लेखकों का बाजार

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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आज के वक़्त में जब कि सारी दुनिया ही एक बाजार बनती जा रही हो तो फिर हमारे साहित्य की दुनिया ही भला कैसे इस बाजार ‘भाव’ से अछूती रह सकती है। यहां लेखकों के भाव स्थापित करने से लेकर उन्हें गिराने और उठाने तक का कार्य बड़ी ही संजीदगी के साथ किया जाता है। ये सभी क्रियाएं साहित्यिक उत्थान की आड़ में इतनी चतुराई से की जाती हैं कि दाएं हाथ को बाएं हाथ की खबर तक न लग पाए। यही उपलब्धि असली महानता है, जोकि सिर्फ लेखन भर से नहीं आती। पिछले जमाने के साहित्य और साहित्यकारों ने भले ही दुनिया को गूढ़ दर्शन दिया हो मगर आज के साहित्य और साहित्यकारों ने न सिर्फ बाजार दिया है, बल्कि लेखक बनाने की विधि से लेकर, किताबें बेचने-खरीदने के लाभप्रद हथकंडे ,उन्नत किस्म की चौर्य प्रणाली आदि के अतिरिक्त, लेखकों के भी खरीद, फरोख्त तक का मार्ग प्रशस्त किया है। ये साहित्य का नवीन उन्नयन काल है। इसी क्रम में पिछले दिनों एक किस्सा कुछ यूं हुआ कि हमारे प्रिय, आत्मीय और धुरंधर लेखक महाराज एक दिन लेखन मंडी के किनारे वाली दुकान पर लेखक तौलवा रहे थे कि वहां लफ्फाज कवि जी आ धमके, आते ही उन्होंने त्यौरियां चढ़ाते हुए लेखक महाराज को टोका ,“अरे महाराज जी! कितने रुपये किलो लिए ,बहुत महंगे नहीं तौलवा लिए आपने!”-अंशु प्रधान, लेखिका

महाराज जी ने पूरी बत्तीसी चमकाते हुए कहा, “अजी साहब! क्या करें, किलो दो किलो लेखक घर में रखने पड़ते हैं। अब क्या महंगा और क्या सस्ता, जो ये लिखकर दे देते हैं उसी से लेखन की दाल-रोटी चलती रहती है साहब, वरना इतनी महंगाई में भला कौन खुद लिखके कुछ देता है। न इतना समय है किसी के पास और न इतना भेजा, जो पका -पकाया माल मिल जाता है उसी को थोड़ा और पकाकर बाजार में अपने नाम से ठेल देते हैं।”

लफ्फाज कवि तो ठहरे ही शब्दों के जादूगर सो वे पुनः महाराज जी से बोले, “अरे! इतनी महंगाई में कहां आप इन महंगे लेखकों के चक्कर में पड़े हैं। अरे मेरी मानों तो अबकी रविवार मेरे साथ साहित्य के चोर बाजार चलना। थोड़ी भीड़- भाड़ ज़रूर रहती है वहां मगर औने-पौने दामों पर ही चोखा माल मिल जाता है।”

साहित्य के चोर बाजार की बात सुनते ही महाराज जी की आंखें फटी की फटी रह गयीं और कान खड़े हो गए, वे हकलाते हुए बोले- “क्या सच में! क्या वहां सस्ते में बढ़िया लेखक मिल जाएंगे।” लफ्फाज कवि जी ने मुस्कुराते हुए कहा- “और नहीं तो क्या! अरे आप बढ़िया की बात करते हैं, चोर बाजार में एक से एक लेखक मिलेंगे और न सिर्फ बिकने वाले, बल्कि खरीदने वाले भी।” महाराज जी बोले- “वो कैसे”?

इस पर कवि जी ने बड़े गर्व से कहा- “अभी पिछले सप्ताह ही आधा किलो परसाई, दो किलो बच्चन और ढाई सौ ग्राम निराला तोल कर दिए हैं बाजार में, पुरस्कृत लेखकों को किसी से कहिएगा नहीं मैं कविताई करने के साथ- साथ ये काम भी कर लेता हूं। अब देखना! जब वे इन सब को पानी के साथ खुद के बनाए चून में गूंथ के जब मट्ठे पाग के बाजार में बेचेंगे, तो आप भी कहेंगे कि क्या स्वाद है। अजी मैं तो कहता हूं छोड़िए ये लेखक मंडी के कोने के बाजार को, सीधे चोर मंडी चलते हैं।”

महाराज जी ने आव देखा न ताव और लगे मूछों को ताव देने। बड़ी ऐठ के साथ वे मंडी के दलाल से बोले ए भई। नीचे रख! हमें नहीं चाहिए इतने महंगे लेखक।

दलाल ने तभी कवि जी को घूरते हुए महाराज जी से कहा, “अजी साहब! एक दम से ही मूड बिगड़ गया आपका तो। अजी थोड़ा कम लगा लूंगा अब तराजू पर से कम से कम उतरवाईये तो मत। बड़ी मुश्किल से इन लेखकों को तराजू पर चढ़ने को मिलता है वो भी तब जब की आलोचकों की निग़ाह न पड़े साहब।”

मगर इतनी देर में महाराज जी को कवि जी का चोर बाजार का गणित भा चुका था। उन्होंने अपने गले में पड़े गमछे को ताव देकर फटकारा और थोड़ा आगे चलकर कवि जी को आवाज़ लगाई-“अजी। मैंने कहा कि कुछ जलेवी दही हो जाए अगले रविवार को तो आप और हम मिल ही रहे हैं न चोर बाजार में।” कवि जी मुस्कुराए और लपक के जलेबी- दही के दोने पर टूटते हुए बोले, “क्यों नहीं, क्यों नहीं”।