संपादकीय: आपदाओं का दशक
नीदरलैंड की धरती से प्रधानमंत्री का यह कहना कि ‘यह दशक दुनिया के लिए आपदाओं का दशक बनता जा रहा है’ बदलती वैश्विक अर्थ-राजनीति का गंभीर आकलन है। कोरोना महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का तनाव, ऊर्जा संकट, आपूर्ति शृंखलाओं का टूटना, जलवायु आपदाएं और संरक्षणवादी अर्थनीतियां—इन सबने मिलकर विश्व व्यवस्था को जिस तरह अस्थिर कर दिया है, उससे दशकों की विकास उपलब्धियां मिट सकती हैं। नीदरलैंड स्वयं भी इस संकट से अछूता नहीं।
पिछले वर्षों में उसने भीषण बाढ़, समुद्री तूफानों, ऊर्जा महंगाई और आपूर्ति संकट का सामना किया है। यूरोप में गैस संकट ने उसकी औद्योगिक लागत बढ़ाई, जबकि वैश्विक व्यापार में मंदी ने उसके बंदरगाह-आधारित व्यापार मॉडल को प्रभावित किया। भविष्य में समुद्री जलस्तर वृद्धि, कृषि पर जलवायु दबाव और साइबर-सुरक्षा संकटों की आशंका, वहां गंभीर नीति-विमर्श का विषय हैं, इसलिए मोदी का ‘आपदाओं का दशक’ वाला कथन शेष दुनिया के साथ डच नेतृत्व के लिए भी अत्यंत प्रासंगिक था।
विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि महामारी और युद्धों ने करोड़ों लोगों को पुनः गरीबी की ओर धकेला है। महंगाई, ऊर्जा मूल्य वृद्धि और रोजगार संकट का सबसे अधिक असर निम्न एवं मध्यम आय वर्ग पर डालते हैं। भारत में यह चिंता और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहां अभी भी बड़ी आबादी बहुआयामी गरीबी से जूझ रही है और लगभग 80 करोड़ लोग राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत मुफ्त राशन पर निर्भर हैं। तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद आय-विषमता, ग्रामीण संकट और अनौपचारिक रोजगार भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोर नसें हैं।
भारत के पास विशाल बाजार, युवा जनसंख्या, डिजिटल अवसंरचना और दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप नेटवर्क है, परंतु वैश्विक मंदी, ऊर्जा झटके और व्यापार अवरोध भारतीय निर्यात, रोजगार और निवेश को प्रभावित कर सकते हैं। इन संदर्भों में नीदरलैंड यात्रा का आर्थिक पक्ष महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने डच कंपनियों को भारत में ‘डिजाइन, इनोवेशन और निवेश’ का निमंत्रण दिया है। विशेष रूप से सेमीकंडक्टर, हरित ऊर्जा, बंदरगाह, जल प्रबंधन, कृषि तकनीक और रक्षा विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में सहयोग भारत को तकनीकी बढ़त दे सकता है। भारत-नीदरलैंड के बीच हुए 17 समझौतों में सबसे महत्वपूर्ण सेमीकंडक्टर एवं उच्च प्रौद्योगिकी सहयोग माना जा रहा है। टाटा इलेक्ट्रानिक्स और एएसएमएल के बीच समझौता भारत की चिप निर्माण महत्वाकांक्षा को गति दे सकता है।
यदि भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला में विश्वसनीय केंद्र बनता है, तो इससे विनिर्माण, रोजगार और निर्यात इन तीनों क्षेत्रों को बड़ा लाभ होगा। नीदरलैंड भारत का 11वां सबसे बड़ा व्यापार साझेदार और चौथा सबसे बड़ा निवेशक है। रणनीतिक साझेदारी के स्तर तक संबंधों का उन्नयन भविष्य में यूरोप के लिए वह भारत के लिए उसका प्रवेश-द्वार और यूरोपीय तकनीक एवं पूंजी का स्रोत बना सकता है। दरअसल, प्रधानमंत्री की चेतावनी का मूल संदेश यही है कि आज का वैश्विक संकट केवल युद्ध या ऊर्जा तक सीमित नहीं, बल्कि यह देशों के विकास मॉडल की परीक्षा है। भारत के लिए चुनौती केवल तेज वृद्धि बनाए रखना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि अगला वैश्विक झटका करोड़ों लोगों को फिर से गरीबी में न धकेल दे।
