देवगढ़ : सांस्कृतिक चेतना और शिल्प कौशल के अद्भुत स्वरूप की यात्रा
उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित ललितपुर जिले में बेतवा नदी के किनारे स्थित देवगढ़ एक ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल है। यह स्थान अपनी प्राचीन बौद्ध गुफाओं, गुप्तकालीन दशावतार मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यहां विष्णु भगवान को समर्पित दशावतार मंदिर स्थापत्य कला की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है और उत्तर भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में गिना जाता है। इस मंदिर में भगवान विष्णु के 10 अवतारों को प्रदर्शित किया गया है। ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर गुप्त काल में बना था। मंदिर अब एएसआई द्वारा संरक्षित है, लेकिन यहां भगवान विष्णु के दस अवतार के दर्शन किए जा सकते हैं।
लाल बलुआ पत्थर से बना दशावतार मंदिर शिखरयुक्त ‘पंचायतन’ शैली में बने मंदिरों में प्राचीनतम है, इसका निर्माण सन् 470 में भारतीय इतिहास के स्वर्ण युग में हुआ था। एक ऊंचे चबूतरे पर चढ़कर जब प्रवेश द्वार पर पहुंचते हैं, तो हमें द्वार के दोनों ओर बनी गंगा और यमुना की मूर्तियां सहज ही आकृष्ट करती हैं। गर्भगृह के अंदर प्रवेश संभव नहीं है। मंदिर के चारों ओर पौराणिक कथाओं को अभिव्यक्त करती नृत्य मूर्तियों से सजाया गया है। गजेन्द्र मोक्ष, नर नारायण तपस्या तथा शेषसाई विष्णु की प्रतिमाएं बहुत ही आकर्षक हैं। अचंभित करने वाले फलक में विष्णु अपनी चिर-परिचित मुद्रा में शेषनाग की शैय्या पर लेटे हैं, ऊपर की ओर कार्तिकेय अपने मयूर पर आरूढ़, ऐरावत पर बैठे इन्द्र, कमल पर ब्रह्मा तथा नंदी पर उमा-महेश्वर बैठे हुए दृष्टिगोचर होते हैं। शैय्या के नीचे पांच पांडवों को द्रौपदी सहित दर्शाया गया है। ऐसा दृश्य किसी और मंदिर में नहीं है। 7 वीं या 8 वीं शताब्दी के कुछ शिव मंदिरों में पांडवों को जरूर दर्शाया गया है। दशावतार मंदिर को देखकर लगता है कि प्रारंभ में इसमें अन्य गुप्त कालीन देवालयों की भांति ही गर्भगृह के चतुर्दिक पटा हुआ प्रदक्षिणा पथ रहा होगा। मंदिर के एक के बजाए चार प्रवेश द्वार थे और उन सबके सामने छोटे-छोटे मंडप तथा सीढ़ियां थीं। चारों कोनों में चार छोटे मंदिर थे। इनके शिखर आमलकों से अलंकृत थे, क्योंकि खंडहरों से अनेक आमलक प्राप्त हुए हैं। प्रत्येक सीढ़ियों की पंक्ति के पास एक गोखा था। मुख्य मंदिर के चतुर्दिक कई छोटे मंदिर थे, जिनकी कुर्सियां मुख्य मंदिर की कुर्सी से नीची हैं। ये मुख्य मंदिर के बाद में बने थे। इनमें से एक पर पुष्पावलियों तथा अधोशीर्ष स्तूप का अलंकरण अंकित है। यह अलंकरण देवगढ़ की पहाड़ी की चोटी पर स्थित मध्ययुगीन जैन मंदिरों में भी प्रचुरता से प्रयुक्त है।
गुप्तकालीन वास्तु कला की महत्वपूर्ण संरचना
