एग्जिट पोल्स : कहीं हैट्रिक तो कहीं सत्ता परिवर्तन के आसार
एग्जिट पोल्स को लेकर हमेशा एक सावधानी भी जुड़ी रहती है कि ये अंतिम परिणाम नहीं, बल्कि एक अनुमान मात्र होते हैं। फिर भी इन अनुमानों के जरिए हम राजनीतिक रुझानों और संभावित सत्ता संतुलन को समझने की कोशिश कर सकते हैं।
पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी, इन पांच महत्वपूर्ण राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में विधानसभा चुनावों की मतदान प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही भारतीय लोकतंत्र के महापर्व का एक महत्वपूर्ण अध्याय संपन्न हो गया है। अब जनता का जनादेश ईवीएम में सुरक्षित है और पूरे देश की नजर चार मई को आने वाले अंतिम परिणामों पर टिकी है, लेकिन परिणामों से पहले, विभिन्न सर्वेक्षण एजेंसियों के ‘एग्जिट पोल’ ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है।
इन आंकड़ों ने कहीं जश्न का माहौल बना दिया है, तो कहीं रणनीतियों पर फिर से विचार करने को मजबूर कर दिया है। ये एग्जिट पोल्स न केवल संभावित परिणामों का संकेत देते हैं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं, क्षेत्रीय राजनीतिक समीकरणों और मतदाताओं की बदलती प्राथमिकताओं को भी उजागर करते हैं, हालांकि एग्जिट पोल्स को लेकर हमेशा एक सावधानी भी जुड़ी रहती है कि ये अंतिम परिणाम नहीं, बल्कि एक अनुमान मात्र होते हैं। फिर भी इन अनुमानों के जरिए हम राजनीतिक रुझानों और संभावित सत्ता संतुलन को समझने की कोशिश कर सकते हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से राष्ट्रीय स्तर पर अत्यधिक महत्वपूर्ण रही है और पश्चिम बंगाल की 294 सीटों पर हुआ मुकाबला इस साल का सबसे दिलचस्प चुनाव रहा है। यहां बहुमत के लिए 148 सीटों की आवश्यकता है। एग्जिट पोल के आंकड़ों पर नजर डालें, तो अपने एग्जिट पोल में चाणक्य स्ट्रैटेजीज ने भाजपा को 150-160, टीएमसी को 130-140, कांग्रेस को शून्य तथा अन्य को 6-10 सीटें दी हैं। केवल पीपुल्स पल्स का एग्जिट पोल ऐसा सामने आया है, जिसमें टीएमसी की सत्ता वापसी का अनुमान लगाया गया है।
इस एग्जिट पोल में टीएमसी को 117-187, भाजपा 95-110, कांग्रेस 1-3, लेफ्ट 0-1 तथा अन्य को शून्य सीटें मिलने का अनुमान है। पीपुल्स पल्स को छोड़कर बंगाल के सभी एग्जिट पोल्स राज्य में सत्ता परिवर्तन की ओर इशारा कर रहे हैं। भाजपा को यहां स्पष्ट बहुमत मिलता दिख रहा है। ‘प्रजापोल’ जैसे सर्वेक्षण तो भाजपा को 200 के पार ले जा रहे हैं। यदि ये आंकड़े सही साबित होते हैं, तो यह भारतीय राजनीति के इतिहास में एक बड़ा उलटफेर होगा। भाजपा का ध्रुवीकरण और ‘परिवर्तन’ का नारा जमीनी स्तर पर काम करता दिख रहा है, जबकि टीएमसी के लिए सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के आरोप बड़ी चुनौती बन गए हैं।
