बोध कथा : खाली कटोरे का सच

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Published By Anjali Singh
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एक छोटे से गांव में हरिदास नाम का एक वृद्ध संत रहता था। लोग दूर-दूर से उसके पास अपनी समस्याएं लेकर आते और संत उन्हें सरल शब्दों में जीवन का मार्ग दिखाते। एक दिन एक धनवान व्यापारी उसके पास आया। वह बहुत चिंतित और असंतुष्ट दिख रहा था। व्यापारी बोला, “गुरुदेव, मेरे पास धन-दौलत, बड़ा घर, परिवार सब कुछ है, फिर भी मन में शांति नहीं है। मुझे हर समय किसी न किसी बात की चिंता रहती है। कृपया मुझे कोई उपाय बताइए।” 

संत हरिदास मुस्कुराए और बोले, “पहले तुम मेरे लिए एक काम करो। सामने रखे इस कटोरे में पानी भरकर ले आओ।” व्यापारी ने कटोरा उठाया और पास के कुएं से पानी भरकर ले आया। संत ने कटोरे को देखा और बोले, “अब इसमें थोड़ा और पानी भरो।” व्यापारी ने कहा, “गुरुदेव, यह कटोरा तो पहले ही पूरा भर चुका है, अब इसमें और पानी नहीं आ सकता।” संत ने शांत स्वर में कहा, “यही तुम्हारे मन की स्थिति है। तुमने अपने मन को इच्छाओं, चिंताओं और लालच से इतना भर लिया है कि उसमें शांति के लिए कोई जगह ही नहीं बची।”

व्यापारी चुप हो गया। संत ने आगे कहा, “जब तक तुम अपने मन के इस कटोरे को खाली नहीं करोगे, तब तक उसमें सुकून नहीं भर सकता। तुम्हें अपनी अनावश्यक इच्छाओं को त्यागना होगा और जो है, उसमें संतोष करना सीखना होगा।” व्यापारी ने विनम्रता से पूछा, “गुरुदेव, यह कैसे संभव है?” संत ने उत्तर दिया, “हर दिन कुछ समय अपने लिए निकालो। 

अपनी उपलब्धियों के लिए आभार प्रकट करो और उन चीजों को छोड़ना सीखो, जो तुम्हें भीतर से बोझिल बनाती हैं। धीरे-धीरे तुम्हारा मन हल्का होने लगेगा और शांति अपने आप उसमें स्थान बना लेगी।” व्यापारी ने संत के चरणों में झुककर प्रणाम किया। उस दिन के बाद उसने अपने जीवन में छोटे-छोटे बदलाव करने शुरू किए। समय के साथ उसकी चिंताएँ कम होने लगीं और वह पहले से अधिक संतुष्ट और शांत रहने लगा। सीख- जब तक मन इच्छाओं और चिंताओं से भरा रहेगा, तब तक उसमें शांति के लिए स्थान नहीं बन सकता। संतोष ही सच्चे सुख का आधार है।