दशावतार मंदिर में गुप्त वास्तु कला के प्रारूपिक उदाहरण मिलते हैं, जैसे, विशाल स्तंभ, जिनके दंड पर अर्ध अथवा तीन चौथाई भाग में अलंकृत गोल पट्टक बने हैं। ऐसे एक स्तंभ पर छठी शती के अंतिम भाग की गुप्त लिपि में एक अभिलेख पाया गया है, जिससे उपर्युक्त अलंकरण का गुप्त कालीन होना सिद्ध होता है। इस मंदिर की वास्तु कला की दूसरी विशेषता चैत्य वातायनों के घेरों में कई प्रकार के उत्कीर्ण चित्र हैं। इन चित्रों में प्रवेश द्वार या मूर्ति रखने के अवकाश भी प्रदर्शित हैं। इनके अतिरिक्त सारनाथ की मूर्तिकला का विशिष्ट अभिप्राय स्वस्तिकाकार शीर्ष सहित स्तंभयुग्म भी इस मंदिर के चैत्यवातायनों के घेरों में उत्कीर्ण है। दशावतार मंदिर का अल्पविकसित शिखर ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण संरचना है।
देवगढ़ के मंदिर का शिखर अधिक ऊंचा नहीं है, वरन इसमें क्रमिक घुमाव बनाए गए हैं। इस समय शिखर के निचले भाग की गोलाई ही शेष है, किंतु शिखर का आभास मिल जाता है। शिखर के आधार के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ की सपाट छत थी, जिसके किनारे पर बड़ी व छोटी खिड़कियां थीं, जैसा कि महाबलीपुरम के रथों के किनारों पर हैं। द्वार मंडप दो विशाल स्तंभों पर आधृत था। मंदिर के चारों ओर भी गुप्त कालीन मूर्तिकारी का वैभव अवलोकनीय है। रामायण और कृष्ण लीला से संबंधित दृश्यों का चित्रण बहुत ही कलापूर्ण शैली में प्रदर्शित है।
8 वीं से 18 वीं शती के 300 अभिलेख
देवगढ़ में कुल मिलाकर लगभग 300 अभिलेख मिले हैं, जो 8 वीं शती से लेकर 18 वीं शती तक के हैं। इनमें ऋ षभदेव की पुत्री ब्राह्मी द्वारा अंकित अठारह लिपियों का अभिलेख तो अद्वितीय ही है। चंदेल नरेशों के अभिलेख भी महत्वपूर्ण हैं।
पहाड़ी के नीचे बहता है बेतवा नदी का सौंदर्य
देवगढ़ बेतवा नदी के तट पर स्थित है। तट के निकट पहाड़ी पर 24 मंदिरों के अवशेष हैं, जो 7 वीं शती से 12 वीं शती तक बने थे। देवगढ़ पहाड़ी पर प्राचीन मंदिरों के अतिरिक्त ऊंची चट्टानों के नीचे घूमती हुई बेतवा नदी अनोखी छटा प्रस्तुत करती है। यह दृश्य इतना मनोरम है कि लोग घंटों निहारते ही रहते हैं। यहां चट्टानों को काटकर बनाए गए गुफा मंदिर (सिद्ध की गुफा), राजघाटी, नहरघाटी आदि भी हैं। बेतवा नदी पहाड़ियों के नीचे बहती है, इसलिए नीचे जाने के लिए पत्थरों को काट कर सीढ़ियां बनाई गई हैं। सीढ़ियों से नीचे उतरते समय बाईं तरफ चट्टानों को तराश कर छोटे-छोटे कमरे बना दिए गए हैं, जिनमें जैन मुनि एकांत में प्रकृति का आनंद लेते हुए अपनी साधना में निमग्न हुआ करते थे। इस तरह पहुंचे देवगढ़ उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले से लगभग 34 किमी की दूरी पर स्थित है। नजदीकी रेलवे स्टेशन ललितपुर के अलावा जाखलौन है, जो जाखलौन करीब 15 किमी की दूरी पर स्थित है। खजुराहो हवाई अड्डा 220 और ग्वालियर एयरपोर्ट 255 किमी दूर है।
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