संपादकीय:पश्चिम बंगाल में हिंसा

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Published By Monis Khan
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पश्चिम बंगाल में भड़की हिंसा के दौरान राजनीतिक कार्यकर्ताओं की हत्याएं, पार्टी कार्यालयों में आगजनी, घरों पर हमले और पलायन जैसी घटनाएं कानून-व्यवस्था की विफलता के साथ ही लोकतांत्रिक संस्कृति पर गहरे संकट का संकेत हैं। बंगाल में चुनाव बाद हिंसा नई घटना नहीं है, वामपंथी दौर से लेकर तृणमूल कांग्रेस के उदय तक की यही कहानी है, पर सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक संघर्ष की वर्तमान घटनाओं को बंगाल की उस हिंसक राजनीतिक परंपरा का हवाला देकर इस हिंसा को सामान्य नहीं कह सकते।

राजनीतिक मतभेद अब वैचारिक संघर्ष न रहकर सामाजिक प्रतिशोध का रूप लेते जा रहे हैं। सबसे भयावह पहलू यह है कि हमले केवल पार्टी कार्यालयों तक सीमित नहीं, बल्कि घरों तक पहुंच रहे हैं। जब परिवार, महिलाएं और बच्चे राजनीतिक संघर्ष की कीमत चुकाने लगें, तब यह केवल राजनीतिक संकट नहीं, सामाजिक विघटन का संकेत होता है। किसी भी लोकतंत्र में चुनाव जनादेश का उत्सव होना चाहिए, भय और बदले का नहीं। इस संदर्भ में नेताओं की भाषा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। 

ममता बनर्जी के चुनाव परिणामों और चुनाव आयोग को लेकर आक्रामक तथा अड़ियल रुख को उनके समर्थकों ने किस रूप में लिया, यह गंभीर प्रश्न है। जब शीर्ष नेतृत्व लगातार यह संदेश दे कि जनादेश ‘छीन’ लिया गया है, तो कार्यकर्ताओं में उग्रता बढ़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर भाजपा नेताओं की भाषा भी संयमित नहीं रही। यह कहना कि ‘सबका साथ, सबका विकास के बाद अब सबका हिसाब होगा’ निश्चित रूप से उत्तेजक और प्रतिशोधात्मक संदेश देता है। लोकतंत्र में ‘हिसाब’ चुनाव से होता है, सड़क की हिंसा से नहीं। 

सुरक्षा तंत्र की विफलता और भी गंभीर मसला है। चुनाव से पहले भारी केंद्रीय बलों की तैनाती की गई थी। कहा गया कि कोलकाता में मणिपुर से भी अधिक सुरक्षाबल मौजूद हैं। गृह मंत्रालय ने दूरदर्शिता दिखाते हुए चुनाव के बाद भी केंद्रीय बल बनाए रखने का निर्णय लिया था। इसके बावजूद यदि हिंसा भड़कती है, फैलती है और हत्याओं तक पहुंच जाती है, तो यह केवल राजनीतिक दलों की नहीं, प्रशासनिक तंत्र की भी असफलता है। ढाई लाख सुरक्षाबलों और स्थानीय पुलिस की मौजूदगी के बावजूद यदि खुफिया तंत्र हिंसा की आशंका नहीं भांप पाया, तो जवाबदेही तय होनी ही चाहिए। 

भाजपा का यह आरोप कि हतोत्साहित तृणमूल कार्यकर्ता हिंसा फैला रहे हैं, आंशिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन राजनीतिक हिंसा अक्सर एकतरफा नहीं होती; प्रतिशोध और प्रतिक्रिया का चक्र दोनों पक्षों को इसमें शामिल कर देता है। यदि तृणमूल के कार्यालय और कार्यकर्ता अधिक निशाने पर हैं, तो यह भी संभव है कि हिंसा बहुपक्षीय रूप ले चुकी हो। केंद्र सरकार संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर अतिरिक्त बल, त्वरित गिरफ्तारी, संयुक्त नियंत्रण कक्ष और राज्य सरकार पर अधिक दबाव जैसे कदम पहले उठा सकती थी। अब भी आवश्यकता संयुक्त शांति प्रयास की है। संभव है गृहमंत्री पहुंचने तक हिंसा रुक जाए। फिलहाल बंगाल को यह समझना होगा कि हिंसा से कोई स्थायी सियासी सफलता नहीं मिल सकती। यदि राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को संयम नहीं सिखा सके, तो अंततः सबसे बड़ी हार जनता और लोकतंत्र दोनों की होगी।