संपादकीय:रणनीतिक साझेदारी
भारत-दक्षिण कोरिया के बीच हुए हालिया समझौते केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदारी का नया अध्याय है। पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और वैश्विक व्यापार में उत्पन्न अनिश्चितताओं के बीच होर्मुज संकट, आपूर्ति श्रृंखला के टूटने और वैश्विक ध्रुवीकरण के इस दौर में भारत और दक्षिण कोरिया द्वारा द्विपक्षीय सहयोग के तहत 25 अहम समझौते करना तथा 2030 तक आपसी व्यापार को 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य इसके एक रणनीतिक उत्तर के रूप में देखा जाना चाहिए। ये समझौते बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों के संकेत हैं।
समझौतों का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सहयोग का विस्तार पारंपरिक व्यापार से आगे बढ़कर रणनीतिक और उच्च तकनीकी क्षेत्रों तक है। सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, शिपबिल्डिंग, रक्षा उत्पादन और महत्वपूर्ण खनिज इसके कुछ उदाहरण हैं। ‘चिप से शिप’ तक का यह विस्तार भारत की उस नीति के अनुरूप है, जिसमें वह वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में एक विश्वसनीय विकल्प बनना चाहता है। दक्षिण कोरिया की उन्नत तकनीक और भारत के विशाल बाजार और श्रमबल का संयोजन इस साझेदारी को स्वाभाविक मजबूती देता है।
शिपबिल्डिंग में सहयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है। दक्षिण कोरिया इस क्षेत्र का वैश्विक नेता है और भारत अपनी समुद्री क्षमता बढ़ाने के प्रयास में है। दक्षिण भारत में प्रस्तावित ग्रीनफील्ड शिपयार्ड और कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम न केवल औद्योगिक विकास को गति देंगे, बल्कि भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सामरिक बढ़त भी दिला सकते हैं। रक्षा क्षेत्र में संयुक्त उत्पादन और टेक्नोलॉजी साझेदारी भारत की ‘आत्मनिर्भर रक्षा’ नीति को गति दे सकती है। वहीं सेमीकंडक्टर और डिजिटल ब्रिज जैसे समझौते भारत की तकनीकी संप्रभुता को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम हैं। यह विशेष महत्वपूर्ण इसलिए है, क्योंकि वैश्विक चिप आपूर्ति पर अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा का गहरा प्रभाव है।
इन समझौतों के कई सकारात्मक पहलू हैं, पर कुछ सवाल भी। भारत और दक्षिण कोरिया के बीच व्यापार असंतुलित है, भारत का आयात अधिक है, निर्यात कम। यदि इस असंतुलन को ठीक नहीं किया गया तो यह साझेदारी एकतरफा लाभ की ओर झुक जाएगी। भारत में 700 से कम कोरियाई कंपनियां सक्रिय हैं, जो बहुत कम है। छोटे और मझोले कोरियाई उद्यमों के लिए औद्योगिक टाउनशिप की योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए हमें अपने नियामक ढांचे, भूमि अधिग्रहण और निवेश का वास्तविक प्रवाह तथा श्रम सुधारों में खासी तेजी लानी होगी।
आखिरी बात यह कि पश्चिम एशिया के संघर्ष के चलते यदि समुद्री मार्ग बाधित होते हैं और ऊर्जा कीमतें बढ़ती हैं, तो निवेश और उत्पादन लागत दोनों प्रभावित होंगे। इन सबके बावजूद समझौतों का व्यापक प्रभाव सकारात्मक है।
यह भारत को दुनिया में चीन-निर्भर आपूर्ति श्रृंखलाओं के विकल्प के रूप में स्थापित करने में मदद करेगा। साथ ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक स्थिर और नियम-आधारित व्यवस्था को बढ़ावा देगा, जो दोनों देशों के साझा हित में है। यह साझेदारी सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों की दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा को मजबूत करने के साथ देश में रोजगार सृजन, तकनीकी उन्नयन और निर्यात वृद्धि के नए अवसर खोल सकती है। चुनौतियों के बावजूद समझौतों का प्रभावी क्रियान्वयन भारत को वैश्विक आर्थिक और तकनीकी शक्ति बनने की दिशा में महत्वपूर्ण बढ़त दिला सकते हैं।
