संपादकीय:स्मार्ट मीटर पर राहत
स्मार्ट बिजली मीटरों के बारे में व्यापक जन असंतोष और आंदोलन के बाद आई सरकारी घोषणा सूबे के 82 लाख स्मार्ट मीटर धारकों के लिए बहुत राहत पहुंचाने वाला है। सिद्धांततः यह व्यवस्था क्रांतिकारी है— प्रीपेड रिचार्ज, रीयल-टाइम खपत की जानकारी, बिलिंग में पारदर्शिता और कई विवादों का अंत। इसे डिजिटल भारत के विज़न के तहत बिजली क्षेत्र में पारदर्शिता, दक्षता और उपभोक्ता नियंत्रण का प्रतीक बताया गया था, पर प्रश्न यह कि यह योजना उपभोक्ताओं के रोष और अविश्वास का कारण क्यों बनी? समाधान ऐसी समस्या क्यों बन गई कि सरकार को ऐसे फैसले लेने पड़े।
विरोध का मूल कारण है मीटर का तेज चलना और गलत रीडिंग का संदेह, प्रीपेड बैलेंस खत्म होते ही अचानक सप्लाई कटना और रिचार्ज एवं रीकनेक्शन में तकनीकी खामियों के चलते देरी। वादा यह था कि स्मार्ट मीटर से बिलिंग की त्रुटियां खत्म होंगी, कई मामलों में उपभोक्ताओं से पहले से अधिक बिल आने की शिकायत मिली। आम उपभोक्ता चाहता है कि नई व्यवस्था से उसकी जेब पर बोझ कम हो तथा अबाध विद्युत आपूर्ति मिले। यदि ऐसा अनिश्चित है, तो विरोध स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश में 82 लाख स्मार्ट मीटर लग चुके हैं, इसके बाद आगे की स्वीकृति इससे ज़रूर प्रभावित होगी।
इसी दबाव में राज्य सरकार ने 45 दिन तक बिजली न काटने, शून्य बैलेंस पर 3 दिन सप्लाई जारी रखने और रविवार या अवकाश पर डिस्कनेक्शन न करने जैसे राहत उपाय घोषित किए, पर ये कदम अस्थायी राहत देंगे, स्थायी समाधान नहीं। तकनीकी समिति की रिपोर्ट आने तक नए स्मार्ट मीटर लगाने पर रोक का फैसला बताता है कि समस्या गंभीर है। समिति को जिन बिंदुओं पर ध्यान देना होगा, उनमें मीटर की सटीकता का स्वतंत्र ऑडिट, डेटा ट्रांसमिशन की विश्वसनीयता, बिलिंग-सिस्टम और भुगतान-गेटवे के बीच तालमेल और शिकायत निवारण की समयबद्ध व्यवस्था शामिल होनी चाहिए। आज इंटरनेट या मोबाइल रिचार्ज की तरह निर्बाध समन्वय बिजली प्रणाली में नहीं दिखता।
यही इस व्यवस्था की सबसे बड़ी खामी है। कंपनियां, जो तकनीकी और वित्तीय रूप से सक्षम हैं, वे त्वरित विस्तार का दबाव, गुणवत्ता नियंत्रण की कमी और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप सिस्टम के अभाव में विफल हो रही हैं। कई जगह नेटवर्क कनेक्टिविटी, सर्वर क्षमता और फील्ड सपोर्ट बहुत कमजोर है, लेकिन उलटे वे उपभोक्ता को ही दोषी ठहराने पर उतारू हैं, जिससे उपभोक्ताओं में नई व्यवस्था के प्रति अविश्वास बढ़ता है।
विश्वसनीयता ही कंपनियों की सबसे बड़ी पूंजी है, भले सरकार निजी कंपनियों को नुकसान में नहीं जाने देगी, लेकिन जनविश्वास नहीं बढ़ा राजस्व घटेगा, इसलिए उन्हें सुधार तो करने ही होंगे। स्मार्ट मीटर भविष्य की अनिवार्यता हैं, पर भरोसा वर्तमान की शर्त है। तकनीक तभी सफल होगी जब वह उपभोक्ता के लिए ‘भरोसेमंद सुविधा’ बने, ‘सांसत’ नहीं। यह प्रणाली तभी निरापद होगी, जब थर्ड-पार्टी कैलिब्रेशन और पब्लिक डैशबोर्ड पर पारदर्शी डेटा होगा, रीयल-टाइम, फेल-सेफ आईटी सिस्टम भुगतान, बिलिंग और कनेक्शन के बीच निर्बाध समन्वय बनेगा और उपभोक्ता जागरूक होकर हेल्पलाइन और स्थानीय सहायता केंद्र का इस्तेमाल करेगा, जिससे उसे न्यायसंगत सुरक्षा ग्रेस पीरियड, अलर्ट और विवाद समाधान मिले। जब तक यह सब नहीं होता, स्वैच्छिक स्वीकार्यता ही टिकाऊ रास्ता है।
