटकीय था। इस पूरे अंतराल में जीवाश्मीकरण की प्रक्रियाओं की बेहतर समझ हमें न केवल एडिआकारन बायोटा के उदय, बल्कि एडिआकारन काल के अंत में उनके लुप्त हो जाने के कारणों का भी अधिक ठोस मूल्यांकन करने में मदद करेगी।”

कैंब्रियन विस्फोट से पहले 

ये जीव कैंब्रियन विस्फोट से केवल कुछ करोड़ वर्ष पहले जीवित थे। कैंब्रियन विस्फोट के दौरान जटिल व विविध पशु जीवन का तेजी से उदय हुआ। लंबे समय तक इसे एक अचानक हुई जैविक क्रांति माना जाता रहा, लेकिन अब वैज्ञानिक इसे एक लंबी, धीरे-धीरे तैयार हुई प्रक्रिया का परिणाम मानते हैं। येल विश्वविद्यालय की जीवाश्म विज्ञानी डॉ. लिडिया टार्हन इस प्रक्रिया को ‘लॉन्ग फ्यूज’ यानी लंबा फ्यूज कहती हैं, जिसमें एडिआकारन बायोटा जानवरों के आकार, जटिलता और पारिस्थितिक भूमिकाओं के क्रमिक विस्तार का एक शुरुआती चरण दर्शाते हैं। कुल मिलाकर यह काल जटिल पशु जीवन के लिए ‘भूमिका तैयार करने वाला मंच’ था।  आज, इन जीवों के जीवाश्म, जिन्हें सामूहिक रूप से एडिआकारन बायोटा कहा जाता है, दुनियाभर के विभिन्न स्थानों पर पाए गए हैं। रेत-पत्थर में इनका असामान्य संरक्षण वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से जिज्ञासा का विषय रहा है। जीवाश्म विज्ञानी डॉ. लिडिया टार्हन कहती हैं, “एडिआकारन बायोटा दिखने में पूरी तरह अजीब लगते हैं। कुछ में त्रि-त्रिज्यीय सममिति होती है, कुछ में सर्पिल भुजाएं, तो कुछ में फ्रैक्टल जैसे पैटर्न। पहली बार देखने पर यह समझना बेहद मुश्किल होता है कि इन्हें जीवन के वृक्ष में कहां रखा जाए?”

जीवाश्मीकरण की अनोखी प्रक्रिया

इन जीवों का संरक्षण कैसे हुआ, यह समझना उनके विकासक्रम में स्थान को जानने के लिए बेहद ज़रूरी है। डॉ. लिडिया टार्हन और उनके सहयोगियों, थॉमस एच. बोएग और बोरियाना काल्डेरॉन-असाएल द्वारा किया गया एक हालिया अध्ययन, जो ‘जियोलाॅजी’ पत्रिका के 15 दिसंबर, 2025 के अंक में प्रकाशित हुआ, इस प्रक्रिया पर नई रोशनी डालता है। अध्ययन का शीर्षक है ‘ऑथिजेनिक क्लेज़ शेप्ड एडिआकारा-स्टायल एक्सेप्शनल फाॅसिलाइज़ेशन’। इस शोध में डॉ. टार्हन कहती हैं कि यदि हमें पृथ्वी पर जटिल जीवन की उत्पत्ति को समझना है, तो एडिआकारन बायोटा उस यात्रा का एक निर्णायक बिंदु हैं। यह जानना बेहद जरूरी है कि असाधारण जीवाश्मीकरण के पीछे कौन-सी प्रक्रियाएं काम करती थीं ताकि हम यह बेहतर ढंग से आंक सकें कि ये जीवाश्म प्राचीन समुद्री जीवन की कितनी सटीक तस्वीर पेश करते हैं।

जहां मिले रहस्यमय जीवाश्म

एडिआकारन बायोटा पृथ्वी के इतिहास के सबसे रहस्यमय और विचित्र जीवाश्मों में गिने जाते हैं। इनकी विचित्रता है-इनकी आकृतियों की अजीब दुनिया और इनका कोमल शरीर, फिर भी जीवाश्म! इन जीवों के पास न हड्डियाँ थीं और न खोल या कवच, फिर भी इनके शरीर की नाज़ुक छापें रेत-पत्थर में सुरक्षित मिलती हैं। यह बात अपने आप में चकित करने वाली है, क्योंकि सामान्यतः ऐसे कोमल जीव जीवाश्म नहीं बन पाते। अधिकांश एडिआकारन जीवाश्म शरीर की छाप (इंप्रेशन्स) के रूप में मिलते हैं, जैसे किसी नरम चीज़ को गीली मिट्टी पर रखकर हटा लिया गया हो। यह बताता है कि ये जीव समुद्र तल पर चिपककर या लेटकर रहते थे। एडिआकारन बायोटा के जीवाश्म दुनिया भर में, जेसे ऑस्ट्रेलिया, रूस, कनाडा, भारत, नामीबिया जैसे कई देशों में मिले हैं। भारत में एडिआकारन बायोटा के जीवाश्म मूलतः मध्य प्रदेश (भिंबेठका) और पश्चिमी राजस्थान (जोधपुर सैंडस्टोन) के प्राचीन तलछटों में शोध के रूप में पाए जाने का दावा किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि ये जीव वैश्विक स्तर पर फैले हुए थे। वैज्ञानिकों के लिए अब भी ये पहेली है क्यों वे अब तक निश्चित रूप से नहीं बता पाए हैं कि ये जीव आधुनिक जानवरों के पूर्वज थे या नहीं? या ये जीवन की कोई अलग, अब विलुप्त शाखा थे! इसी कारण इन्हें कभी-कभी “प्रयोगात्मक जीवन” (एक्सपेरिमेंटल लाइफ फाॅम्र्स) भी कहा जाता है।


डॉ. इरफान ह्यूमन