असम की 126 सीटों पर मतदान नौ अप्रैल को ही संपन्न हो गए थे। यहां बहुमत का आंकड़ा 64 है। यहां हिमंत बिस्वा सरमा का नेतृत्व और विकास के साथ-साथ पहचान की राजनीति का मेल भाजपा के लिए ‘विनिंग फॉर्मूला’ साबित होता दिख रहा है। असम में सभी एग्जिट पोल्स एक स्वर में भाजपा की प्रचंड जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं। यहां भाजपा गठबंधन न केवल सत्ता बचाए रखने में सफल दिख रहा है, बल्कि उसकी सीटें पिछली बार के मुकाबले बढ़ने का अनुमान है। कांग्रेस गठबंधन यहां काफी पिछड़ता नजर आ रहा है। एग्जिट पोल्स के अनुसार, भाजपा गठबंधन को 68 से लेकर 100 सीटों तक मिलने का अनुमान है, जबकि कांग्रेस गठबंधन 22-36 सीटों तक सीमित दिख रहा है।
केरलम की 140 सीटों पर भी नौ अप्रैल को मतदान हुआ था और यहां सत्ता की चाबी पाने के लिए 71 सीटों की जरूरत है। केरलम का रिवाज रहा है कि यहां हर पांच साल में सत्ता बदलती है, जिसे पिछले चुनाव में वामपंथी मोर्चे (एलडीएफ) ने तोड़ा था, लेकिन इस बार के एग्जिट पोल्स संकेत दे रहे हैं कि जनता फिर से ‘यूडीएफ’ (कांग्रेस गठबंधन) की ओर लौट रही है। पिनाराई विजयन की सरकार को तगड़ा झटका लगने का अनुमान है। यहां पर एग्जिट पोल्स अपेक्षाकृत एकमत दिखाई देते हैं और पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला एलडीएफ 49-65 सीटों तक सिमटता दिख रहा है, जबकि यूडीएफ को 70-90 सीटों के बीच स्पष्ट बढ़त मिलती दिख रही है।
तमिलनाडु की 234 सीटों पर 23 अप्रैल को मतदान हुआ था और यहां बहुमत का आंकड़ा 118 है। तमिलनाडु में मुकाबला हमेशा की तरह दो द्रविड़ दिग्गजों के बीच है। यहां एमके स्टालिन के नेतृत्व वाला डीएमके गठबंधन बढ़त बनाता दिख रहा है, हालांकि एआईएडीएमके गठबंधन भी कुछ पोल्स में कड़ी टक्कर देता नजर आ रहा है, लेकिन बहुमत के जादुई आंकड़े के करीब फिलहाल डीएमके ही दिख रही है। स्टालिन के नेतृत्व में डीएमके गठबंधन को 122-160 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि एआईएडीएमके गठबंधन 65-110 सीटों के बीच रह सकता है। पुडुचेरी की 30 सीटों पर एक्सिस माई इंडिया का पोल भाजपा गठबंधन (16-20 सीटें) को स्पष्ट बहुमत दे रहा है, जबकि कांग्रेस गठबंधन 6-8 सीटों पर सिमटता दिख रहा है। यह संकेत देता है कि छोटे, लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस केंद्रशासित प्रदेश में भाजपा अपनी स्थिति मजबूत कर सकती है।
यद्यपि एग्जिट पोल एक रोमांचक तस्वीर पेश करते हैं, लेकिन इनकी विश्वसनीयता पर हमेशा प्रश्नचिह्न लगा रहता है। इतिहास गवाह है कि एग्जिट पोल कई बार पूरी तरह धराशायी हुए हैं। हाल के वर्षों में हरियाणा, महाराष्ट्र (जहां महायुति की जीत का अंतर पोल्स से कहीं ज्यादा था) और झारखंड (जहां एनडीए की हार हुई) के नतीजों ने दिखाया है कि साइलेंट वोटर की नब्ज पकड़ना सर्वे एजेंसियों के लिए कितना कठिन है। इन सर्वे की अपनी सीमाएं भी हैं। दरअसल एग्जिट पोल एक बहुत छोटे ‘सैंपल साइज’ पर आधारित होते हैं। करोड़ों मतदाताओं वाले राज्यों में कुछ हजार लोगों की राय पूरे प्रदेश का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती। कई बार मतदाता अपना असली झुकाव नहीं बताते या मतदान केंद्र से बाहर निकलते समय दबाव महसूस करते हैं। आज के दौर में एग्जिट पोल सूचना से ज्यादा मनोरंजन का हिस्सा बन गए हैं। (यह लेखक के निजी विचार हैं)
