किराए की कोख की ‘दुकानों’ पर लगेगा अंकुश
केंद्र सरकार सरोगेसी मदर की क्लिनिक के नाम पर खुली मनमानी दुकानों पर अंकुश लगाने जा रही है। सरकार ने पंजीयन और संचालन के नियमों में बदलाव किया है।
केंद्र सरकार ‘किराए की कोख’ यानी सरोगेसी मदर क्लिनिक के नाम पर खुली मनमानी दुकानों पर अंकुश लगने जा रहा है। अब कुकुरमुत्तों की तरह देशभर में नए क्लिनिक खोलने पर सख्ती बरती जाएगी। सरोगेसी केंद्रों और इनमें होने वाले फर्जीवाड़े को रोकने के लिए सरकार ने इसमें पंजीयन और संचालन के नियमों में बदलाव किया है। नए नियमों के तहत इन केंद्रों को अब उपग्रहों द्वारा नियंत्रित किया जाएगा। अब केवल राष्ट्रीय पोर्टल और ऑनलाइन आवेदन ही होंगे। इस पर निगरानी ऑनलाइन सॉफ्टवेयर से होगी। कागजी आवेदन व दस्तावेजीकरण की सुविधा पूरी तरह प्रतिबंधित कर दी गई है।
ये क्लिनिक अन्य दूसरे क्लिनिक को चिकित्सा सुविधा नहीं दे सकेगा। केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देष दिए हैं कि नए नियमों का सख्ती से पालन किया जाए। दरअसल किराए की कोख का व्यवसायीकरण हो रहा है। यह इस तथ्य से पता चला कि कुछ ही सालों के भीतर देश में 35 से 50 प्रतिशत केंद्रों की संख्या बढ़ गई। इसी अनुपात में देश-विदेश में ठगी की घटनाएं भी बढ़ी हैं। हैदराबाद में ऐसा गिरोह पकड़ा गया, जो दो से चार लाख में कोख किराए पर लेकर 30 लाख रुपये तक में बेच देते थे।
यहां तक कि विदेशों से भी शुक्राणु दानदाता लाए गए। यानी देश के बाहर भी बच्चे बेचे गए, हालांकि 2025 में सरकार ने शुक्राणुदाता नियमों में बदलाव किया था, लेकिन कारोबारियों ने इन नियमों की अनदेखी की। नाबालिग और अविवाहित लड़कियों की कोख का भी अवैध इस्तेमाल किया गया। भारत में कोख किराए पर लेने का खर्च 10 से 25 लाख है, जबकि विदेशों में 80 लाख से डेढ़ करोड़ रुपये तक है, इसलिए सरोगेसी क्लिनिकों में किराए की कोख अवैध कारोबार का बड़ा धंधा बनती जा रही है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और तमिलनाडु में सरोगेसी के अनेक ठगी के मामले सामने आए हैं, इसलिए सरकार को नियमों में बदलाव करना पड़ा। इसके पहले 2025 में लिवइन और समलैंगिक युगलों को किराए की कोख के जरिए माता-पिता बनने का अधिकार देने से साफ मना कर दिया था।
अब ऑनलाइन जानकारी होने से निगरानी तंत्र के पास सरोगेसी क्लिनिक संचालन व नवीनीकरण संबंधी जानकारी हर वक्त सामने होगी। इससे अनियमितता को आसानी से चिन्हित कर लिया जाएगा। क्लिनिक के पास क्या वैध दस्तावेज हैं, इसकी भी पुख्ता जानकारी मिलती रहेगी। कोई भी कमी पाए जाने पर संस्था को प्रतिबंधित किया जा सकेगा। इन केंद्रों के कर्मचारियों और बच्चों के जन्म की जानकारी भी मिलती रहेगी। सरकार इन नियमों को एक साथ लागू करने के बजाय चरणबद्ध अमल में लाएगी।
वर्तमान कानून के अनुसार किसी अन्य महिला की कोख के प्रयोग की अनुमति तब मिलती है, जब कानून के अनुसार विवाहित जोड़ा शारीरिक रूप से अक्षम हो या फिर गर्भधारण करने में पत्नी की जान को खतरा हो। अर्थात इन हालात में वैवाहिक जोड़ा सरोगेसी मदर का सहारा ले सकता है। कानून के अनुसार यह भी बाध्यकारी शर्त है कि किराए की कोख देने वाली महिला एक तो विवाहित होनी चाहिए और दूसरे कम से कम उसका एक बच्चा भी हो। साथ ही पति की आयु 26 से 55 वर्ष और पत्नी की आयु 23 से पचास वर्ष के बीच होना आवश्यक है।
किराए की कोख के कानून में परिवर्तन इसके बढ़ते अवैध व्यापार पर अंकुश लगाने की दृष्टि से किया गया है। अब केवल निःसंतान दंपति, जो बच्चे पैदा करने में शारीरिक रूप से अक्षम हैं, वे अपने किसी करीबी रिश्तेदार की मदद ले सकते हैं। इस सुविधा को कानूनी भाषा में ‘अल्ट्रस्टिक सर्जरी सरोगेसी’ कहा जाता है। भारत दुनिया के दंपतियों के लिए किराए की कोख का एक बड़ा व्यावसायिक नाभिकेंद्र बनता जा रहा है, जो सुविधा वास्तविक जरूरतमंदों के लिए शुरू की गई थी, वह अमीर दंपतियों के लिए शौक में तब्दील होता जा रहा है।
सूचना तकनीक के बाद भारत में प्रजनन का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है। इसमें किराए पर कोख दिए जाने का धंधा भी शामिल है। चिकित्सा पर्यटन के बहाने विदेशी पर्यटक भारत प्रसूति पर्यटन के लिए भी आ रहे हैं। भारत में किराए की कोख का कारोबार अरबों डॉलर का हो गया है, लेकिन यह धंधा अंततः प्रकृति की प्रतिरूप महिला की कोख पर टिका है, ठीक उसी तरह, जिस तरह, उदारवादी अर्थव्यवस्था प्रकृति के गर्भ में समाई खनिज संपदाओं के दोहन पर टिकी है। इस धंधे की भारी कीमत उन महिलाओं को चुकानी पड़ी है, जिन्हें अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए हर हाल में धन की जरूरत रहती है।
2016 में प्रजनन सहायक तकनीक विधेयक लाकर केंद्र सरकार ने इस गोरखधंधे पर अकुंश लगाने की पहल कर दी थी। इस कानून से उन्हें परेशानी है, जिन्होंने स्त्री की कोख को बाजार के हवाले कर दिया है। वे यह भी दलील दे रहे हैं कि कठोर कानून से विदेशी मुद्रा का आगमन रुक जाएगा। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
