आदिवासी कला का पुनरुत्थान
भारतीय आदिवासी कला के इतिहास में सन 1980 का दशक सदैव याद किया जाएगा, क्योंकि इस समय मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में भारत भवन की स्थापना हुई और भारतीय आदिवासी कला का तो जैसे पुनरुत्थान काल आरंभ हुआ। उस समय तक लोग आदिवासी चित्रकला के नाम पर महाराष्ट्र के वारली, मध्य प्रदेश के भील, गुजरात के राठवा और ओडिशा के सौंरा आदिवासियों के चित्र ही जानते थे। इनमें भी वारली आदिवासियों के चित्र प्रसिद्धि के शिखर पर थे। -मुश्ताक खान
कलाकारों की खोज का अभियान
भारत भवन की स्थापना के साथ ही प्रसिद्ध चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन के नेतृत्व में मध्य प्रदेश के विभिन्न आदिवासी समुदायों की कला परंपराओं और प्रतिभाशाली कलाकारों की खोज का एक सुविचारित अभियान आरंभ हुआ। इसका केंद्रबिंदु आदिवासी मानस की सृजन क्षमता की पहचान, परख और उसे पल्लवित होने के अवसर प्रदान करना था। परिणाम स्वरूप मध्य प्रदेश की परधान, गोंड, बैगा , मुरिया, भील, भिलाला, कोरवा, नगेसिया, बादी, कोरकू , भारिया, ओरांव जैसे अनेक आदिवासी समुदायों के कलाकार सामने आए। इनके साथ ही अनेक पिछड़े समुदायों के लोक कलाकारों को भी पहचान मिली। इस आभियान का फोकस समुदाय से अधिक व्यक्तिगत सृजनशीलता और संभावनाओं पर था। अतः किसी कलाकार के व्यक्तिगत सृजन को भी उसकी समूचि समुदायिक कला चेतना की अभिव्यक्ति का परिणाम मान लिया गया। यह स्थिति प्रधान–गोंड चित्रकार जनगढ़ सिंह श्याम के साथ रही और यही स्थिति बस्तर के मुरिया चित्रकार बेलगूर तथा झाबुआ की भील चित्रकार भूरी बाई और लड़ो बाई के साथ रही। उनकी व्यक्तिगत चित्रकारी क्षमताएं ही उनके समुदाय की प्रतिनिधि चित्रकला समझी जाने लगीं। यहां मैं यह बता दूं कि मैं व्यक्तिगत तौर पर भारत भवन, भोपाल के इस अभियान का अंग रहा हूं और यह सब कुछ मेरी आंखों के सामने हो रहा था।
बैगा जनजाति में विकसित होती कला
भोपाल में स्वामीनाथन के प्रयोगों की सफलता से प्रेरित और उत्साहित होकर अन्य स्थानों पर अन्य अनेक कलाकारों एवं कला संस्थाओं ने इसी प्रकार के प्रयोग करना आरंभ किए। कुछ प्रयोग सफल भी हुए और कुछ आगे नहीं बढ़ सके। सन 1985 के दौरान गुजरात के अहमदाबाद में ख्यातिप्राप्त चित्रकार हाकु भाई शाह ने गणेश जोगी और उनकी पत्नी तेजल बेन के साथ एसा ही प्रयोग आरंभ किया और उनसे चित्र बनवाना आरंभ किया। गणेश जोगी मूलतः राजस्थान की घुमक्कड़ जोगी समुदाय से थे, जो गांव -गांव घूमकर भजन और लोक कथाए गाते हैं। उस समय राजस्थान में सूखा पड़ा था और गणेश का परिवार मजदूरी की तलाश में अहमदाबाद आया था। वे और उनकी पत्नी सड़क किनारे गड्ढे खोदने का काम कर रहे थे, जहां से हाकु शाह उन्हें लाए थे। हाकु शाह का प्रयोग सफल रहा गणेश और तेजल दोनों ही प्रतिभा संपन्न निकले और उन्होंने लोक चित्रकला की एक नई जोगी चित्रशैली को जन्म दिया। बाद में भारत सरकार ने गणेश जोगी को जोगी चित्रकला में उनके योगदान के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया। वर्तमान में उनके कुटुंब के लगभग 15-20 सदस्य चित्रकारी कर रहे हैं और जोगी लोकचित्र, कला जगत में अपनी पहचान बना चुकी हैं। ऐसा ही एक अन्य प्रयोग आशीष स्वामी नाम के एक युवा चित्रकार ने मध्य प्रदेश के उमरिया क्षेत्र के बैगा आदिवासियों के गांव में आरंभ किया। आशीष भोपाल के भारत भवन से भी जुड़ा हुआ था और स्वामिनाथन जी से बहुत प्रभावित था। वह अपने व्यक्तिगत प्रयासों से बैगा आदिवासियों के लोढ़ा गांव में रहकर उन्हें कलाकर्म के लिए प्रेरित करने लगा। बैगा लोगों की अपनी पारंपरिक भित्ति अलंकरण और मिट्टी के काम तथा लकड़ी के मुखौटे बनाने की एक सीमित परंपरा थी। आशीष ने उन्हें कागज और रंग-ब्रश देकर चित्र बनाने के लिए उत्साहित किया। अंततः एक साठ वर्षीय बैगा महिला जुधैया बाई ने उसकी पहल को स्वीकार किया और अपनी व्यक्तिगत कला प्रतिभा के बल पर कुछ ही वर्षों में वे एक सफल बैगा चित्रकार के रूप में स्थपित हो गईं। जुधैया बाई को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया और एक नई बैगा चित्रकला विश्व में विख्यात हो गई। वर्तमान में यह कला आसपास के कुछ गांवों के अनेक बैगा स्त्री-पुरुष कर रहे हैं।
