पैकिंग में खराब नहीं होंगे खाद्य पदार्थ, ना ही केमिकल से होगा नुकसान
खाद्य पदार्थ एल्यूमिनियम फॉयल, बटर पेपर, प्लास्टिक कंटेनर में पैक कराकर घर ले जाकर खाने से बीमार होने का डर अब नहीं सताएगा। उसमें डाले जाने वाले केमिकल से बच सकेंगे। पर्यावरण को भी किसी तरह से नुकसान नहीं पहुंचेगा। केमिकल से बने इन पैकिंग मटेरियल की जगह बाजार में जल्द ही पर्यावरण अनुकूल फिल्म में खाना रखकर दिया जा सकेगा। इसके लिए राजकीय महिला महाविद्यालय के रसायन विभाग के विभागाध्यक्ष असिस्टेंट प्रोफेसर ने एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर और दो शोधार्थियों के साथ मिलकर पर्यावरण-अनुकूल बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग फिल्म विकसित की है, जिसमें पैकेजिंग में खाद्य पदार्थ खराब नहीं होंगे। अब तक की पैकेजिंग में लगने वाले केमिकल से कोई नुकसान नहीं होगा। उन्होंने शोध का पेटेंट भी करा लिया है।- ऋषिदेव गंगवार, बदायूं
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बाहर से खाना पैक कराने पर पैकिंग शीट के कैमिकल की वजह से शरीर को बहुत हानि होती है। तरह-तरह की बीमारियां पनपती हैं, जिसको ध्यान में रखकर राजकीय महिला महाविद्यालय के रसायन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बृजेश कुमार ने एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय के अनुप्रयुक्त रसायन विज्ञान के एसोसिएट प्रो. डॉ. प्रमेंद्र कुमार, शोधार्थी डॉ. नरेंद्र सिंह, डॉ. मोहत्तिब के साथ मिलकर समस्या पर मंथन किया। शोध करने के बाद सभी ने मिलकर पर्यावरण अनुकूल बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग फिल्म तैयार की। जिन्हें साइट्रिक एसिड से क्रॉस लिंक कर अधिक मजबूत, जल प्रतिरोधी और ऊष्मीय रूप से स्थिर बनाया गया है, जिसका उच्च पारदर्शिता, लचीलापन, जीवाणुरोधी गुण और 35 दिनों के भीतर मिट्टी में अपघटन जैसी विशेषताएं मिलीं। खुद पूरी तरह से परीक्षण करने के बाद अब तैयारी थी पेटेंट की। शोध के अनुसार यह फिल्म फल सब्जियों की शेल्फ लाइफ बढ़ाने में भी सहायक हैं। 12 दिसंबर 2025 को भारतीय पेटेंट कार्यालय में आधिकारिक जर्नल 50/2025 से नंबर 202511103974A से आवेदन किया, जिसका शीर्षक बायोडिग्रेडेबल सोडियम एल्जिनेट एंड डीएसीटाइलेटेड गम कराया। कम्पोजिट फिल्म्स विद सिट्रिक एसिड क्रॉस-लिंकिंग फॉर पैकेजिंग रहा। शोध को अब पेटेंट मिल चुका है, जिसके 39 पेज में 10 दावे किए गए। कहा कि यह आविष्कार खाद्य संपर्क अनुप्रयोग के लिए आदर्श है, जिसका प्रकाशन 12 दिसंबर 2025 को हुआ।
दीर्घकाल तक अपघटित नहीं होते सिंथेटिक पॉलिमर
यह शोध बीमारी के अलावा पर्यावरण को भी संतुलित करेगा। डॉ. बृजेश कुमार ने बताया कि प्लास्टिक आधारित पैकेजिंग सामग्री से बीमारी पैदा हो रही थीं और पर्यावरण को लेकर भी परेशानी थी, जिसके चलते शोध की प्रक्रिया के बाद इस फिल्म को विकसित किया गया। कहा कि पारंपरिक सिंथेटिक पॉलिमर दीर्घकाल तक अपघटित नहीं होते, जिसकी वजह से मृदा और जल प्रदूषण में लगातार वृद्धि होती रहती है। प्राकृतिक, जैव अनुकूल और सतत विकल्पों का विकास बहुत जरूरी हो गया था, जिसकी वजह से इसकी संरचना के बारे में विचार आया।
इस प्रकार विकसित की गई पैकेजिंग फिल्म
डॉ. बृजेश कुमार ने बताया कि विकसित की गई कंपोजिट फिल्म पूरी तरह से पर्यावरण के अनुकूल है, जिसके निर्माण में सोडियम एल्जीनेट और डी एसिटाइलेडेट का उपयुक्त अनुपात में मिलान किया गया है। साइट्रिक एसिड के माध्यम से क्रॉस लिंकिंग करके त्रिआयामी एस्टर बांडेंड नेटवर्क की संरचना निर्मित की गई, जिससे फिल्म की यांत्रिक सुदृढ़ता, जल प्रतिरोधक क्षमता और तापीय स्थिरता में वृद्धि मिली। इसके अलावा ग्लिसरॉल को प्लास्टिसाइजर के रूप में सम्मिलित कर फिल्म की लचीलापन और भंगुरता नियंत्रण सुनिश्चित किया गया, जिसके प्रयोग के बाद शोधकर्ताओं को पता चला कि विकसित फिल्म उच्च पारदर्शिता, न्यून धुंधलापन और पर्याप्त यांत्रिक गुण प्रदर्शित करती है। मृदा दफन परीक्षणों में लगभग 35 दिनों के भीतर पर्याप्त जैव अवक्रमण (biodegradation) मिला, इसके अलावा यह फिल्म Staphylococcus aureus, Escherichia coli और Pseudomonas aeruginosa जैसे खाद्य जनित रोगाणुओं के विरुद्ध प्रतिजैविक (antibacterial) सक्रियता प्रदर्शित करती है। सामाजिक और औद्योगिक परिप्रेक्ष्य में यह तकनीक खाद्य संपर्क अनुप्रयोगों के लिए सुरक्षित, गैर विषैली और पर्यावरण अनुकूल विकल्प प्रस्तुत करती है। फल और अन्य शीघ्र नष्ट होने वाले खाद्य पदार्थों की पैकेजिंग में इसके उपयोग से शेल्फ लाइफ में वृद्धि के साथ दृश्य गुणवत्ता संरक्षण संभव है।
यह तकनीक न केवल पर्यावरण को बचाएगी, बल्कि भारतीय खाद्य उद्योग को सस्ती और सुरक्षित पैकेजिंग प्रदान करेगी। यह उपलब्धि हर किसी के लिए गौरव का विषय है। जल्द ही पैकेजिंग में नई क्रांति आने वाली है। शोध के बाद इसे पेटेंट मिल गया है। यह पैकेजिंग जल्द ही बाजार में नजर आएगी।- डॉ. बृजेश कुमार
