लोकायन : संथाली लोक नृत्य, प्रकृति से जुड़ी लोकधारा

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Published By Anjali Singh
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संथाली लोक नृत्य मुख्य रूप से झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और असम का एक प्रमुख पारंपरिक आदिवासी नृत्य है। संथाली नृत्य झारखंड की संथाल जनजाति द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला एक जीवंत और आकर्षक लोकनृत्य है, जो उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक जीवन का सशक्त प्रतीक है। संथाल, भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन निवासियों में से एक हैं और ऑस्ट्रोएशियाई भाषा परिवार की मुंडा शाखा से संबंधित हैं। उनकी प्रमुख भाषा संथाली है, जो उनकी पहचान और परंपराओं को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। झारखंड और पश्चिम बंगाल में इनकी सबसे अधिक आबादी पाई जाती है, जबकि ओडिशा, बिहार, असम और त्रिपुरा में भी इनकी उपस्थिति उल्लेखनीय है।

यह नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि संथाल समाज की एकता, आस्था और प्रकृति के प्रति गहरे संबंध का प्रतीक है। संथाली नृत्य की लोकप्रियता इतनी व्यापक है कि इसे भारतीय सिनेमा में भी स्थान मिला है, जैसे कि प्रसिद्ध फिल्मकार सत्यजीत रे की फिल्म ‘अगांतुक’ में इसकी झलक देखने को मिलती है।
संथाली नृत्य सामूहिक रूप से किया जाता है, जिसमें पुरुष और महिलाएं मिलकर भाग लेते हैं। नर्तक-नर्तकियां वृत्त या अर्धवृत्त बनाकर, एक-दूसरे की भुजाएं थामे लयबद्ध गति से नृत्य करते हैं। इस दौरान वे अलग-अलग समूह संरचनाएं बनाते हैं, जो नृत्य को और भी आकर्षक बनाती हैं। नृत्य में बांसुरी, ढोल, झांझ और पाइप जैसे पारंपरिक वाद्ययंत्रों का उपयोग किया जाता है, जिनकी धुन पर नर्तक अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं। साथ ही गायक भी मधुर गीतों के माध्यम से वातावरण को उत्सवमय बना देते हैं।

यह नृत्य विशेष रूप से वसंत ऋतु के उत्सवों के दौरान प्रस्तुत किया जाता है, जब संथाल समुदाय प्रकृति के नवजीवन का उत्सव मनाता है। वन क्षेत्रों में आयोजित यह नृत्य वनदेवताओं के प्रति श्रद्धा अर्पित करने का माध्यम भी है। इसके अलावा, अतिथियों के स्वागत में भी इसे प्रस्तुत किया जाता है। वेशभूषा की दृष्टि से भी संथाली नृत्य अत्यंत विशिष्ट है। पुरुष पारंपरिक धोती और पगड़ी पहनते हैं तथा स्वयं को पेड़ों की शाखाओं, पत्तियों और फूलों से सजाते हैं। वहीं महिलाएं लाल किनारी वाली सफेद या पीली साड़ी धारण करती हैं और बालों में जंगली फूलों का श्रृंगार करती हैं। यह प्राकृतिक सजावट उनके प्रकृति से गहरे जुड़ाव को दर्शाती है। संथाली नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति को देखने के लिए देश-विदेश से पर्यटक झारखंड आते हैं, विशेषकर वसंत उत्सव के समय। इसकी लोकप्रियता निरंतर बढ़ रही है और शोधकर्ता भी इसके इतिहास, महत्व और सांस्कृतिक पहलुओं पर गहन अध्ययन कर रहे हैं।