हर साल एक अरब टन खाना बर्बाद कर डालते हैं हम
विश्व में हम हर साल करीब एक अरब टन खाने योग्य भोजन को बर्बाद कर डालते हैं। इस भोजन से करोड़ों लोगों का पेट भर सकता है, लेकिन हमारी लापरवाही से यह बर्बाद हो जाता है। भोजन की बर्बादी का यह आंकड़ा हाल में संयुक्त राष्ट्र ने जारी किया है, जो बेहद चिंताजनक और सोचने पर मजबूर करने वाला है। दुनिया भर में जब लोग भोजन को बर्बाद कर रहे होते हैं, तब करोड़ों लोग रात को भूखे पेट सोने पर मजबूर होते हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या इन हालात में हमें भोजन की बर्बादी रोकने के लिए संकल्पबद्ध हो कर काम नहीं करना चाहिए?
कहते हैं कि इंसान की असली पहचान उसकी थाली से होती है। एक इंसान क्या खाता है और कितना बचाता है, लेकिन आज हमारी थालियां हमारी संवेदनहीनता का आईना बनती जा रही हैं। हम जरूरत से ज्यादा परोस लेते हैं, फिर आधा खाकर छोड़ देते हैं। ऐसा करते हुए हम यह भूल जाते हैं कि जो रोटी हम छोड़ रहे हैं, वह किसी और की भूख मिटा सकती है।
अगर हमारे देश भारत के संदर्भ में इसे देखें, तो विरोधाभासी तस्वीर सामने आती है। एक ओर जहां हम ‘अन्न को देवता’ मानने की बात कहते नहीं थकते, वहीं दूसरी ओर विवाह-शादियों, धार्मिक आयोजनों, जन्मदिन की पार्टियों और अन्य अवसरों पर बड़े आयोजनों में भोजन को बर्बाद करते हैं। बड़े-बड़े पंडालों में बचे हुए खाने के ढेर हम प्राय: रोजाना ही देखते हैं। हम लोग प्लेट में जरूरत से ज्यादा खाना लेते हैं, थोड़ा खाते हैं और बाकी यूं ही छोड़ देते हैं, जैसे उसका कोई मूल्य ही न हो।
गांवों और कस्बों में किसी कार्यक्रम के बाद खाना कूड़े में फेंक दिया जाता है, जबकि उसी गांव-कस्बों में कुछ घर ऐसे भी होते हैं, जहां रात का चूल्हा नहीं जलता। इससे हमारी सोच परिलक्षित होती है। आंकड़े बताते हैं कि बर्बाद हुए भोजन का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा हमारे घरों से आता है। जाहिर है, हम अपनी थाली में अनजाने या लापरवाही से भोजन को बर्बाद कर रहे हैं। भोजन की बाकी 40 प्रतिशत बर्बादी खराब प्रबंधन और योजना की कमी के कारण बाजार, होटल, रेस्टोरेंट और सप्लाई सिस्टम में होती है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के आंकड़ों के अनुसार भारत में सालाना करीब 7.82 करोड़ टन खाना बर्बाद कर दिया जाता है। देश का हर व्यक्ति साल में 55 किलोग्राम खाना बेकार कर देता है, जिसकी कीमत करीब 10.69 लाख करोड़ रुपये होती है। हमें सोचना चाहिए कि भोजन की बर्बादी का दर्द केवल भूख तक सीमित नहीं है। जब हम खाना फेंकते हैं, तो हम उस किसान की मेहनत को भी अनदेखा कर रहे होते हैं, जिसने तपती दुपहरी में खून-पसीना एक किया होता है। साथ ही, उस पानी को भी बर्बाद करते हैं जो सिंचाई में लगता है और उस ऊर्जा की भी अनदेखी कर देते हैं, जो इसे हमारी थाली तक लाने में खर्च होती है। इतना ही नहीं, जब यही खाना कचरे में सड़ता है, तो वह पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाता है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा हर साल 30 मार्च को ‘शून्य भोजन बर्बादी दिवस’ मनाया जाता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भोजन केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। इस मौके पर हम रस्म अदायगी करते हैं, लेकिन इसके तुरंत बाद अप्रैल में होने वाली शादियों के मौके पर भोजन को बर्बाद करने में जुटे दिखते हैं। सवाल उठता है कि हम लोग आखिर क्यों इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लेते हैं? हममें से कितने ही लोग घर पर भोजन मांगने आए व्यक्ति को दुत्कार कर भगा देते हैं, मगर थाली में भोजन बेकार करके फेंकते हुए हमारा मन विचलित नहीं होता।
सवाल उठता है कि एक गंभीर मुद्दे के प्रति हम उदासीन क्यों हैं? आखिर हमें भोजन को बर्बाद करके मिलता क्या है? क्या यह इतना कठिन काम है, जिसे हम कर ही नहीं सकते? इन सवालों का एक ही जवाब है-हमारी सोच की कमी।
