प्रसंगवश : बदलते बाजार में छोटे दुकानदार और अस्तित्व का संकट

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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SANJIV MEHROTRA
संजीव मेहरोत्रा,
रिटायर्ड बैंककर्मी

 

भारत की आर्थिक संरचना को यदि जमीनी स्तर पर समझना हो, तो इसके लिए किसी बड़े औद्योगिक घराने या शेयर बाजार के आंकड़ों को देखने की आवश्यकता नहीं, बल्कि देश के गांवों, कस्बों और शहरों की गलियों में मौजूद छोटी किराना दुकानों को देखना पर्याप्त है। दशकों से ये दुकानें भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था का अभिन्न हिस्सा रही हैं। सुबह की चाय से लेकर महीने भर के राशन तक, हर जरूरत के लिए आम नागरिक का पहला भरोसा स्थानीय किराना दुकानदार ही रहा है। यह केवल व्यापार नहीं, बल्कि विश्वास, सुविधा और सामाजिक संबंधों का ऐसा तंत्र है, जिसने भारतीय खुदरा बाजार को मजबूत आधार दिया है।

अब यह पारंपरिक व्यवस्था एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। डिजिटल तकनीक, ई-कॉमर्स और तेजी से उभरते क्विक-कॉमर्स मॉडल ने रिटेल बाजार की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी है। आज उपभोक्ता के हाथ में स्मार्टफोन है, इंटरनेट की पहुंच तेजी से बढ़ रही है और कुछ ही मिनटों में घर तक सामान पहुंचाने का वादा करने वाली कंपनियां ग्राहकों की खरीदारी की आदतों को बदल रही हैं। महानगरों में शुरू हुई यह प्रतिस्पर्धा अब छोटे शहरों और कस्बों तक पहुंचने लगी है।

Amazon, Flipkart और अन्य क्विक-कॉमर्स प्लेटफॉर्म अब टियर-2 और टियर-3 शहरों की ओर तेजी से विस्तार कर रहे हैं। इसके पीछे कई आर्थिक कारण हैं— छोटे शहरों में अपेक्षाकृत कम किराया, सस्ती श्रम लागत, तेजी से बढ़ता डिजिटल भुगतान और इंटरनेट उपयोग। इन कंपनियों की रणनीति का केंद्र ‘डार्क स्टोर’ मॉडल है, जहां छोटे-छोटे वेयरहाउस बनाकर उपभोक्ताओं तक 10 से 20 मिनट में सामान पहुंचाने की व्यवस्था की जाती है। यह मॉडल सुविधा और गति के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।

भारत में आज भी करीब 1.3 करोड़ से अधिक किराना दुकानें मौजूद हैं, जो देश के खुदरा बाजार की रीढ़ मानी जाती हैं। करोड़ों परिवार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस व्यापार से जुड़े हुए हैं। ऐसे में जब बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म तेजी से बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा रहे हैं, तो स्वाभाविक रूप से छोटे व्यापारियों के सामने प्रतिस्पर्धा का दबाव बढ़ रहा है। बाजार विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में पारंपरिक किराना दुकानों की हिस्सेदारी में धीरे-धीरे कमी आ सकती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां डिजिटल उपभोक्तावाद तेजी से बढ़ रहा है।

यह मान लेना भी गलत होगा कि किराना दुकानों का अस्तित्व पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। भारत का सामाजिक और आर्थिक ढांचा अभी भी स्थानीय संबंधों और व्यक्तिगत भरोसे पर आधारित है। किराना दुकानदार अपने ग्राहकों की पसंद जानते हैं, जरूरत पड़ने पर उधार देते हैं, घर तक सामान पहुंचाते हैं और कई बार संकट की घड़ी में सामाजिक सहयोगी की भूमिका भी निभाते हैं। यह मानवीय संबंध किसी मोबाइल ऐप या एल्गोरिद्म से आसानी से प्रतिस्थापित नहीं किए जा सकते। यही छोटे व्यापार की सबसे बड़ी ताकत है।

फिर भी बदलते समय के साथ बदलाव स्वीकार करना अब अनिवार्य हो गया है। यदि छोटे व्यापारी केवल पारंपरिक तरीके पर निर्भर रहेंगे, तो प्रतिस्पर्धा कठिन होती जाएगी। डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन ऑर्डर, व्हाट्सऐप बुकिंग, लोकल होम डिलीवरी और स्टॉक प्रबंधन जैसी तकनीकों को अपनाकर वे अपनी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ा सकते हैं। देश के कई हिस्सों में छोटे दुकानदार अब तकनीक को अपनाकर सफलतापूर्वक ग्राहकों को जोड़े हुए हैं।

यहां सरकार और वित्तीय संस्थानों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। छोटे व्यापारियों को सस्ती पूंजी, डिजिटल प्रशिक्षण, तकनीकी सहायता और कर व्यवस्था में सरलता उपलब्ध कराना समय की मांग है। यदि विकास का मॉडल केवल बड़ी कंपनियों तक सीमित रह गया, तो असंगठित खुदरा क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है। (ये लेखक के निजी विचार हैं) 

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