बैंक्सी की वाटरलू मूर्ति वैश्विक प्रतिक्रियाएं और समकालीन कला

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Published By Anjali Singh
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चर्चित ब्रितानी कलाकार बैंक्सी का नवीनतम मूर्तिशिल्प, जिसे मध्य लंदन के वॉटरलू पैलेस में स्थापित किया गया है। समकालीन कला के उस हस्तक्षेपकारी स्वभाव को और तीव्रता से रेखांकित करती है, जहां कला केवल रूप-सौंदर्य तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सत्ता, विचारधारा और सार्वजनिक चेतना के बीच सक्रिय संवाद स्थापित करती है। यह कृति, जिसमें एक सूटधारी राजनेता अपने ही झंडे से अंधा होकर शून्य की ओर अग्रसर है। समकालीन राजनीतिक विवेक के उस संकट का रूपक बन जाती है, जिसकी झलक आज दुनियाभर के कई देशों में स्पष्ट हो चूका है।

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बैंक्सी की निजता अभी तक एक रहस्य ही है, किंतु इस बार उनके द्वारा या उनके नाम से स्थापित यह मूर्तिशिल्प कुछ नए सवाल भी उठाते हैं। यहां यह प्रश्न इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस बार बैंक्सी की कृति एक प्रमुख शहरी स्थल पर ‘स्थापित’ होती है, न कि पारंपरिक ग्राफिटी की तरह किसी ‘अवैध हस्तक्षेप’ के रूप में। जाहिर है ऐसे में यह परिवर्तन समकालीन कला की संस्थागत स्वीकृति की ओर संकेत करता है। पहले जहां बैंक्सी की कला ‘विरोध’ के रूप में दीवारों पर उभरती थी, वहीं अब वही कला शहर के दृश्य-परिदृश्य का अधिकृत हिस्सा बनती दिखती है।

यहां एक द्वंद्व उत्पन्न होता है कि क्या यह अब भी प्रतिरोध की कला है या वह धीरे-धीरे सत्ता-संरचना द्वारा स्वीकृत हो रही है? या कहें कि घुलमिल रही है। वैश्विक कला आलोचना में यह बहस नई नहीं है, क्योंकि इससे पहले भी जीन-मिशेल बास्किया और कीथ हेरिंग जैसे कलाकारों के साथ भी यही हुआ, जहां उनकी कलाकृतियां पहले तो सड़क की विद्रोही कला के तौर पर सामने आई किंतु अंततः उनकी कृतियां कला दीर्घाओं और कला बाजार का हिस्सा बन गईं।

बहरहाल इस मूर्ति पर विश्वभर में मिली प्रतिक्रियाओं को मुख्यतः तीन श्रेणी में रखकर समझा जा सकता है, जिसमें पहली है राजनीतिक प्रतिक्रिया, जिसके तहत कई विश्लेषकों ने इसे दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद और अधिनायकवाद की तीखी आलोचना के रूप में देखा है। यूरोप, अमेरिका और एशिया के संदर्भों में यह कृति उस ‘अंध राष्ट्रवाद’ की ओर संकेत करती है, जो लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर कर सकता है।

वहीं कलात्मक/सौंदर्यशास्त्रीय प्रतिक्रिया के तहत इसे कला समीक्षकों के एक वर्ग द्वारा इसकी न्यूनतावादी संरचना और सशक्त रूपक को सराहा जा रहा है। क्योंकि यहां बैंक्सी बिना किसी जटिल संरचना के, एक सीधी दृश्य भाषा में गहन राजनीतिक अर्थ या संदेश संप्रेषित करते हैं, जो समकालीन ‘राजनीतिक अभिव्यक्ति वाली कला’ की प्रमुख विशेषता है। उधर इस मूर्तिशिल्प पर संशय और आलोचना भी सामने है। क्योंकि कुछ आलोचकों ने इस कृति की ‘प्रामाणिकता’ और ‘अनामता’ पर प्रश्न उठाए हैं। क्योंकि बैंक्सी की पहचान को लेकर वर्षों से चल रही जिज्ञासा और समय-समय पर हुए असफल खुलासे इस धारणा को जन्म देते हैं कि यह संभवतः किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि एक संगठित बौद्धिक समूह का कार्य हो सकता है।

