संपादकीय : सोने पर शिकंजा
सरकार द्वारा सोना और चांदी के आयात शुल्क को 15 प्रतिशत करने का निर्णय कर संशोधन ही नहीं देश की व्यापक आर्थिक चिंता का संकेत है। डॉलर की मजबूती और आयात बिल में तेज वृद्धि से उपजे दबाव के बीच सरकार ने यह संदेश दिया है कि सोना केवल आभूषण नहीं, विदेशी मुद्रा पर भारी बोझ भी है। देश अपनी आवश्यकता का अधिकांश सोना आयात करता है। जब तेल और सोना दोनों का आयात बढ़ता है, तो चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव बढ़ने लगता है। सोना उत्पादन, रोजगार या निर्यात क्षमता में प्रत्यक्ष योगदान अपेक्षाकृत कम देता है, जबकि इसके आयात में भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने हाल में लोगों से सोने की अनावश्यक खरीद कम करने की अपील की थी। उस अपील के बाद सोने की खरीद में कथित रूप से लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। यानी लोगों ने संकट की आशंका में सोने की ‘पैनिक बाइंग’ शुरू कर दी। सरकार का यह फैसला इस मांग को भी नियंत्रित करेगा। 2024 में सरकार ने सोने पर आयात शुल्क 15 प्रतिशत से घटाकर लगभग छह प्रतिशत किया था, ताकि तस्करी कम हो और ज्वेलरी उद्योग को राहत मिले, लेकिन अब परिस्थितियां बदल चुकी हैं। विदेशी मुद्रा भंडार, डॉलर की मांग और वैश्विक अनिश्चितता ने सरकार को फिर से कठोर कदम उठाने पर मजबूर किया है।
लागत, बीमा, माल ढुलाई और विभिन्न उपकरों को जोड़ने पर प्रभावी कर भार लगभग 18 प्रतिशत से अधिक बैठता है। यानी अब उपभोक्ता 10 ग्राम सोने की वास्तविक कीमत के साथ-साथ तकरीबन तीस हजार तक कर भी चुकाना होगा। सर्राफा कारोबारियों की लागत बढ़ेगी और उसका बोझ ग्राहकों तक पहुंचेगा। इसका मतलब है शादी-ब्याह, निवेश और पारंपरिक खरीद अब पहले से अधिक महंगी हो जाएगी। ज्वेलरी उद्योग, जो 50 लाख से अधिक कारीगरों और छोटे व्यापारियों को रोजगार देता है, दबाव में आ जाएगा। सिर्फ ज्वेलरी क्षेत्र ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक्स, प्रिसीजन इंजीनियरिंग और रिसाइक्लिंग उद्योग भी प्रभावित होंगे, जहां कीमती धातुओं का उपयोग होता है। इससे कई दूसरे उत्पादों की लागत बढ़ सकती है। दूसरी ओर, जब वैध आयात अत्यधिक महंगा हो जाता है, तो तस्करी और ग्रे मार्केट सक्रिय हो जाते हैं। दुबई, दक्षिण-पूर्व एशिया और सीमा पार नेटवर्क के माध्यम से अवैध सोने की आवक फिर बढ़ सकती है। सरकार का अनुमान हो सकता है कि आयात में 15 से 20 प्रतिशत तक गिरावट आएगी, लेकिन यह तभी संभव है, जब तस्करी नियंत्रित रहे। अन्यथा वैध आयात घटेगा और अवैध व्यापार बढ़ेगा।
सरकार के पास विकल्प भी थे। वह गोल्ड बॉन्ड, डिजिटल गोल्ड, गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम और घरेलू रिसाइक्लिंग को अधिक आकर्षक बना सकती थी। लोगों को वित्तीय निवेश के बेहतर विकल्प देकर सोने पर निर्भरता कम की जा सकती थी, लेकिन तात्कालिक संकटों में सरकारों के लिए सबसे आसान उपाय आयात शुल्क बढ़ाना ही लगा। यह निर्णय अर्थव्यवस्था और समाज के बीच संतुलन की परीक्षा है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि विदेशी मुद्रा बचाने की कोशिश कहीं वैध कारोबार, रोजगार और बाजार की पारदर्शिता को नुकसान न पहुंचा दे।
