झूठ और मिथ्याचार के जंगलों में मत भटकिए 

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

हमारी अंतरात्मा जिस कार्य को उचित कहती या स्वीकार करती है, उस आचरण को करने वाला ईमानदार कहा जाता है। वास्तव में सदचरित्र का संंबंध मानव के गुप्त मन से होता है। सही कार्य करने में हमें अंदर से ही एक गुप्त शांति और संतोष का अनुभव होता है। इसके विपरीत आत्मा का हनन कर छल-कपट व गलत तरीके से कार्य करने पर हमारा गुप्त मन हमें अंदर ही अंदर कचोटता रहता है। हमें शांति नहीं मिलती।

हमेशा यह गुप्त भय रहता है कि हमारे इस गलत कार्य या चोरी किसी को किसी दिन किसी भी समय पता न चल जाए। हनन की हुई आत्मा ही हमें गलत की ओर जाने देती है और दुष्कर्म कराती है। असत्य या बेईमानी के कार्य द्वारा असत्य कार्य करने, रिश्वत, चोर बाजारी आदि चोरियां करने से धीरे-धीरे हमारी अंतरात्मा मर जाती है। हनन की हुई आत्मा में सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, उचित-अनुचित का विवेक नहीं रहता।-डॉ.  प्रदीप द्विवेदी ‘रमण’ आध्यात्मिक लेखक

बहुत से व्यक्ति चोरी करते हुए भी बाहर से संतुष्ट से दिखते हैं, पर बुरे कार्यों की सूक्ष्म रेखाएं अंतश्चेतना के ऊपर अंकित होती रहती हैं और मन पर सदा आघात करती हैं। एक न एक दिन पाप प्रकट होता ही है और करनी का फल भुगतना ही पड़ता है। सही मार्ग के साथ आपको आत्मा की दैवी शक्तियों का भी सहयोग मिलता रहेगा। सच्चे व्यक्ति को कभी किसी गुप्त भेद के प्रकट होने का कोई भय नहीं होता। वह तो खरा है। चाहे किसी कसौटी पर कस लीजिए, सदैव चमकता ही रहेगा। 

सत, चित, आनंदस्वरूप आत्मा इसीलिए इस धरती पर भेजा गया है कि वह सत्य का अनुसरण करे, असत्य या झूठ के अंधकार से बचा रहे, जो व्यक्ति यह समझता है कि बेईमानी से, लोगों की आंखों में धूल झोंककर बढ़ता रहेगा, वह वास्तव में बड़ी भूल करता है। बेईमानी, चोरी, रिश्वत, छल-कपट तो एक प्रकार की अग्नि है। वह कब छिपती है? उसे चाहे सौ पर्दों में रखा जाए, एक न एक दिन पर्दों को जलाकर प्रकट हो ही जाती है। धोखा या बेईमानी चार दिन ही फलती-फूलती सी दिखती है। वास्तव में वह नीचे की ओर गिरता जाता है। दीपक जब बुझने को होता है, तब तेजी से चमक कर शान्त हो जाता है।

इसी प्रकार इन सबसे क्षणभर के लिए समृद्धि प्रतीत होते है, पर चोरी के प्रकट होते ही वे ऐसे गहरे गड्ढे में गिर पड़ते हैं, जिससे निकलना असंभव सा हो जाता है। वे दीर्घकाल तक असत्य के अंधकार में भटकते रहते हैं। सच्चे और ईमानदार गरीब होकर भी पूजे जाते हैं, झूठे और बेईमान ठगी से अमीर होकर भी तिरस्कृत होते हैं। आप सत्य के यात्री हैं। सत्यस्वरूप आत्मा हैं। झूठ और मिथ्याचार के सुहावने दिखने वाले भयानक जंगलों में मत भटकिए। ध्यान रहे जो पैसा दूसरों को रूलाते हुये हड़प लिया जाता है, वह लेने वाले को नष्ट करके ही विदा होता है।

सत्यता और ईमानदारी धर्मात्मा मनुष्य के भूषण हैं। ये ईश्वर की सत्ता के द्योतक हैं। मरते दम तक इन दिव्य गुणों का हृास मत होने दीजिएगा। यदि हमारी आजीविका झूठ, अन्याय, छल, कपट से कमाई हुई है, तो उस पर पलने वाली हमारी संतान भी उसका उपयोग करने पर अधिकाधिक अन्याय, झूठ और धूर्तता की ओर बढ़ती जायेगी और हमारी आने वाली पीढ़ी को भी दुखी बना डालेगी। ऐसी कमाई कमाईए, जिससे दुनिया के किसी व्यक्ति के सामने आंखें नीची न करनी पड़ें।

असत्यभाषण, क्रोध, काम इत्यादि दुष्ट मनोविकारों के वशीभूत होकर हम कई गलतियां, बेईमानी, कपट, मिथ्याचार किया करते हैं। ये दोष मन के मन में ही रह जाते हैं। मन ही चोरी से हमें पथभ्रष्ट करता है। मन के ये राक्षस किसी न किसी काने में छिपकर उभर उठने की प्रतीक्षा किया करते है। यदि हम इन्हें मन में छिपाए रहें तो हमें सदा यह भय रहता है कि न जाने ये कब उठकर हमें गिरा देंगे। इसीलिए प्रतिदिन अपना निरीक्षण करते रहना चाहिए।