संपादकीय:परिवर्तन की नई बयार

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Published By Monis Khan
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पश्चिम बंगाल की राजनीतिक उर्वर भूमि ने एक बार फिर इतिहास रचा है। चुनाव परिणामों ने न केवल सत्ता का केंद्र बदल दिया है, बल्कि पिछले डेढ़ दशक से चले आ रहे एकक्षत्र राजनीतिक विमर्श पर भी विराम लगा दिया है। पिछले 15 वर्षों से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस के अभेद्य दुर्ग में ‘कमल’ का यह उदय भारतीय लोकतंत्र की उस अंतर्निहित शक्ति का प्रमाण है, जहां जनता की खामोशी बड़े-बड़े किलों को ढहाने का माद्दा रखती है। किसी भी लोकतंत्र में 15 साल का समय एक लंबा कालखंड होता है। 

टीएमसी के शासनकाल के शुरुआती वर्षों में जो परिवर्तन’ का उत्साह था, वह धीरे-धीरे ‘सत्ता विरोधी लहर में तब्दील होता गया। संदेशखाली जैसी घटनाओं ने महिला सुरक्षा के दावों पर सवाल खड़े किए, तो वहीं शिक्षक भर्ती घोटाले जैसे भ्रष्टाचार के मामलों ने राज्य के शिक्षित युवाओं और मध्यम वर्ग के भरोसे को हिलाकर रख दिया। भाजपा ने इन जख्मों को पहचानकर अपनी चुनावी रणनीति बुनी और भ्रष्टाचार मुक्त बंगाल के नारे को सीधे जन-जन तक पहुंचाया। इस जनादेश का एक महत्वपूर्ण पहलू मतों का ध्रुवीकरण और सामाजिक समीकरणों का बदलाव है। बंगाल की राजनीति पारंपरिक रूप से पहचान और अस्मिता के इर्द-गिर्द घूमती रही है।

 टीएमसी का मजबूत आधार माना जाने वाला मुस्लिम मतदाता वर्ग इस बार कुछ क्षेत्रों में बिखरे हुए नजर आए, वहीं दूसरी ओर मतुआ समुदाय और आदिवासी बेल्ट में भाजपा की पकड़ और अधिक मजबूत हुई। यह इस बात का संकेत है कि मतदाता अब केवल लोकलुभावन योजनाओं के सहारे नहीं, बल्कि स्थायी बुनियादी ढांचे और रोजगार के ठोस अवसरों की तलाश में हैं। बंगाल की राजनीति का एक काला पक्ष हमेशा चुनावी हिंसा रहा है। इस बार के चुनावों में भी हिंसा की खबरें सुर्खियों में रहीं, लेकिन जनता ने भारी मतदान के जरिए यह संदेश दे दिया कि वे भयमुक्त वातावरण चाहते हैं। ममता बनर्जी की हार के पीछे एक बड़ा कारण उनके कैडरों पर लगे दबंगई के आरोप भी रहे। भाजपा के लिए अब सबसे बड़ी चुनौती इस राजनीतिक हिंसा के चक्र को तोड़कर एक शांतिपूर्ण शासन व्यवस्था स्थापित करना होगा। 15 साल बाद सत्ता में आए इस बदलाव को संभालना नई सरकार के लिए आसान नहीं होगा। बंगाल पर चढ़ा भारी कर्ज, औद्योगिक पिछड़ापन और केंद्र के साथ राज्य के रिश्तों को पटरी पर लाना प्राथमिकता होगी। 

ममता बनर्जी ने विपक्ष में रहकर जिस आक्रामकता की राजनीति की है, वही आक्रामकता अब वे एक सशक्त विपक्षी नेता के तौर पर सदन में दिखाएंगी। ऐसे में नई सत्ता को सुशासन की कसौटी पर खुद को हर दिन साबित करना होगा। जनादेश से स्पष्ट है बंगाल विकास की एक नई पटकथा लिखना चाहता है। यह जीत केवल भाजपा की नहीं, बल्कि उस आम बंगाली मानस की है, जिसने बदलाव के लिए अपना मत दिया। सत्ता का यह हस्तांतरण केवल कुर्सियों का बदलाव नहीं होना चाहिए, बल्कि यह बंगाल के गौरव और आर्थिक पुनरुद्धार की नई शुरुआत होनी चाहिए।