भारतीय तेल क्षेत्र की बढ़ेगी मुसीबत, फिच रेटिंग्स ने कच्चे तेल की महंगाई को बताया बड़ा जोखिम

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Published By Anjali Singh
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दिल्ली। कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बने रहने और घरेलू ईंधन कीमतों में समय पर वृद्धि नहीं होने की स्थिति में भारत की तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) पर आर्थिक दबाव बढ़ सकता है। इससे उनकी कमाई और नकदी प्रवाह भी प्रभावित होगा। फिच रेटिंग्स ने मंगलवार को यह अनुमान जताया। रेटिंग एजेंसी ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा कि कच्चे तेल की ऊंची लागत के अनुरूप पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि नहीं होने पर तेल कंपनियों की कर-पूर्व आय (ईबीआईटीडीए) तेजी से घट सकती है। 

इसके अलावा बड़े स्तर पर भंडारण और अधिक रिफाइनिंग मात्रा के कारण कार्यशील पूंजी की जरूरत भी बढ़ेगी, जिससे मुक्त नकदी प्रवाह पर दबाव आएगा। फिच रेटिंग्स ने कहा कि कच्चे तेल में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के बजाय लंबे समय तक ऊंची कीमतें बने रहना एक बड़ा जोखिम है। रेटिंग एजेंसी के मुताबिक, भारतीय पेट्रोलियम कंपनियों के व्यवसाय मॉडल और पूंजीगत व्यय के आधार पर उनके क्रेडिट प्रोफाइल में अंतर दिखेगा। 

इंडियन ऑयल का विविधीकृत कारोबार उसे अपेक्षाकृत अधिक मजबूत बनाता है, जबकि भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) पर विस्तार और ऊर्जा बदलाव से जुड़े खर्च के कारण अधिक दबाव रह सकता है। वहीं, हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) की स्थिति संयुक्त उपक्रम परियोजनाओं के पूरा होने के साथ बेहतर हो सकती है। हालांकि लंबे समय तक ऊंचे दाम बने रहने पर ऐसा होने में देरी हो सकती है। 

फिच रेटिंग्स ने कहा कि यदि 2026 में ब्रेंट क्रूड औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहता है, तो केवल रिफाइनिंग पर आधारित कंपनियां बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं, जबकि खुदरा ईंधन कीमत नियंत्रण से प्रभावित कंपनियां दबाव में रहेंगी। रिपोर्ट के मुताबिक, एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कंपनियों की रेटिंग अब भी सरकार या सरकारी स्वामित्व से जुड़ी हुई है, जिससे कमजोर स्वतंत्र क्रेडिट प्रोफाइल का असर सीमित रहता है। सरकार की नीतियां और मूल्य स्थिरीकरण तंत्र इस क्षेत्र में प्रमुख भूमिका निभाते रहेंगे।

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