संपादकीय:उड़ान पर संकट

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
On

भारत में विमानन ईंधन— एविएशन टर्बाइन फ्यूल की कीमतों में हालिया उछाल ने पूरे नागरिक उड्डयन क्षेत्र को असहज स्थिति में ला खड़ा किया है। फरवरी में इसके दाम साढ़े 91 हजार रुपये के आसपास प्रति किलो लीटर थे, वहीं अप्रैल तक यह दो लाख रुपये के पार पहुंच गया। सवाल यह है कि क्या यह वृद्धि अस्थायी है और क्या एयरलाइंस इसे बिना यात्रियों पर बोझ डाले समायोजित कर सकती हैं? 

वास्तविकता यह है कि एटीएफ किसी भी एयरलाइन की परिचालन लागत का सबसे बड़ा घटक है। सामान्य परिस्थितियों में इसका हिस्सा 40 फीसद के आसपास रहता है, लेकिन मौजूदा उछाल ने इसे 60 प्रतिशत से ऊपर पहुंचा दिया है। ऐसे मेंफेडरेशन ऑफ इंडियन एयरलाइंस द्वारा ‘परिचालन बंद होने’ की चेतावनी महज दबाव की राजनीति नहीं, आर्थिक यथार्थ भी है। बिना किराया बढ़ाए लागत समायोजन लगभग असंभव है। ठीक है कि सरकार ने अतीत में विमानन क्षेत्र को राहत दी है— कभी एटीएफ पर करों में कमी, तो कभी डायनेमिक प्राइसिंग और सीट-आधारित किराया वसूली की छूट देकर, परंतु इस बार स्थिति अधिक जटिल है। यदि सरकार करों में बड़ी कटौती करे या उत्पाद शुल्क घटाए तो राजस्व पर सीधा असर पड़ेगा।

 अनुमानतः एक प्रतिशत उत्पाद शुल्क में कमी से ही हजारों करोड़ रुपये का वार्षिक नुकसान हो सकता है, जो पहले से दबाव में चल रहे राजकोष के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। यदि एयरलाइंस को पूरी छूट दी जाती है कि वे टिकट कीमतें बढ़ाएं, तो ‘हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई यात्रा कर सके’ यह सपना टूट जाएगा। पिछले एक दशक में मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा लोग बड़ी संख्या में उड़ान भरने लगे हैं। किराये में तीव्र वृद्धि इस सामाजिक-आर्थिक बदलाव को उलट सकती है। घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों के किराए के अलग-अलग मूल्य निर्धारण तर्कसंगत होने के बावजूद मौजूदा संकट में जब एयरलाइंस समान मूल्य निर्धारण या अधिक लचीलापन चाहती हैं, ताकि घाटे की भरपाई हो सके तो इस पर सोचना चाहिए। 

घाटे की भरपाई के लिए एयरलाइंस यात्रियों की सुविधाओं में कटौती करेंगी या सुरक्षा से समझौता करेंगी, यह आशंका सैद्धांतिक रूप से मौजूद है, पर व्यवहार में सुरक्षा मानकों को ढीला करना संभव नहीं, क्योंकि विमानन कंपनियां अंतर्राष्ट्रीय नियमों और भारत के डीजीसीए के सख्त नियंत्रण में है। कंपनियां सेवाओं जैसे भोजन, बैगेज या लाउंज सुविधाओं में कटौती कर सकती हैं। इस परिस्थिति में सरकार और उद्योग के बीच संतुलित दृष्टिकोण परम आवश्यक है। 

अल्पकाल में राज्य सरकारों द्वारा करों में अस्थायी कमी, केंद्र द्वारा सीमित उत्पाद शुल्क राहत और एयरलाइंस द्वारा आंशिक किराया समायोजन बढ़े बोझ को साझा कर सकते हैं। बाद में एटीएफ को जीएसटी के दायरे में लाकर कीमतों में स्थिरता लाई जा सकती है। चुनावों के बाद कीमतों में वृद्धि वैश्विक तेल बाजार की दिशा पर निर्भर करेगा। यदि कच्चे तेल के दाम ऊंचे रहते हैं, तो ईंधन और किराए दोनों पर दबाव बना रहेगा। फिलहाल संकट केवल एयरलाइंस का नहीं, बल्कि पूरे आर्थिक तंत्र का है। ऐसे में समाधान भी एकतरफा नहीं, बल्कि साझेदारी में ही निकलेगा— ताकि उड़ानें भी जारी रहें और यात्रियों का भरोसा भी कायम रहे।