मजदूरों को सम्मान देने में आखिर हर्ज क्या है!

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Published By Virendra Pandey
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अनिल त्रिगुणायत
अनिल त्रिगुणायत, लखनऊ
 
चाहे स्वयंसेवी संगठन हों या मजदूर दिवस पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले अलंबरदार। आखिर मजदूरों के हितों की रक्षा क्यों नहीं कर पा रहे हैं? देश में असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों की स्थिति तो वैसी ही कि ‘जबरा मारे भी और रोवे भी न दे’

किसी देश की सामाजिक-आर्थिक प्रगति में मजदूरों की भूमिका शरीर में प्रवाहित लहू मानिंद होती है। मजदूर ही हैं, जिसके श्रम की बदौलत राष्ट्र के विकास की ऊंची इमारत खड़ी होती है। सूक्ष्म संरचनाओं से लेकर बड़ी योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में यह वर्ग विकास की धूरी होता है। यह सच है कि विकास के लिए संसाधन मायने रखते हैं, किंतु बिना श्रम संसाधन वैसे ही हैं, जैसे ‘बिना इंजन की मर्सिडीज’ गाड़ी। आशय यह कि मजदूर ही वह असल शिल्पकार होता है, जिसके कठोर श्रम से विकास की बगिया लहलहाती है, लेकिन कई दशकों के बाद भी मजदूरों की स्थिति में आमूलचूल सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है। 

गांव-जवार, खेत-खलिहान, रिश्ते-नाते, भाई-बंधु छोड़कर देश-प्रदेश के शहरों-कस्बों के उद्योगों तथा प्रतिष्ठानों को गति प्रदान करने वाले मजदूरों के लिए फलदायी योजना क्यों नहीं मूर्तरूप ले पा रही? वह चाहे सरकारें हों या उद्योगों के मालिक। चाहे स्वयंसेवी संगठन हों या मजदूर दिवस पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले अलंबरदार। आखिर मजदूरों के हितों की रक्षा क्यों नहीं कर पा रहे हैं? देश में असंगठित क्षेत्रों के मजदूरों की स्थिति तो वैसी ही कि ‘जबरा मारे भी और रोवे भी न दे’। 

मजदूरों के हितों की रक्षा और उनकी बेहतरी को वैसे तो केंद्र से लेकर राज्य सरकारों ने कथित ‘भगीरथ प्रयास’ कर रखे हैं। केंद्रीय श्रम मंत्रालय के अलावा राज्य सरकारों के संबंधित विभागों में अधिकारियों-कर्मचारियों की भारी भरकम फौज मजदूरों की सेवा का दंभ भर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि मजदूरों लिए विभागीय कृत्य-प्रयास आज भी या तो फाइलों में हैं या जमीनी हकीकत से कोसों दूर।  

देश में अधिकांश मजदूर कृषि निर्माण और घरेलू कार्यों में लगे रहते हैं। इन असंगठित क्षेत्रों में मजदूरों के साथ न तो कोई लिखित अनुबंध होता है, न ही छुट्टी या स्वास्थ्य बीमा की सुविधा ही दी जाती है। मूल कारण यह कि बाजार में श्रम की आपूर्ति मांग से बहुत अधिक है, इसलिए उद्योगों तथा विनिर्माण क्षेत्र में कम वेतन पर भी मजदूर मिल जाते हैं। एक ही काम के लिए जब ‘दस हाथ’ मिल जाते हैं, तो नियोक्ता की ‘पौ बारह’ हो जाती है। नतीजतन वह मजदूरों को औने-पौने वेतन या मजदूरी पर कार्य कराता है, उनका शोषण करता है। 

भारत में वर्ष 1991 में व्यापक आर्थिक सुधार किए गए। श्रम कानूनों को लचीला बनाया गया। निर्मित नीतियों से नियोक्ताओं को कानूनी पाबंदियों से कुछ छूट मिल गई। परिणामस्वरूप मजदूरों का शोषण बढ़ता ही गया। अधिकांश मजदूरों में तकनीकी कौशल या औपचारिक शिक्षा न के बराबर होती है। उनके उपेक्षित होने का यह भी अहम कारण है। तात्पर्य यह कि समाज को समर्पित मजदूरों को ‘समाज’ ने ही तिरस्कृत कर रखा है। 