यहां बैंक्सी एक ‘कलाकार’ से अधिक एक ‘बनाए गए मिथक’ के तौर पर चिन्हित होते  हैं। एक ऐसा मिथक बनकर, जो समकालीन समाज में आलोचनात्मक आवाज को सुरक्षित दूरी से व्यक्त करने का माध्यम बन गया है। वैसे यदि हम इसे वैश्विक कला इतिहास के संदर्भ में देखें, तो यह कृति 20 वीं सदी में प्रचलित हुए अवां-गार्द और क्रांतिकारी कला-आंदोलनों की उत्तराधिकारी प्रतीत होती है। उदाहरण के लिए, व्लादिमीर टैटलिन की कृति ‘तीसरे अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का स्मारक’ (Monument to the Th।rd ।nternat।onal) एक यूटोपियन भविष्य की कल्पना करता है, जहां कला और राजनीति एक नई सामाजिक संरचना का निर्माण करते हैं।

इसी प्रकार, चर्चित सोवियत मूर्तिशिल्प ‘श्रमिक और कोलखोज महिला’ (Worker and Kolkhoz Woman) प्रगति, श्रम और सामूहिकता के आदर्श को महिमामंडित करती है। बात मूर्तिकार रामकिंकर बैज की कृति ‘मिल की पुकार’ (Mill Call) भारतीय आधुनिक मूर्तिकला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इसमें श्रमिकों को मिल की पुकार पर तेजी से आगे बढ़ते हुए दर्शाया गया है, जो औद्योगिक श्रम-संस्कृति और सामूहिक ऊर्जा का सशक्त प्रतीक है। आकृतियों की गतिशीलता, खुरदरी सतह और स्थानीय सामग्री का प्रयोग इसे अकादमिक यथार्थवाद से अलग करता है। यह कृति श्रम की गरिमा, वर्ग-चेतना और आधुनिक भारत के उभरते औद्योगिक समाज को व्यक्त करती है। साथ ही, इसमें लोक जीवन की सहजता और आधुनिकतावादी प्रयोगधर्मिता का अनूठा संगम भी दिखाई देता है।

वैचारिक हस्तक्षेप और कला 

बैंक्सी की यह कृति इन परंपराओं के विपरीत बतौर एक “विरोधी स्मारक” सामने आती है। क्योंकि ऐसी स्थिति में यह किसी आदर्श की स्थापना नहीं करती, बल्कि आदर्शों के विघटन को सामने लाती है। जहां इससे पहले के मूर्तिशिल्प ‘स्थिर सत्य’ का प्रतिनिधित्व करती थीं, वहां बैंक्सी का यह मूर्तिशिल्प या संस्थापन ‘संदेह’ और ‘संकट’ का प्रतिनिधित्व करती है। स्पष्ट है कि इस मूर्तिशिल्प के माध्यम से बैंक्सी एक बार फिर यह सिद्ध करते हैं कि समकालीन कला केवल दृश्य अनुभव नहीं, बल्कि वैचारिक हस्तक्षेप भी है। किंतु इस बार उनकी कला एक नए मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है, जहां वह एक साथ प्रतिरोध भी है और संस्थागत स्वीकृति का हिस्सा भी।

ऐसे में यह अनुमान है कि इसके पीछे किसी बौद्धिक समूह की भूमिका हो सकती है, वैश्विक आलोचना में भी समय-समय पर उठता रहा है। परंतु शायद बैंक्सी जैसे किसी कलाकार की वास्तविक शक्ति इसी ‘अनिश्चितता’ में ही निहित है। बहरहाल, यह मूर्ति हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा करती है कि क्या समकालीन कला अब भी सत्ता के विरुद्ध एक स्वतंत्र आवाज है या वह स्वयं सत्ता-संरचना का एक परिष्कृत उपकरण बनती जा रही है? जाहिर है बैंक्सी यहां इस प्रश्न का उत्तर तो नहीं देते, लेकिन वे इस प्रश्न को और धारदार जरूर बना देते हैं।

--सुमन कुमार सिंह कलाकार/कला लेखक