शोध, साख और सौदेबाज़ी
“20,000 रुपये में सात दिन में ‘इंडेक्स्ड पेपर’”- यह अब किसी छिपे हुए नेटवर्क की नहीं, खुले बाजार की भाषा है। ईमेल, व्हाट्सऐप और टेलीग्राम पर ऐसे प्रस्ताव आम हैं: तय शुल्क दीजिए, शोधपत्र तैयार, प्लेजरिज्म रिपोर्ट संलग्न और प्रकाशन सुनिश्चित। शोध अब सेवा बन चुका है। समस्या यह नहीं कि यह सब हो रहा है, समस्या यह है कि इसे अब असामान्य नहीं माना जाता। यहीं से संकट की असली शुरुआत होती है- सामान्यीकरण का संकट। जब अनैतिकता अपवाद नहीं रह जाती, बल्कि व्यवहार का स्वीकृत हिस्सा बन जाती है, तो वह धीरे-धीरे संरचना में बदल जाती है। शोध के साथ आज यही हो रहा है। यह कुछ व्यक्तियों की चूक नहीं, बल्कि उस पूरे अकादमिक तंत्र का परिणाम है, जहां साधन और साध्य के बीच की रेखा मिटने लगी है।-डॉ. शिवम भारद्वाज (स्वतंत्र लेखक/स्तंभकार)
संरचना का क्षरण
भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार अभूतपूर्व रहा है। विश्वविद्यालय, सीटें और शोधार्थी, सभी की संख्या बढ़ी है। पर इसी विस्तार के भीतर शोध का चरित्र भी बदल रहा है। अब दबाव केवल शोधार्थी पर नहीं, संस्थानों पर भी है। रैंकिंग, ग्रांट, स्थायीकरण और प्रतिष्ठा सब कुछ प्रकाशनों की संख्या से बंध गया है। परिणाम यह कि “कितना” अक्सर “क्या” को विस्थापित कर देता है। जब मूल्यांकन संख्या से होगा, तो व्यवहार भी संख्या के अनुसार ढलेगा। पारदर्शिता के लिए लाई गई व्यवस्थाएं, जैसे एपीआई, धीरे-धीरे मेट्रिक्स के ऐसे ढांचे में बदल गईं, जहां गणना ने गुण पर अधिकार जमा लिया। शोधपत्र ज्ञान-सृजन का माध्यम कम, मूल्यांकन की मुद्रा अधिक बन गए। यही मुद्रा नियुक्ति, पदोन्नति और वेतन-वृद्धि से जुड़कर शोध को बाध्यता में बदल देती है। जब शोध बाध्यता बनता है, तो जिज्ञासा पीछे हटती है। जो प्रक्रिया प्रश्नों से शुरू होकर अनिश्चितताओं से गुजरती है, वह लक्ष्य-पूर्ति का औपचारिक अभ्यास बन जाती है। ऐसे में शॉर्टकट अपवाद नहीं, अनिवार्य परिणाम होते हैं। संख्या बढ़ती है, पर अर्थ सिकुड़ता जाता है। इस दबाव का एक स्पष्ट रूप पीएचडी शोध में दिखाई देता है। कई संस्थानों में थीसिस के साथ निश्चित संख्या में शोधपत्रों की अपेक्षा की जाती है। परिणामस्वरूप शोध का प्रश्न ही बदल जाता है- अब यह जानने के लिए नहीं कि क्या खोजा जाना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि कितना प्रकाशित किया जा सके। इस सूक्ष्म परिवर्तन से शोध की दिशा ही नहीं, उसका उद्देश्य भी बदल जाता है। यहीं पेड-पेपर संस्कृति अपनी जड़ें जमाती है। एजेंसियां अब केवल लेखन नहीं करतीं, वे लेखक-पद उपलब्ध कराती हैं, प्रकाशन सुनिश्चित करती हैं और पूरी थीसिस तक तैयार कर देती हैं। शोध-प्रस्ताव से निष्कर्ष तक सब कुछ आउटसोर्स किया जा सकता है। ऐसे में डिग्री ज्ञान का प्रमाण नहीं, प्रक्रिया-पूर्ति का प्रमाणपत्र बन जाती है। यह केवल व्यक्तिगत अनैतिकता नहीं, यह उस संरचना का क्षरण है, जिसने संख्या को गुणवत्ता से ऊपर स्थापित कर दिया है।
मनोवैज्ञानिक पक्ष
प्रीडेटरी और क्लोन जर्नल इस संरचना के स्वाभाविक विस्तार हैं। नकली इम्पैक्ट फैक्टर, संदिग्ध संपादकीय बोर्ड और औपचारिक सहकर्मी समीक्षा के सहारे वैधता का भ्रम निर्मित किया जाता है। वे इस संकट के कारण नहीं, बल्कि उसकी मांग का उत्तर हैं। जब मूल्यांकन गिनती से होगा, तो बाजार गिनती उपलब्ध कराएगा, लेकिन इस पूरे परिदृश्य का सबसे गंभीर पक्ष कहीं और है। यह केवल शोध के पतन की कहानी नहीं, यह सत्य के अवमूल्यन की कहानी है। जब ज्ञान का मूल्य उसकी संख्या से तय होने लगे, तो सत्य धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाता है। वह आवश्यक नहीं, वैकल्पिक बन जाता है। यहीं से एक गहरी बौद्धिक समस्या जन्म लेती है। आज अकादमिक जगत में “दिखना” “समझना” पर भारी पड़ रहा है। शोधार्थी और शिक्षक दोनों ही एक ऐसे तंत्र में कार्य कर रहे हैं, जहां उनकी पहचान उनके प्रकाशनों की सूची से निर्धारित होती है। सूची जितनी लंबी, वैधता उतनी अधिक चाहे उसमें विचार की गहराई हो या न हो।
