संपादकीय:मुश्किल में महाबली

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Published By Monis Khan
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महाबली मुश्किल में हैं। ट्रंप की कठिनाइयां बढ़ती जा रही हैं। पुतिन द्वारा ट्रंप को ईरान पर दोबारा हमला न करने की चेतावनी और ईरान का परमाणु कार्यक्रम पर समझौता न करने के एलान तथा अमेरिका मुक्त भविष्य के आह्वान ने ट्रंप तथा अमेरिकी नीति-निर्माताओं के लिए दुविधा की स्थिति पैदा कर दी है। ट्रंप को एक ओर घरेलू राजनीति में कठोर नेता की छवि बनाए रखनी है, वहीं दूसरी ओर खाड़ी क्षेत्र में फैले अमेरिकी सैन्य ठिकानों और सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। यदि अमेरिका आक्रामक कार्रवाई करता है, तो क्षेत्रीय युद्ध का खतरा बढ़ेगा और यदि संयम दिखाता है, तो उसकी वैश्विक साख पर प्रश्न उठेंगे। 

पश्चिम एशिया में अमेरिका, रूस और ईरान के बीच उभरता त्रिकोणीय तनाव केवल क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन का प्रश्न नहीं, बल्कि वैश्विक रणनीतिक समीकरणों की नई जटिलता का संकेत है। अमेरिका के खाड़ी देशों में कतर, बहरीन और यूएई में सैन्य अड्डे उसकी शक्ति-प्रदर्शन की रीढ़ हैं। इनकी सुरक्षा पर संदेह का मतलब उसके लिए केवल सैन्य चुनौती नहीं, बल्कि कूटनीतिक प्रतिष्ठा का भी प्रश्न बन जाता है। हालिया घटनाक्रमों ने यह संकेत दिया कि अमेरिका उन्हें पूर्ण सुरक्षा की गारंटी देने की स्थिति में नहीं है, जिससे ट्रंप की छवि पर बुरा असर पड़ा है। ट्रंप के लिए बड़ी चुनौती अमेरिकी कांग्रेस की स्वीकृति के बिना युद्ध जैसी कार्रवाई जारी रखना है। 

यह संवैधानिक बाध्यता है, जिसे दरकिनार करना आसान नहीं, इसलिए वे सीमित सैन्य कदमों या कार्यकारी अधिकारों का सहारा लेकर संतुलन बनाने की कोशिश कर सकते हैं। ट्रंप खाड़ी से तो नहीं निकलेंगे, क्योंकि इस वापसी से चीन और रूस के लिए प्रभाव बढ़ाने का अवसर खुल जाएगा, पर इस दुविधा से बाहर निकलने के लिए ट्रंप के पास तीन विकल्प हैं— पहला, सीमित सैन्य कार्रवाई कर दबाव बनाना; दूसरा, कूटनीतिक वार्ता के जरिए तनाव कम करना; और तीसरा, रणनीतिक ‘डि-एस्केलेशन’ यानी धीरे-धीरे क्षेत्रीय संलिप्तता कम करना। फिलहाल यदि रूस ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार को सुरक्षित रखने का ‘तीसरा पक्ष’ बनता है, तो यह एक नई कूटनीतिक व्यवस्था की शुरुआत हो सकती है, लेकिन इसके बदले यूक्रेन युद्ध समाप्त करने जैसी अमेरिकी शर्तें यथार्थवादी नहीं हैं। पुतिन अमेरिकी दबाव में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता नहीं खोएंगे।  

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती ‘जुबानी जंग’ दरअसल मनोवैज्ञानिक दबाव की रणनीति है। ईरान ‘अमेरिका-मुक्त भविष्य’ की बात कर अपनी जनता और क्षेत्रीय सहयोगियों को संदेश दे रहा है, जबकि अमेरिका आक्रामक बयान देकर अपने सहयोगियों को आश्वस्त करना चाहता है। जहां तक आशंकित युद्ध या स्थाई युद्धविराम का प्रश्न है, वर्तमान संकेत ‘नियंत्रित तनाव’ की ओर इशारा करते हैं। गंभीर आर्थिक और राजनीतिक परिणाम देखते हुए अमेरिका और इजराइल दोनों व्यापक युद्ध के हामी नहीं हैं। बयानबाजी के बावजूद अस्थायी युद्धविराम जारी रहने की संभावना अधिक है। पश्चिम एशिया में वर्तमान स्थिति ‘न तो युद्ध, न पूर्ण शांति’ की है। ट्रंप की रणनीति अब केवल शक्ति-प्रदर्शन नहीं, बल्कि संतुलन साधने की कला पर निर्भर करेगी। यदि कूटनीति और संयम का रास्ता नहीं अपनाया गया, तो यह गतिरोध किसी बड़े संघर्ष में बदल सकता है, जिसका प्रभाव भारत पर भी पड़ेगा।