संपादकीय:प्रस्ताव से परेशानी

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Published By Monis Khan
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ट्रंप सरकार द्वारा एच-1बी वीज़ा प्रतिबंध और उससे जुड़े कड़े प्रावधानों वाला बिल लाना उनकी राष्ट्रहित की राजनीतिक समझ है, जिसके लिए वे स्वतंत्र हैं, पर प्रस्तावित बिल मात्र अमेरिकी आव्रजन नीति का बदलाव नहीं, बल्कि वैश्विक प्रतिभा प्रवाह पर एक बड़ा झटका हैं— जिसका सबसे अधिक असर भारत पर पड़ेगा और ये नीतियां भारतीय पेशेवरों के ‘अमेरिकन ड्रीम’ को दु:स्वप्न में बदल देंगी, क्योंकि एच-1बी वीज़ा धारकों में 73 प्रतिशत भारतीय हैं। कुछ मुद्दों पर डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद भी सीमित आव्रजन नियंत्रण के पक्ष में खड़े हो सकते हैं, जिससे इस प्रस्ताव के पारित होने की आशंका बलवती होती है। 

‘मागा’ राजनीति के तहत ट्रंप प्रशासन का जोर ‘अमेरिका फर्स्ट’ पर है, जिसमें विदेशी श्रमिकों को घरेलू नौकरियों के लिए खतरा बताया जा रहा है, जबकि अमेरिका की टेक इंडस्ट्री भारतीय पेशेवरों पर बहुत निर्भर है। यह अमेरिका के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि उसकी नवाचार क्षमता और टेक उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता काफी हद तक वैश्विक प्रतिभा पर निर्भर है। प्रस्ताव में एच-1बी वीज़ा पर तीन साल की रोक के अलावा, कोटे को 85 हजार से घटाकर 25 हजार करने, न्यूनतम वेतन को अत्यधिक ऊंचा लगभग दो करोड़ रुपये वार्षिक निर्धारित करने और वीज़ा फीस में भारी वृद्धि जैसे प्रावधान शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, परिवार को साथ लाने पर संभावित प्रतिबंध और स्टैंपिंग प्रक्रियाओं को जटिल बनाना, भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिका जाने को हतोत्साहित करने की व्यापक रणनीति का संकेत देता है।

कोटा घटने से भारतीय पेशेवरों के लिए अवसरों में भारी कमी आएगी। न्यूनतम वेतन की शर्त अमेरिकी कंपनियों को भारतीयों को नियुक्त करने से हतोत्साहित कर सकती है, क्योंकि इससे लागत काफी बढ़ेगी। हमारे लिए इसके प्रभाव बहुआयामी होंगे। एक ओर, आईटी सेक्टर के अवसर सीमित होंगे, दूसरी ओर रेमिटेंस, जो भारत की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है, उस पर भी असर पड़ेगा। भारत को अपने घरेलू उद्योग, स्टार्ट-अप इकोसिस्टम और रिसर्च-डेवलपमेंट ढांचे को मजबूत करने की दिशा में तेजी लाने और प्रतिभा के ‘ब्रेन ड्रेन’ को ‘ब्रेन गेन’ में बदलने का अवसर है।

भारतीय पेशेवरों के लिए भी यह समय रणनीतिक बदलाव का है। कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और खाड़ी देश वैकल्पिक गंतव्य के रूप में उभर रहे हैं। चीन जैसे देशों की ओर रुख करने की संभावना सीमित है, क्योंकि वहां की राजनीतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियां भारतीयों के लिए सहज नहीं हैं। सरकार को चाहिए कि वह अमेरिका के साथ इस मुद्दे पर कूटनीतिक स्तर पर सक्रिय संवाद बनाए रखे, साथ ही वैश्विक स्तर पर नए अवसरों के द्वार खोलने के लिए द्विपक्षीय समझौतों को बढ़ावा दे।

 कौशल विकास, उच्च शिक्षा और नवाचार में निवेश बढ़ाकर भारत अपने पेशेवरों को वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए और सक्षम बना सकता है। ट्रंप  की नीतियां भले ही अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए हों, लेकिन उनका दीर्घकालिक प्रभाव वैश्विक प्रतिभा और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ेगा। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह इस बदलते परिदृश्य में अपने हितों की रक्षा करते हुए नए अवसरों को पहचानकर आगे बढ़े— तभी ‘अमेरिकन ड्रीम’ के टूटने का दर्द एक नई वैश्विक संभावना में बदलेगा।