संपादकीय: होर्मुज में हमला
पश्चिम एशिया के उथल-पुथल भरे परिदृश्य में भारतीय जहाजों पर ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड की गोलाबारी जटिल भू-राजनीतिक संकेत है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से विश्व की लगभग एक-तिहाई तेल आपूर्ति गुजरती है, उस क्षेत्र में कोई भी टकराव वैश्विक संकट में बदल सकता है। ऐसे में भारतीय ध्वज वाले जहाजों को निशाना बनाना एक गंभीर सैन्य घटना है।
जिन जहाजों ने ईरान द्वारा निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन किया, अनुमति ली और जिनकी पहचान स्पष्ट थी, उन्हें निशाना बनाना ईरान की उस आक्रामक समुद्री नीति का हिस्सा हो सकता है, जिसका ‘रणनीतिक संदेश’ यह है कि वह अपने प्रभाव क्षेत्र में हर आवाजाही पर नियंत्रण रखता है, परंतु यह रणनीति जोखिमपूर्ण है, क्योंकि इससे तटस्थ या मित्र देशों का भरोसा भी डगमगाता है।
सवाल यह है कि ईरान, जिसने पहले भारतीय जहाजों को सुरक्षित मार्ग देने का आश्वासन दिया था, अचानक आक्रामक क्यों हुआ? इसके कई संभावित कारण हैं। पहला, क्षेत्रीय युद्ध का दबाव— इजराइल-ईरान तनाव और अमेरिकी सैन्य उपस्थिति ने ईरान को अधिक रक्षात्मक और आक्रामक दोनों बना दिया है। दूसरा, ‘संदेश की राजनीति’, ईरान अपने विरोधियों के साथ-साथ तटस्थ देशों को भी यह संकेत देना चाहता है कि क्षेत्र में उसकी शर्तें सर्वोपरि हैं।
तीसरा, भारत का संतुलनकारी रुख- भारत के अमेरिका और खाड़ी देशों के साथ बढ़ते सामरिक संबंध ईरान को असहज कर सकते हैं, भले ही भारत ने कभी खुलकर विरोध नहीं किया हो। भारत को ‘मित्र देशों’ की सूची में रखने के बावजूद उसके प्रति ऐसा रुख दर्शाता है कि युद्धकालीन समीकरण स्थायी नहीं होते। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में मित्रता अक्सर हितों से संचालित होती है, न कि भावनाओं से। यही कारण है कि भारतीय विरोध दर्ज कराने के बावजूद तेहरान की ओर से तत्काल खेद या स्पष्टीकरण नहीं आया।
यह भी संभव है कि ऐसे हमले स्थानीय कमांड स्तर पर हुए हों, परंतु इतनी बड़ी संख्या में भारतीय जहाजों को निशाना बनाना संकेत देता है कि यह नीति-स्तर की स्वीकृति के बिना संभव नहीं। सरकार के सामने दुविधा है, क्या वह इसे युद्ध की ‘सामान्य घटना’ मानकर नजरअंदाज कर दे या कूटनीति की अपनी दिशा बदले? नजरअंदाज करना खतरनाक होगा, क्योंकि इससे भारतीय समुद्री हितों की सुरक्षा कमजोर पड़ेगी। वहीं, अत्यधिक आक्रामक प्रतिक्रिया भी भारत की संतुलनकारी विदेश नीति को नुकसान पहुंचा सकती है। फिलहाल भारत को कूटनीतिक दबाव बनाते हुए तेहरान से स्पष्टीकरण और सुरक्षा आश्वासन की मांग करने के साथ बहुपक्षीय मंचों पर इस मुद्दे को उठाना चाहिए।
हमने पहले भी अपने व्यापारिक जहाजों को भारतीय नौसेना का एस्कॉर्ट दिया है, इसे फिर करना चाहिए। इन सबके साथ अमेरिका, खाड़ी देशों और ईरान के बीच रणनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए अपने हितों की रक्षा का प्रयास करना चाहिए। वैसे भी पश्चिम एशिया का संघर्ष अब बहुस्तरीय उलझाव बन चुका है, जहां हर देश अपने हितों के अनुसार चाल चल रहा है। पाकिस्तान में संभावित वार्ता इस जटिलता से तुरंत निजात नहीं दिलाने वाली, सो भारत को संयम और दृढ़ता दोनों का संतुलन साधना होगा। अपनी समुद्री सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं, पर कूटनीति के दरवाजे खुले रहें, यही इस घटना का विवेकपूर्ण उत्तर है।
