बंगाल में ऐतिहासिक मतदान, तमिलनाडु भी पीछे नहीं
पश्चिम बंगाल के मतदाताओं ने कमाल कर दिया। उन्होंने आजादी के बाद अब तक की सबसे ज्यादा वोटिंग की है। बंगाल में 92.72 फीसदी वोट पड़े हैं तो तमिलनाडु में 85.14 प्रतिशत।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में हुए बढ़-चढ़कर मतदान ने इतिहास रच दिया। इसे ‘वोट क्रांति’ कह सकते है। बंगाल में पहले चरण में 294 सीटों में से 152 सीटों पर मतदान हुआ। पहले चरण में 92.72 प्रतिशत मतदान हुआ। वहीं, तमिलनाडु की सभी 234 सीटों पर 85.14 प्रतिशत मतदान ने पिछले सब रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इससे पहले तमिलनाडु में सबसे ज्यादा मतदान 2011 में 78.29 प्रतिशत था, जबकि बंगाल में 2011 में 84.72 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था। आजादी के बाद हुए निर्वाचन के इतिहास में किसी भी राज्य एवं केंद्र शासित राज्य में इतना मतदान पहले कभी नहीं हुआ। इससे पहले रिकॉर्ड पुडुचेरी में नौ अप्रैल 2026 को हुए विधानसभा चुनाव का मतदान 89.87 प्रतिशत रहा है। परिणाम जो भी आएं, इस मतदान से परिपक्व संवैधानिक भारतीय लोकतंत्र की मजबूती दिखाई देती है।
दूसरे राज्यों में रह रहे मतदाता बड़ी संख्या में वापस लौटे और मतदान किया। खासकर मालदा, मुर्शिदाबाद, कूचबिहार, जलपाईगुड़ी और उत्तर दिनाजपुर पहुंचने वाले मतदाताओं की संख्या अधिक रही। मुस्लिम मतदाताओं ने भी दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, सूरत और केरल से आकर बड़ी संख्या में वोट डाले। एसआईआर की प्रक्रिया के चलते मतदाताओं में यह धारणा बनी कि मतदान नहीं करने पर मतदाता सूची से नाम कट सकता है। इस कारण नागरिकता भी गंवानी पड़ सकती है। ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को बार-बार उछाला।
तृणमूल यहां मोदी और शाह के आक्रामक चुनाव प्रचार के आगे अस्तित्व बचाए रखने के लिए जूझ रही है। कांग्रेस और वाममोर्चा का प्रयास रहा है कि अपने-अपने पारंपरिक और छिटक चुके मतदाताओं तक पहुंच बनाकर वोट डलवा लें। गोया, इस बार सभी राजनीतिक दल पूरे समय अधिकतम मतदान के लिए सक्रिय रहे। इसी का नतीजा रहा कि रिकॉर्ड मतदान ईवीएम में कैद हो गया। यह मतदान उस गहरी राजनीतिक हलचल और विभाजित सामाजिक चेतना के संकेत हैं, जो इस बार के चुनाव को असाधारण बना रही हैं। यह रिकॉर्ड इसलिए भी बना, क्योंकि एसआईआर के चलते 91 लाख वोट हटाए गए हैं। ग्रामीण महिलाएं समूहों के रूप में मतदान के लिए आईं।
इसी तरह तमिलनाडु में भी पहली बार मतदाताओं ने बढ़े तापमान के बीच भारी मतदान किया। यहां सभी 234 सीटों पर एक ही चरण में मतदान हुआ है।
