संपादकीय : विस्तार के संदेश
उत्तर प्रदेश में लंबे इंतजार के बाद हुआ मंत्रिमंडल विस्तार आगामी विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा की व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। मुख्यमंत्री की टीम में छह नए चेहरों को शामिल करना और दो मंत्रियों को पदोन्नति देना इस बात का संकेत है कि भाजपा चुनाव से पहले संगठन, सरकार और सामाजिक समीकरणों के बीच नया संतुलन स्थापित करना चाहती है। यह विस्तार ऐसे समय हुआ है जब राज्य में चुनावी तैयारियां तेज हो चुकी हैं और हर राजनीतिक दल अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने में जुटा है।
2017 से ही योगी सरकार स्थिर और प्रभावी काम कर रही है फिर भी विस्तार की आवश्यकता इसलिए थी, क्योंकि कोई भी सरकार चुनाव से पहले उपलब्धियों के भरोसे रहने के साथ सामाजिक प्रतिनिधित्व, क्षेत्रीय असंतोष और संगठनात्मक संदेशों को भी संतुलित करने का प्रयास करती है। भाजपा समझती है कि उत्तर प्रदेश जैसा विशाल और विविध राज्य केवल प्रशासनिक प्रदर्शन से नहीं, बल्कि जातीय, क्षेत्रीय और राजनीतिक सहभागिता के संतुलन से भी संचालित होता है। विस्तार का सबसे बड़ा सकारात्मक पहलू यह है कि इसमें विभिन्न सामाजिक समूहों और क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास है। गैर-यादव पिछड़ा वर्ग, गैर-जाटव दलित समुदायों और क्षेत्रीय जातीय समूहों के बीच आधार मजबूत करती जा रही, भाजपा ने मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए इन वर्गों को यह संदेश दिया गया कि सरकार में उनकी भागीदारी बनी हुई है। यह केवल सत्ता-साझेदारी नहीं, बल्कि चुनावी मनोविज्ञान का भी हिस्सा है। नए मंत्री अगले नौ महीनों में नई नीतियां बनाने, लागू करने, उनके परिणाम जमीन पर दिखाने का विकासात्मक चमत्कार संभवतः नहीं कर पाएंगे। ऐसे में इस विस्तार का उद्देश्य तत्काल प्रशासनिक बदलाव से अधिक राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रभाव पैदा करना लगता है।
नए मंत्री अपने विभागों के जरिए स्थानीय स्तर पर सक्रियता बढ़ाएंगे, संगठन और सरकार के बीच संपर्क मजबूत करेंगे और चुनाव से पहले सरकार के पक्ष में वातावरण बनाएंगे, हालांकि इस प्रक्रिया का एक दूसरा पक्ष भी है। जिन मंत्रियों के विभागों का कार्यभार कम किया जाएगा, उनके बारे में यह संदेश जा सकता है कि वे अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाए, लेकिन राजनीति में यह केवल ‘असफलता’ का संकेत नहीं होता; कई बार यह चुनावी संतुलन साधने की अनिवार्यता भी होती है। भाजपा नेतृत्व संभवतः यह संदेश देना चाहता है कि सरकार गतिशील है और समय-समय पर बदलाव करने को तैयार है। मंत्रियों की संख्या और गुड गवर्नेंस में कोई सीधा संबंध नहीं है। अधिक मंत्री बना देने से शासन बेहतर नहीं हो जाता। प्रशासनिक दक्षता अंततः निर्णय क्षमता, नौकरशाही के साथ समन्वय और नीतियों के क्रियान्वयन पर निर्भर करती है। फिर भी बड़े मंत्रिमंडल कई बार बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो देते हैं, हालांकि समन्वय की जटिलताएं भी बढ़ाते हैं। मंत्रिमंडल विस्तार से सरकारी खर्च बढ़ता है। नए मंत्रियों के कार्यालय, स्टाफ, सुरक्षा और सुविधाओं पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है, लेकिन भारतीय राजनीति में इसे अक्सर ‘राजनीतिक निवेश’ के रूप में देखा जाता है, खासकर चुनावी वर्ष में। यदि नए मंत्री भ्रष्टाचार नियंत्रण, त्वरित निर्णय, स्थानीय जवाबदेही और जन सुनवाई को प्राथमिकता देंगे, तभी जनता को इस विस्तार से उपजे सुशासन का अनुभव होगा।