तेलंगना सरकार खरीदती है चित्र
इसी प्रकार राजस्थानी भील मांडना चित्रों का व्यवसायीकरण भी आरंभ किया गया था। सन 1984 में जब उदयपुर के जनजातीय अनुसंधान संस्थान के सांस्कृतिक अधिकारियों को इस क्षेत्र में भेजा गया, तो उन्होंने गोमा परगी और फूला परगी नामक दो युवा भील कलाकारों को अपने पारंपरिक भित्तिचित्र मांडनो को कागज और कैनवास पर चित्रित करने के लिए प्रोत्साहित किया था। उन दोनों चित्रकारों ने इन सामग्रियों का उपयोग करते हुए चित्रकारी की परंपरा को आगे बढ़ाया। परंतु इन चित्रकारों को आशातीत सफलता नहीं मिल सकी। संभवतः यह चित्रकार उतने प्रतिभशाली नहीं थे कि पारंपरिक चित्रों को एक नई ऊंचाई तक लेजा सकें। वर्तमान में लगभग दस-पंद्रह भील चित्रकार इससे अपनी आजीविका कमा रहे हैं। इस समय यशपाल बरंडा प्रसिद्ध राजस्थानी भील चित्रकार है, वे उदयपुर जिले की नयागांव तहसील के कनबई गांव के रहने वाले हैं।
बाद में दक्षिण भारत में भी इस प्रकार के प्रयास हुए। सन 2016 में तेलंगाना के भद्राचलम स्थित इंटीग्रेटेड ट्राइबल डेवलपमेंट एजेंसी ने हैदराबाद स्थित नेहरू सेंटिनरी म्यूजियम के साथ मिलकर, कोया आदिवासियों के लिए जनजातीय चित्रकारी का एक ट्रेनिंग कार्यक्रम चलाया, जिसके अंतर्गत बीस कोया आदिवासी युवक-युवतियों को चित्रकारी की ट्रेनिंग दी गई। एक सप्ताह की इस ट्रेनिंग को वर्ष में तीन बार आयोजित किया गया। इसके परिणामस्वरूप कोया आदिवासी चित्रकला का उदय हुआ। इस ट्रेनिंग कार्यक्रम के मुखिया नेहरु सेंटिनरी म्यूजियम के क्यूरेटर डॉ. सत्यनारायण थे तथा चित्रकारी सिखाने के लिए कला महाविद्यालय के शिक्षकों को लाया गया था। उन्होंने निश्चित किया कि चित्र केवल गेरू मिट्टी के लाल और सफ़ेद मिट्टी के रंग से बनाए जाएंगे, जिनका प्रयोग कोया आदिवासी पहले से अपने घर पोतने के लिए करते रहे हैं। चित्रों के विषय भी कोया दैनिक जीवन की गतिविधियों से लिए गए। इनमें गौर सींघ नृत्य तथा सर पर लकड़ी का गट्ठर ले जाती महिला प्रमुख हैं। इस कार्यक्रम को स्वरोजगार योजना से भी जोड़ा गया है। अतः इन प्रशिक्षित चित्रकारों के बनाए चित्र प्रतिमाह राज्य सरकार खरीद लेती है। वर्तमान में कुछ कोया आदिवासी चित्रकार सक्रिय हैं।
भारतीय कला के उन्नयन में योगदान
दक्षिण भारत में अनेक आदिवासी समुदाय निवास करते हैं, लेकिन उनकी चित्रकला के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। सन 2022 में तमिलनाडु के नीलगिरी क्षेत्र में रहने वाले कुरुम्बा आदिवासियों द्वारा पूजा अनुष्ठानों के लिए बनाए जाने वाले भित्तिचित्रों के बारे में चेन्नई की एक संस्था सी.पी. रामास्वामी अय्यर फाउंडेशन को पता लगा और उन्होंने कुछ कुरुम्बा चित्रकारों को कागज पर इन चित्रों को बनाने के लिए प्रेरित किया। इसका परिणाम बहुत उत्साहजनक रहा। बाला सुब्रामण्यन और कृष्णन नामक दो कुरुम्बा आदिवासी चित्रकारों का आदिवासी कला जगत में उदय हुआ। चेन्नई स्थित दक्षिण चित्र संग्रहालय ने इन कुरुम्बा चित्रकारों को अपने कार्यक्रमों में आमंत्रित किया और इस प्रकार दक्षिण भारत की पहली आदिवासी चित्रकला से कला प्रेमियों का परिचय हुआ। इस प्रकार सन 1982 में कला चिंतक और चित्रकार जगदीश स्वामीनाथन द्वारा भारत भवन, भोपाल के माध्यम से आरंभ किए गए, आदिवासी कला की विभिन्न परंपराओं के पुनरुत्थान के अभियान के परिणामस्वरूप भारत के अनेक आदिवासी समुदायों के चित्रकार प्रकाश में आ सके और वे अब भारतीय कला के उन्नयन में अपना योगदान दे रहे हैं।