इस प्रवृत्ति का मनोवैज्ञानिक पक्ष भी स्पष्ट है। जब सफलता का संकेत बार-बार मात्रा में दिया जाता है, तो व्यक्ति उसी दिशा में अपने प्रयास केंद्रित करता है। गहन, धीमा और अनिश्चित शोध कम आकर्षक हो जाता है, जबकि त्वरित और सुनिश्चित प्रकाशन अधिक व्यावहारिक विकल्प बन जाता है। इस प्रकार, अनैतिकता विचलन नहीं रह जाती; वह तंत्र के भीतर एक तार्किक अनुकूलन बन जाती है। यहां शोध के समय-चक्र का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। वास्तविक शोध धीमा होता है- वह संदेहों, असफलताओं और पुनर्विचारों से गुजरता है, लेकिन जब उसी प्रक्रिया को समयबद्ध लक्ष्यों में बांध दिया जाता है, तो उसकी प्रकृति बदल जाती है। “सात दिन में स्कोपस पेपर” केवल एक दावा नहीं, यह उस अधीरता का प्रतीक है, जिसने गहराई को गति से बदल दिया है। इसका प्रभाव केवल वर्तमान शोध तक सीमित नहीं रहता; यह ज्ञान की पूरी संरचना को प्रभावित करता है। जब संदिग्ध शोध संदर्भ बनते हैं, तो त्रुटियां आगे बढ़ती हैं। धीरे-धीरे समस्या व्यक्तिगत नहीं, प्रणालीगत हो जाती है, जहां सत्य और प्रमाण दोनों संदिग्ध होने लगते हैं।
केवल डिग्री प्रदाता न बनें विश्वविद्यालय
ऐसे समय में चीन जैसे कुछ देशों द्वारा शोध मूल्यांकन के मानकों में बदलाव संकेत देता है कि दिशा बदली जा सकती है। कुछ क्षेत्रों/विषयों में प्रकाशनों की संख्या से हटकर वास्तविक योगदान- चाहे वह समाधान हो, नवाचार हो या सामाजिक प्रभाव को महत्व देना एक प्रयास है, संतुलन बहाल करने का। यह कोई पूर्ण मॉडल नहीं, लेकिन यह स्वीकारोक्ति अवश्य है कि मेट्रिक्स पर्याप्त नहीं हैं। भारत के संदर्भ में यह प्रश्न और जटिल है। यहां मानविकी और सामाजिक विज्ञान की समृद्ध परंपरा है, जहां हर शोध किसी ठोस उत्पाद में परिणत नहीं होता, लेकिन प्रश्न वही बना रहता है क्या हम संख्या से आगे बढ़कर अर्थ को प्राथमिकता दे सकते हैं?
नीतिगत सुधार आवश्यक हैं, पर पर्याप्त नहीं। मूल्यांकन व्यवस्थाओं में मौलिकता, गहराई और प्रासंगिकता को स्थान देना होगा। संस्थागत रैंकिंग में प्रभाव को गिनती से ऊपर रखना होगा, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन उस दृष्टिकोण में होना चाहिए, जो शोध को देखता है। क्योंकि अंततः, संकट शोध का नहीं है, संकट उस तरीके का है, जिससे हम उसे मापते हैं। जब माप ही गलत हो, तो परिणाम भी विकृत होंगे।
विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं होते, वे समाज के आत्मचिंतन के स्थल होते हैं। यदि वहां सत्य की जगह मेट्रिक्स और लेन-देन स्थापित हो जाएं, तो यह आत्मचिंतन भी औपचारिकता बन जाता है। डिग्रियां बढ़ सकती हैं, रैंकिंग सुधर सकती है, लेकिन ज्ञान का आधार कमजोर हो जाता है। इसलिए, आवश्यकता केवल सुधार की नहीं, पुनर्स्थापन की है—उस मूल प्रश्न की ओर लौटने की, जिससे हर शोध शुरू होता है: हम क्यों खोज रहे हैं? यदि यह प्रश्न ईमानदारी से पूछा जाएगा, तो उत्तर हमें स्वयं उस दिशा में ले जाएगा, जहाँ शोध फिर से जिज्ञासा, गहराई और सत्य से जुड़ सके।क्योंकि अंततः, शोध का संकट प्रकाशनों की अधिकता नहीं है—सत्य की कमी है। और जहाँ सत्य कम पड़ने लगे, वहां साख टिकती नहीं; वह केवल दिखाई देती है, रहती नहीं।
