संपादकीय : पंचायत और प्रश्न 

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Published By Monis Khan
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उत्तर प्रदेश की कैबिनेट बैठक में पंचायत चुनावों के लिए पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन और उसे शुरुआती तौर पर छह माह का कार्यकाल देने के बाद यह साफ हो गया है कि राज्य में जो पंचायत चुनाव अप्रैल 2026 से पहले हो जाने चाहिए थे, वे अब मार्च 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों के बाद ही होंगे। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों में हो रही देरी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। आयोग गठन से लेकर रैपिड सर्वे, आंकड़ा संकलन, पंचायतवार विश्लेषण, रिपोर्ट तैयार करने, आरक्षण निर्धारण और फिर चुनाव अधिसूचना जारी होने तक की प्रक्रिया अत्यंत लंबी है। यदि आयोग की रिपोर्ट वर्ष के अंत तक आती है, तो उसके बाद प्रशासनिक और कानूनी औपचारिकताओं में कई महीने और लग जाएंगे। 

सरकार का तर्क है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित ‘ट्रिपल टेस्ट’ के अनुरूप वैज्ञानिक आधार पर आरक्षण तय करना आवश्यक है, अन्यथा चुनाव कानूनी चुनौती में फंस सकते हैं। यह तर्क संवैधानिक रूप से उचित प्रतीत होता है, इसलिए इसको इस राजनीतिक संदर्भ में देखना कि पंचायत चुनाव औपचारिक रूप से भले ही गैर-दलीय हों, लेकिन व्यवहार में वे हर दल की संगठनात्मक शक्ति और सामाजिक पकड़ की परीक्षा होते हैं। इन चुनावों में स्थानीय गुटबाजी, जातीय ध्रुवीकरण, परिवारवाद और दलों के भीतर बगावत खुलकर सामने आती है। 

कई बार सत्ता पक्ष को भी स्थानीय स्तर पर अप्रत्याशित विरोध झेलना पड़ता है। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले ऐसा जोखिम कोई भी दल नहीं लेना चाहता, इसलिए सरकार पंचायत चुनावों को विधानसभा चुनाव के बाद तक टालना राजनीतिक रूप से अधिक सुविधाजनक मान रही है, उचित नहीं। राजनीतिक लाभ-हानि से इतर यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है कि यदि पिछड़ा वर्ग आयोग पंचायतों में ओबीसी की वास्तविक सामाजिक स्थिति का समकालीन और अनुभवजन्य अध्ययन करता है, तो यह भविष्य की आरक्षण व्यवस्था को अधिक वैज्ञानिक और संवैधानिक आधार दे सकता है। 

पंचायतवार जनसंख्या, सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक भागीदारी का सूक्ष्म अध्ययन ग्रामीण सत्ता संरचना को अधिक संतुलित बना सकता है। यदि सर्वेक्षण में कई क्षेत्रों में पिछड़े वर्गों की आबादी अपेक्षा से अधिक पाई जाती है, तो पंचायतों में उनकी सीटें, राजनीतिक हिस्सेदारी और सियासी हैसियत बढ़ सकती है। पंचायत राजनीति में ‘सरपंच पति’, स्थानीय दबंगई और आर्थिक वर्चस्व जैसी विकृतियां पहले से मौजूद हैं। 

यदि आयोग इन प्रश्नों को भी संबोधित करता है, तभी यह प्रक्रिया वास्तविक सामाजिक न्याय की दिशा में सार्थक मानी जाएगी। ऐसे में कुल मिलाकर यह मुद्दा केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक, सामाजिक महत्व का बन गया है। पंचायत चुनाव केवल स्थानीय प्रतिनिधियों के चयन की सामान्य चुनावी प्रक्रिया नहीं, बल्कि सामाजिक शक्ति-संतुलन, जातीय प्रतिनिधित्व, ग्रामीण नेतृत्व और लोकतांत्रिक भागीदारी की सबसे व्यापक प्रयोगशाला है। 

पंचायत चुनावों की देरी लोकतांत्रिक दृष्टि से स्वस्थ संकेत नहीं है। चूंकि स्थानीय निकाय लोकतंत्र की नींव हैं; उन्हें लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया और राजनीतिक गणनाओं के कारण अनिश्चितकाल तक टालना उचित नहीं कहा जा सकता। उत्तर प्रदेश के सामने चुनौती केवल चुनाव कराने की नहीं, बल्कि ऐसी पंचायत व्यवस्था बनाने की है, जो सामाजिक प्रतिनिधित्व, संवैधानिक न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी— तीनों को वास्तविक अर्थों में मजबूत कर सके।