वैज्ञानिक फैक्ट: इंसानों में भी छिपी है ज़हर बनाने की क्षमता
क्या इंसान कभी सांपों की तरह ज़हरीले बन सकते हैं? यह सवाल सुनने में किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी जैसा लगता है, लेकिन विज्ञान की दुनिया में इस पर गंभीर शोध हो चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इंसान और कोबरा जैसे विषैले जीवों के बीच जितनी दूरी हम समझते हैं, वास्तव में उतनी नहीं है। हैरानी की बात यह है कि हमारे शरीर में भी ज़हर बनाने की बुनियादी क्षमता मौजूद है, बस वह सक्रिय रूप में विकसित नहीं हुई।
अमेरिका की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज (PNAS) में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, सरीसृपों और स्तनधारियों के शरीर में कुछ समान आनुवंशिक तंत्र पाए जाते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन जीनों की मदद से सांप अपना विष बनाते हैं, उनसे मिलते-जुलते जीन इंसानों समेत कई स्तनधारियों में भी मौजूद हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि इंसान अचानक कोबरा की तरह ज़हरीले हो जाएंगे, बल्कि यह दर्शाता है कि विकासवाद (Evolution) की प्रक्रिया में हमारे शरीर में भी ऐसी क्षमता का आधार मौजूद है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, सांपों का विष वास्तव में साधारण लार ग्रंथियों के विकास का परिणाम है। लाखों वर्षों में इन ग्रंथियों ने ऐसे प्रोटीन बनाना शुरू किया जो शिकार को निष्क्रिय कर सकें। इंसानों की लार में भी कई तरह के प्रोटीन और एंजाइम पाए जाते हैं, जो बैक्टीरिया से लड़ने और भोजन पचाने में मदद करते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक मानते हैं कि यदि विकासवादी परिस्थितियाँ अलग होतीं, तो स्तनधारी जीवों में भी विषैले गुण विकसित हो सकते थे।
दिलचस्प बात यह है कि प्रकृति में कुछ स्तनधारी पहले से ही विषैले हैं। उदाहरण के लिए, प्लैटिपस नामक जीव के पिछले पैरों में जहरीले कांटे होते हैं। इसी तरह कुछ श्रू (shrew) प्रजातियाँ अपने शिकार को लकवाग्रस्त करने वाला विष पैदा करती हैं। इससे यह साबित होता है कि विष बनाने की क्षमता केवल सांपों तक सीमित नहीं है।
हालांकि इंसानों में ऐसा विकास होने की संभावना बेहद कम है, क्योंकि हमारी जीवित रहने की रणनीतियां अलग दिशा में विकसित हुई हैं। हमने बुद्धिमत्ता, उपकरणों और सामाजिक सहयोग को अपना हथियार बनाया, जबकि कई जीवों ने विष को रक्षा और शिकार का साधन बनाया। यह शोध हमें यह समझने में मदद करता है कि पृथ्वी पर जीवन कितना आपस में जुड़ा हुआ है। इंसान, सांप और दूसरे जीव भले ही अलग दिखते हों, लेकिन हमारे शरीर की मूल जैविक संरचना में कई समानताएँ छिपी हुई हैं। विज्ञान के ऐसे तथ्य न केवल चौंकाते हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि विकासवाद की कहानी कितनी अद्भुत और रहस्यमयी है।