तमिलनाडु के 5.73 करोड़ मतदाताओं ने 85.14 प्रतिशत मतदान करके इतिहास रच दिया है। इसके पहले सर्वाधिक 78.12 प्रतिशत मतदान 2011 में हुआ था। तब एआईए-डीएमके की मुखिया रहीं जयललिता ने डीएमके को करारी शिकस्त देकर सत्ता के गलियारे से बाहर कर दिया था। यहां एसआईआर प्रक्रिया के जरिए 74 लाख मतदाता बाहर हुए हैं। अतिम शाह बंगाल में इस बढ़े मतदान को टीएमसी का सूपड़ा साफ हो जाने का आधार बता रहे हैं, हालांकि यहां अन्नाद्रमुक और द्रमुक के बीच कड़ा मुकाबला है। बहरहाल, ऊंट किस करवट बैठता है, यह तो परिणाम के बाद ही पता चलेगा।
बड़े मत-प्रतिशत का सबसे अहम, सुखद व सकारात्मक पहलू है कि यह अनिवार्य मतदान की जरूरत की पूर्ति कर रहा है। फिलहाल हमारे देश में अनिवार्य मतदान की संवैधानिक बाध्यता नहीं है। मेरी सोच के मुताबिक ज्यादा मतदान की जो बड़ी खूबी है, वह है कि अब अल्पसंख्यक व जातीय समूहों को वोट बैंक की लाचारगी से छुटकारा मिल रहा है। इससे कालांतर में राजनीतिक दलों को भी तुष्टिकरण की मजबूरी से मुक्ति मिलेगी, क्योंकि जब मतदान प्रतिशत 75 से 85 होने लगता है, तो किसी धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र विशेष से जुड़े मतदाताओं की अहमियत कम हो जाती है। नतीजतन उनका संख्याबल जीत या हार की गारंटी नहीं रह जाता, लिहाजा सांप्रदायिक व जातीय आधार पर ध्रवीकरण की राजनीति नगण्य हो जाती है।
कालांतर में यह स्थिति मतदाता को धन व शराब के लालच से भी मुक्त कर देगी, क्योंकि कोई प्रत्याशी छोटे मतदाता समूहों को तो लालच का चुग्गा डालकर बरगला सकता है, लेकिन संख्यात्मक दृष्टि से बड़े समूहों को लुभाना मुश्किल होता है? बावजूद इन चुनावों में जातीय और अल्पसंख्यक राजनीति सभी दलों की कार्यशैली में खुले रूप में दिखाई दी है। साफ है, जातीय कुचक्र का धरातल नीचे से नहीं, बल्कि ऊपर से बनाए रखने के उपाय किए जा रहे हैं।
बढ़ा हुआ यह मतदान विशुद्ध रूप से मतदाता की मनस्थिति से उपजा प्रतिशत है। कई मुद्दों पर वह चिंतित होकर मतदान के लिए घर से निकल गया तो मतदान-यज्ञ में अपने मत की आहुति देकर ही लौटा। ज्यादातर चुनावों में कुलीन मतदाता इसलिए मतदान नहीं करते हैं, क्योंकि एक तो वे मौसम की मार झेलने में स्वयं को समर्थ नहीं पाते, दूसरे वे अपनी बड़ी हैसियत का ख्याल रखते हुए लंबी कतारों में खड़े होकर मतदान से बचते हैं, लेकिन बंगाल और तमिलनाडु में हुए मतदान से पता चलता है कि इस बार कुलीन मतदाताओं ने भी चुनावी यज्ञ में मतदान की आहुतियां दी हैं। अन्यथा मतदान का प्रतिशत इतना ऊंचा नहीं पहुंचता। यह स्थिति मतदाता में बढ़ती राजनीतिक चेतना का प्रतीक भी है। वैसे भी लोकतंत्र की असली ताकत नागरिकों की अधिकतम भागीदारी में निहित है। बावजूद भारतीय लोकतंत्र की विशेषता है कि अंत तक कोई भी चुनावी विश्लेषक और चुनावी सर्वे एजेंसियां परिणाम से पूर्व हार-जीत का अनुमान लगाकर परिणामों के शत-प्रतिशत सटीक अनुमान नहीं लगा सकते हैं। (यह लेखक के निजी विचार हैं।)
