संपादकीय:अशोभनीय टिप्पणी 

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत ‘नरक का द्वार’ है, जैसी टिप्पणी कूटनीतिक मर्यादाओं के विपरीत है, इस तरह की भाषा उस परिपक्व वैश्विक नेतृत्व की अपेक्षाओं पर प्रश्न चिह्न लगाती है, जिसकी जिम्मेदारी किसी भी महाशक्ति के नेता पर होती है। ट्रंप ने बात पलटते हुए भारत को महान बताया, यह बात अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता ने कही और यह नहीं बताया कि ट्रंप ने कब और कहां कहा, इसकी प्रमाणिकता संदिग्ध है। 

विदेश मंत्रालय द्वारा ट्रंप के बयान को ‘अज्ञानतापूर्ण, अनुचित और खराब सोच वाला’ बताया जाना एक संतुलित और संस्थागत प्रतिक्रिया है, किंतु देश के बारे में ऐसी ओछी टिप्पणी के विरोध में उच्च राजनीतिक स्तर से प्रत्यक्ष टिप्पणी का अभाव भी अपने आप में अलग संकेत देता है। भारत की यह चुप्पी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी परिपक्व कूटनीति का हिस्सा मानी जानी चाहिए। भारत और अमेरिका के संबंध दशकों से साझा हितों, रणनीतिक सहयोग और वैश्विक संतुलन पर आधारित रहे हैं। ऐसे में किसी एक व्यक्ति के विवादास्पद बयान को द्विपक्षीय रिश्तों के व्यापक ढांचे पर हावी होने देना व्यावहारिक नहीं होगा, इसीलिए भारत अक्सर ‘व्यक्ति नहीं, नीति’ के स्तर पर प्रतिक्रिया देता है। 

यह भी ध्यान देने योग्य है कि ट्रंप का यह पहला विवादास्पद बयान नहीं है। उन्होंने पहले भी भारत के व्यापार, कश्मीर और आंतरिक राजनीति पर असामान्य टिप्पणियां की हैं, जिनमें कई बार बाद में यू-टर्न भी लिया गया। यह उनकी राजनीतिक शैली का हिस्सा है, जहां तीखे बयान देकर घरेलू राजनीति में चर्चा बटोरी जाती है और फिर परिस्थितियों के अनुसार नरमी दिखाई जाती है। ट्रंप ने भारत जैसी ही टिप्पणी चीन के बारे में भी की, वहां की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत अधिक तीखी और प्रत्यक्ष रही। यह दोनों देशों की कूटनीतिक शैली का अंतर दर्शाता है, जहां चीन सार्वजनिक आक्रामकता दिखाता है, वहीं भारत संयमित और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाता है। 

ट्रंप के बयान अक्सर अगंभीर और विरोधाभासी होते हैं। एक ओर वे भारत के प्रधानमंत्री को ‘अच्छा मित्र’ बताते हैं, तो दूसरी ओर उनका राजनीतिक करियर ‘तबाह करने’ जैसी बातें करते हैं। यह असंगति उनके व्यक्तित्व और राजनीतिक रणनीति दोनों को उजागर करती है। कई अमेरिकी विश्लेषक इसे ‘पॉपुलिस्ट पॉलिटिक्स’ का हिस्सा मानते हैं, जहां उत्तेजक बयान देकर जनभावनाओं को भुनाया जाता है, खासकर तब जब घरेलू मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ रही हों।

भारत को चाहिए कि वह ऐसी परिस्थितियों में अपनी गरिमा बनाए रखते हुए अमेरिका और ट्रंप को स्पष्ट संदेश भी दे। सरकार आवश्यक होने पर अधिक मुखर और दृढ़ रुख अपनाए, ताकि भविष्य में कोई भी नेता भारत के प्रति इस तरह की टिप्पणी करने से पहले दो बार सोचे। साथ ही, यह भी सुनिश्चित किया जाए कि द्विपक्षीय संबंध किसी व्यक्ति विशेष की बयानबाज़ी के बजाय संस्थागत मजबूती पर टिके रहें। कुल मिलाकर ट्रंप का बयान भारत-अमेरिका संबंधों की वास्तविकता को प्रतिबिंबित नहीं करता। यह एक क्षणिक राजनीतिक अभिव्यक्ति है, न कि स्थायी कूटनीतिक दृष्टिकोण। भारत को संयम, आत्मविश्वास और रणनीतिक स्पष्टता के साथ आगे बढ़ते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी वैश्विक छवि और हित किसी भी असंगत बयान से प्रभावित न हों।