मिल मालिकों द्वारा मजदूरों के शोषण आधारित बालीवुड फिल्में पहले खूब बना करती थीं। मजदूरों के संघर्षों तथा गानों को निर्देशक इतनी संवेदनशीलता के साथ दिखाते थे कि हाल में बैठा दर्शक अपने को मजदूर या मजदूरों का हितैषी ही मान बैठता था। यही हाल आज भी है। भारत में मजदूरों की दशा पर महान उपन्यासकार मुंशी प्रेमचंद की कलम खूब चली। उन्होंने मजदूरों के शोषण पर आधारित फिल्म ‘मिल मज़दूर’ (1934) की पटकथा लिखी, एक छोटी सी भूमिका भी निभाई थी। बताते हैं कि फिल्म का एक डायलाग मजदूरों के हित में इतना असरदार था कि तत्कालीन टेक्सटाइल हब बंबई (अब मुंबई) में श्रमिकों ने मिल मालिकों के खिलाफ जमकर आंदोलन किया था। 

एक दौर ऐसा भी था, जब निजी क्षेत्र के मिल मालिकों तथा सरकारी उद्योगों के प्रबंधनों के खिलाफ मजदूर संगठन आक्रोश व्यक्त करते रहते थे। मजदूर संगठनों में शामिल श्रमिकों के साथ जब-जब शोषण की बात सामने आई, तो आंदोलन हुआ। ‘जनता जिंदाबाद, इंकलाब जिंदाबाद, हर जोर-जुल्म की टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है, चाहे जो मजबूरी हो, हमारी मांगे पूरी हों, अभी तो अंगड़ाई है आगे और लड़ाई है, जो हम से टकराएगा, चूर-चूर हो जाएगा, जैसे जोशीले नारे उद्योगों तथा सरकारी तंत्र के गलियारों में आज भी गूंजते हैं। 

असंगठित क्षेत्र का, जीडीपी व रोजगार में योगदान के मामले में भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रमुख स्थान है। देश के कुल श्रमिकों में से शहरी क्षेत्रों में लगभग 72 प्रतिशत मजदूर असंगठित क्षेत्र में लगे हुए हैं। शहरी विकास में तो इनका योगदान अत्यधिक है। आर्थिक सर्वेक्षण-2025 के अनुसार भारत में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में लगभग 50 करोड़ श्रमिक हैं, जो देश के कुल कार्यबल का करीब 90 प्रतिशत है। 

फैक्ट्रियां, औद्योगिक इकाइयां, होटल, रेस्तरां और कई अन्य प्रतिष्ठान असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की बदौलत ही चलते हैं। इसमें ऊबर और ओला ड्राइवर, राजमिस्त्री, बढ़ई, फूड डिलीवरी बॉय, पेंटर, प्लंबर आदि भी शामिल हैं। कुछ दिन पहले यूपी सरकार ने न्यूनतम मजदूरी की दर तय करते हुए मजदूरों को राहत दी है, लेकिन मजदूरों के लिए अभी भी काफी कुछ किया जाना शेष है। औद्योगिक स्थलों पर उनकी सुविधाओं की दरकार तो है ही, सामाजिक व आर्थिक सुरक्षा के भी वे हकदार हैं। 

हालिया दिनों में केंद्रीय श्रम मंत्रालय ने श्रमिकों के लिए ठोस व तार्किक कार्य किए हैं। श्रम सुधारों को नव स्वरूप दिया है, लेकिन निर्मित गाइडलाइंस तभी प्रासंगिक है, जब उसका लाभ मजदूरों तक सही रूप में प्राप्त हो। चूंकि, असंगठित क्षेत्रों में मजदूरों की अधिकता है, अतएव उनके हितों के लिए निर्मित नियमों का अपेक्षित क्रियान्वयन जरूरी है। उपेक्षा का शिकार बने मजदूरों के लिए आमजन को भी अपनी सोच बदलनी होगी। देश की समृद्धि के लिए अपना खून-पसीना बहाने वाले मजदूरों को उनका अधिकार व मान देने में हमें कोई हर्ज तो नहीं होना चाहिए।

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