संपादकीय:प्रतिरोध से उठे प्रश्न

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Published By Monis Khan
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अमेरिका में वाइट हाउस कॉरेसपॉन्डेंट्स एशोसिएशन के वार्षिक डिनर जैसे अत्यंत सुरक्षित और प्रतिष्ठित आयोजन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर हिंसक हमले की घटना कई स्तरों पर चिंताजनक प्रश्न खड़े करती है। यह मात्र सुरक्षा चूक का मामला नहीं, बल्कि आधुनिक लोकतंत्रों में बढ़ती राजनीतिक कटुता, सामाजिक ध्रुवीकरण और युवा मानस के उग्र होते प्रतिकार का संकेत भी है। यह घटना युवा शक्ति के हिंसक विरोध का नमूना है, हमलावर सुशिक्षित और राजनीतिक रूप से सजग था, इसलिए यह और भी गंभीर संकेत है। शिक्षा सामान्यतः विवेक और संवाद को बढ़ावा देती है, परंतु जब वही शिक्षित युवा हिंसा का मार्ग चुनता है, तो यह बताता है कि राजनीतिक विमर्श में असहिष्णुता कितनी गहरी हो चुकी है। 

लोकतंत्र में विरोध का स्थान है, पर हिंसा का नहीं। यदि असहमति का समाधान गोली से होगा, तो संस्थाओं और संवाद की पूरी संरचना ध्वस्त हो जाएगी। कमला हैरिस के समर्थन और ट्रंप-विरोध की पृष्ठभूमि इस घटना को राजनीतिक रंग देती है, परंतु इसे केवल दलगत राजनीति तक सीमित करना समस्या को छोटा करके देखना होगा। एक महत्वपूर्ण पहलू सुरक्षा का है। जब सैकड़ों पत्रकार, गणमान्य अतिथि और सीक्रेट सर्विस एजेंट मौजूद हों, तब हथियार सहित किसी हमलावर का प्रवेश गंभीर संस्थागत विफलता को दर्शाता है। 

अमेरिका, जो विश्व की सबसे उन्नत सुरक्षा प्रणालियों का दावा करता है, वहां ऐसी घटना यह संकेत देती है कि ‘ज़ीरो-रिस्क’ सुरक्षा एक मिथक है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब राष्ट्रपति ही पूरी तरह सुरक्षित नहीं, तो अन्य विदेशी नेताओं की सुरक्षा कितनी सुनिश्चित है। अमेरिका का ‘गन कल्चर’ भी शोचनीय है, हथियारों की आसान उपलब्धता लंबे समय से वहां हिंसा की घटनाओं का प्रमुख कारण रही है। 

बार-बार होने वाली गोलीबारी की घटनाएं यह सिद्ध करती हैं कि केवल कानून नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन आवश्यक है। इस घटना को भी उसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए। ट्रंप पर दोबारा हमले को देखते हुए उनकी सुरक्षा व्यवस्था में तकनीकी और मानव-आधारित दोनों स्तरों पर उन्नत स्कैनिंग, व्यवहार विश्लेषण और भीड़-नियंत्रण के नए मानक संबंधी सुधार आवश्यक है। ट्रंप का कहना कि इसमें ईरान का हाथ नहीं है, एक महत्वपूर्ण संकेत है। साफ है कि वे इस घटना को अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र के बजाय घरेलू असंतोष के रूप में देखना चाहते हैं। वहीं, इसे ‘साजिश’ बताने वाले दावे बिना ठोस प्रमाण के केवल भ्रम और अविश्वास को बढ़ाते हैं। 

इतिहास में रोनाल्ड रीगन पर हुए हमले की याद दिलाती यह घटना बताती है कि लोकतंत्र में खतरे नए नहीं हैं, पर उनका स्वरूप बदल रहा है। आज का खतरा अधिक जटिल है, जहां वैचारिक ध्रुवीकरण, सोशल मीडिया और व्यक्तिगत आक्रोश मिलकर हिंसा को जन्म दे रहे हैं। यह घटना केवल अमेरिका की नहीं, बल्कि वैश्विक लोकतंत्रों के लिए चेतावनी है। असहमति को यदि संवाद में नहीं बदला गया, तो वह हिंसा में बदलती रहेगी। लोकतंत्र की असली परीक्षा यही है कि वह विरोध को कितनी परिपक्वता से संभाल पाता है। मुखर और विवादास्पद नेताओं को यह भी समझना होगा कि उनकी भाषा और शैली सामाजिक तनाव को किस हद तक प्रभावित करती है।