कॉलेज का पहला दिन: स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी का एहसास
आज भी मेरी यादों में उतनी ही ताजगी के साथ बसा है, कॉलेज का पहला दिन। एक बीएससी छात्र के रूप में यह मेरे जीवन का नया अध्याय था, जिसमें उत्साह, जिज्ञासा और हल्की-सी घबराहट तीनों एक साथ मौजूद थे। स्कूल की सुरक्षित और परिचित दुनिया से निकलकर कॉलेज की खुली और विस्तृत दुनिया में कदम रखना मेरे लिए एक बड़ा बदलाव था।
उस दिन मैं सुबह काफी जल्दी उठ गया था। मन में कई तरह के विचार उमड़-घुमड़ रहे थे। कैसे लोग मिलेंगे, पढ़ाई कैसी होगी, क्या मैं खुद को वहां ढाल पाऊंगा या नहीं! मैंने बड़ी सावधानी से अपनी तैयारी की- नया बैग, साफ-सुथरे कपड़े, और मन में ढेर सारी उम्मीदें।
जब मैं कॉलेज के गेट पर पहुंचा, तो सामने विशाल इमारत, इधर-उधर जाते छात्र-छात्राएं और अलग-अलग गतिविधियों का माहौल देखकर मैं कुछ पल के लिए ठिठक गया। क्लासरूम में प्रवेश करना भी अपने आप में एक अनुभव था। वहां बैठे अधिकांश चेहरे मेरे लिए अनजान थे।
मैं चुपचाप एक सीट पर जाकर बैठ गया। थोड़ी ही देर में फिजिक्स के प्रोफेसर आए और उन्होंने पढ़ाना शुरू किया। उनकी पढ़ाने की शैली स्कूल से काफी अलग थी। वे सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं थे, बल्कि हर विषय को समझने और सोचने पर जोर दे रहे थे। उसी समय मुझे एहसास हुआ कि अब पढ़ाई का स्तर बदल चुका है और मुझे भी खुद को उसी अनुसार ढालना होगा।
धीरे-धीरे पास बैठे कुछ छात्रों से बातचीत शुरू हुई। पहले तो झिझक थी, लेकिन फिर परिचय का सिलसिला चल पड़ा। किसी का सपना वैज्ञानिक बनने का था, तो कोई आगे रिसर्च करना चाहता था। उनकी बातें सुनकर मुझे भी अपने लक्ष्य और स्पष्ट दिखाई देने लगे। दोपहर में हम सब कैंटीन गए, जहां चाय और हल्की-फुल्की बातचीत ने हमें एक-दूसरे के करीब ला दिया।
कॉलेज का माहौल मुझे बहुत अलग लगा। यहां किसी पर कोई बंधन नहीं था, लेकिन साथ ही अपनी जिम्मेदारी खुद निभानी थी। क्लास में जाना है या नहीं, पढ़ाई कैसे करनी है- ये सब अब हमारे अपने निर्णय थे। यह स्वतंत्रता जितनी आकर्षक थी, उतनी ही चुनौतीपूर्ण भी।- शुभांक राज मौर्या बीएससी छात्र, एसएस पीजी कॉलेज, शाहजहांपुर
