सिर्फ नंबर ही नहीं, समग्र विकास पर हो शिक्षा का ध्यान
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश
नई शिक्षा नीति के परिप्रेक्ष्य में यह भी जरूरी हो जाता है कि हम केवल परीक्षा परिणामों पर ही केंद्रित न रहें, बल्कि विद्यार्थियों के समग्र विकास पर ध्यान दें। आज का विद्यार्थी केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर व्यावहारिक, नैतिक और तकनीकी ज्ञान से भी सुसज्जित होना चाहिए। परिणामों के विश्लेषण से यह भी स्पष्ट होता है कि जिन विद्यालयों में नियमित शैक्षणिक वातावरण और अनुशासन बना रहा, वहां सफलता का प्रतिशत अधिक रहा है। संप्रति शिक्षा-नौकरी और जीवन यापन की सुविधाएं जुटाने का यंत्र बन गई है। सरकारें अपने ढंग से अपने देश और राज्य के क्षेत्र में शिक्षा का प्रबंधन करती हैं।
ज्ञान से बड़ा कुछ भी पवित्र नहीं है। ज्ञान भौतिक संसार की सभी उपलब्धियों को प्राप्त करने का उपकरण है। जो लोग इस भौतिक संसार से पृथक अन्य लोकों का भी अस्तित्व मानते हैं, वह लक्ष्य भी ज्ञान मार्ग से ही प्राप्त होना संभव बताया गया है। ज्ञान प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ उपकरण है शिक्षा। भारतीय इतिहास के वैदिक काल में शिक्षा प्राप्ति को अन्य उपलब्धियों से श्रेष्ठ बताया गया है। तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षावल्ली में शिक्षा को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन बताया गया है। कभी भारतीय ज्ञान का डंका समूचे विश्व में छाया हुआ था। उच्च शिक्षा के कारण ही भारत को विश्वगुरु कहा जाता था।
छान्दोग्य उपनिषद में नारद को व्यथित बताया गया है। व्यथित नारद सनत कुमार के पास पहुंचे। उन्होंने सनत कुमार को अपनी व्यथा बताई। सनत कुमार ने नारद से पूछा कि आपने अब तक क्या-क्या पढ़ा है। नारद ने बताया, ‘हे भगवन मैंने ऋग्वेद सहित सभी वेद पढ़े हैं। भूगर्भ विद्या, नक्षत्र विद्या, आकाश विद्या, गणित, ज्योतिष आदि अनेक विषय पढ़े हैं। उपनिषद में यह सूची काफी बड़ी है। इसका अर्थ यह निकलता है प्राचीन भारत में अनेक विषय पढ़े और पढ़ाए जाते थे। आज की ज्ञान परंपरा में वैदिक काल और उसके पहले से लेकर आधुनिक काल तक सभी विषय प्रासंगिक हैं। शिक्षा या विद्यार्थी जीवन पुरुषार्थ का स्वर्ण काल है। प्राचीन काल में शिक्षा के सभी अनुशासन पढ़े-पढ़ाए जाते थे।
नई शिक्षा नीति के परिप्रेक्ष्य में यह भी जरूरी हो जाता है कि हम केवल परीक्षा परिणामों पर ही केंद्रित न रहें, बल्कि विद्यार्थियों के समग्र विकास पर ध्यान दें। आज का विद्यार्थी केवल किताबी ज्ञान तक सीमित न रहकर व्यावहारिक, नैतिक और तकनीकी ज्ञान से भी सुसज्जित होना चाहिए। परिणामों के विश्लेषण से यह भी स्पष्ट होता है कि जिन विद्यालयों में नियमित शैक्षणिक वातावरण और अनुशासन बना रहा, वहां सफलता का प्रतिशत अधिक रहा है।
संप्रति शिक्षा-नौकरी और जीवन यापन की सुविधाएं जुटाने का यंत्र बन गई है। सरकारें अपने ढंग से अपने देश और राज्य के क्षेत्र में शिक्षा का प्रबंधन करती हैं। निजी क्षेत्र में भी शिक्षा के तमाम तरह के अनुशासन हैं। शिक्षा महंगी है और वह संस्कृति और दर्शन तथा ज्ञान प्राप्ति का उपकरण नहीं है। परीक्षाओं में ज्यादा से ज्यादा अंक पाने की होड़ रहती है। विद्यार्थी अधिक अंक पाने के तनाव में रहते हैं। आत्महत्याएं होती हैं। शिक्षार्थी को अध्ययन के दौरान ज्ञान का आनंद नहीं मिलता। निजी क्षेत्र के विद्यालयों में एक समान पाठ्यक्रम नहीं है। कुछ विद्यालय कक्षा एक से पढ़ाई शुरू करवाते हैं। कुछ विद्यालय पहली कक्षा से भी पहले की कक्षाएं केजी, नर्सरी आदि नामों से चलवाते हैं।
सीबीएसई पूरे देश में लागू एक केन्द्रीयकृत शिक्षा व्यवस्था है। बेशक इससे पूरे देश में एक समान शिक्षा का पाठ्यक्रम बनाया जाता है, लेकिन विद्यार्थियों को अध्ययन के समय आनंदित करने के कोई उपाय नहीं हैं।
उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् हाईस्कूल एवं इंटरमीडिएट की परीक्षाएं संचालित करता है। इसी के परिणाम इसी सप्ताह घोषित हुए थे। लड़कियों ने लड़कों की अपेक्षाकृत उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। जिन बेटियों को अच्छे अंक मिले हैं, उन्हें बधाई। उनके परिजनों को बधाई। उनके गुरुजनों को बधाई। अभी कुछ ही दिनों में महाराष्ट्र बोर्ड, सीबीएसई और आईसीएसई के परिणाम आने वाले हैं। एमपी बोर्ड के नतीजे पहले ही आ चुके हैं।
ज्यादा अंक पाने वाले परीक्षार्थियों के घरों में भी इस बात का तनाव है कि उन्हें और अधिक नंबर क्यों नहीं मिले। मेरी अपनी पढ़ाई उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद् द्वारा संचालित विद्यालय से हुई है। तब परीक्षाफल घोषित होने के दिन उल्लास होता था। कुछ फेल होते थे कुछ पास, लेकिन शैक्षिक वातावरण तनावपूर्ण नहीं होता था। इधर 20-25 वर्षों में जो उत्तीर्ण हैं, वे भी रुआंसे हैं कि और अधिक अंक क्यों नहीं मिले। जो फेल हो गए हैं, उनके घर वाले सारा दोष बच्चों पर ही डाल रहे हैं।
विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है। प्रतिस्पर्धा के कारण तनाव बढ़ता है, इसलिए विद्यालयों में काउंसलिंग की व्यवस्था होनी चाहिए। समय पर सही मार्गदर्शन मिलना आवश्यक है। कौशल आधारित शिक्षा पर भी जोर देना होगा। केवल पारंपरिक पढ़ाई पर्याप्त नहीं है। आईटी, उद्यमिता और कृषि जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण जरूरी है। इससे छात्र आत्मनिर्भर बनेंगे। मूल्य शिक्षा से विद्यार्थियों में नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित होगी।
भारतीय ज्ञान परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। वैदिक काल में शिक्षा जीवन से जुड़ी थी। वेद और उपनिषदों में ज्ञान, विज्ञान और नैतिकता का समन्वय मिलता है। तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविद्यालय विश्व में प्रसिद्ध थे। यहां दूर-दूर से विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने आते थे। गुरुकुल परंपरा में गुरु और शिष्य का संबंध गहरा होता था। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण भी था।
मुगल काल और अंग्रेजी शासन के दौरान इस स्वदेशी शिक्षा व्यवस्था को अपेक्षित संरक्षण नहीं मिला। पारंपरिक संस्थाएं कमजोर हुईं। हमारी मूल ज्ञान परंपरा प्रभावित हुई। आज आवश्यकता है कि हम अपनी इस समृद्ध परंपरा के श्रेष्ठ तत्वों को आधुनिक शिक्षा के साथ जोड़ें। इससे आने वाली पीढ़ी मजबूत, संस्कारित और आत्मनिर्भर बन सकेगी।
अकेले विद्यार्थी ही परीक्षा परिणामों के लिए दोषी नहीं होते। उनकी सफलता या असफलता में आचार्य का भी श्रम अंतर्निहित होता है। इस वर्ष के परिणामों में जहां एक ओर विद्यार्थियों की मेहनत और शिक्षकों के समर्पण की झलक स्पष्ट दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर शिक्षा की गुणवत्ता को और अधिक सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता भी महसूस होती है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच जो शैक्षिक असमानता है, उसे कम करना समय की मांग है। इसके लिए आवश्यक है कि संसाधनों का समान वितरण सुनिश्चित किया जाए और डिजिटल शिक्षा के माध्यमों को हर छात्र तक पहुंचाया जाए।
घर परिवार के लोग भी उचित वातावरण देने के लिए जिम्मेदार होते हैं। समाज भी व्यापक प्रभाव डालता है। संस्कृति और विद्यालय में पढ़ाई जाने वाले पाठ्यक्रम को भी इस जिम्मेदारी में सम्मिलित किया जाना चाहिए। मूलभूत प्रश्न है कि बच्चों को मिले अंक और तनाव की जिम्मेदारी किस पर डाली जाए। बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालने के बजाय उन्हें प्रोत्साहित करना और उनकी रुचियों को समझना अधिक आवश्यक है।
हर विद्यार्थी की क्षमता अलग होती है, और उसी के अनुरूप उसे मार्गदर्शन मिलना चाहिए। असफलता को भी सीखने के अवसर के रूप में स्वीकार करना हमारी शिक्षा संस्कृति का हिस्सा बनना चाहिए। चुनौती बड़ी है। टीवी खोलो तो युद्ध का धुआं है। पर्यावरण प्रदूषण बढ़ रहा है। जैव विविधता पर संकट है। ग्लोबल वार्मिंग हैं। सारा वातावरण बच्चों को अवसाद की ओर ले जाता है, इसलिए सारा दोष बच्चों पर ही डालना उचित नहीं है। यह विषय गंभीर महत्व का है। इस पर चिंतन होना चाहिए। ( यह लेखक के निजी विचार हैं)
