संपादकीय:तीस्ता पर तल्खी
तीस्ता नदी जल बंटवारा विवाद अब महज जल-साझेदारी का विषय ही नहीं रहा, बांग्लादेश द्वारा चीन की मदद से तीस्ता नदी परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिश ने इस विवाद को सीधे दक्षिण एशियाई भू-राजनीति और भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ दिया है। यह मुद्दा भारत और बांग्लादेश के रिश्तों की तल्खी को और बढ़ा सकता है। अब सवाल इतना भर नहीं है कि किसे कितना पानी मिलेगा, बल्कि यह भी है कि इस पूरे क्षेत्र में रणनीतिक प्रभाव किसका बढ़ेगा।
तीस्ता नदी का सबसे संवेदनशील पहलू है कि इसका प्रवाह भारत के अत्यंत महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर, यानी ‘चिकन नेक’, के निकट है। यह लगभग 22 किलोमीटर चौड़ा भूभाग पूर्वोत्तर भारत को शेष देश से जोड़ता है। यदि किसी बाहरी शक्ति को इस क्षेत्र की भू-संरचना, जल-प्रवाह, पुलों, सड़कों और संचार तंत्र की विस्तृत जानकारी मिलती है, तो उसका सामरिक महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है। यही कारण है कि चीन की बढ़ती दिलचस्पी को भारत केवल आर्थिक परियोजना के रूप में नहीं देख सकता।
चीन के अनेक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट केवल आर्थिक निवेश तक सीमित नहीं रहते। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से लेकर श्रीलंका के हंबनटोटा तक, चीन ने आर्थिक सहयोग के माध्यम से सामरिक उपस्थिति भी बनाई है, इसलिए यह आशंका निराधार नहीं है कि तीस्ता परियोजना के बहाने चीन ‘हाइड्रोलॉजिकल डेटा’, क्षेत्रीय सर्वेक्षण और संवेदनशील भौगोलिक सूचनाओं तक पहुंच बनाना चाहता हो। बांग्लादेश का व्यवहार भी केवल जल संकट से प्रेरित नहीं दिखता। ढाका यह भलीभांति समझता है कि भारत अपने पूर्वोत्तर के प्रवेशद्वार के निकट चीन की सक्रियता को सहजता से स्वीकार नहीं करेगा। चीन के साथ निकटता दिखाना, भारत पर दबाव बनाना उसकी कूटनीतिक रणनीति लगती है। छोटे और मध्यम देश अक्सर बड़ी शक्तियों के बीच संतुलन बनाकर अपने हित साधते हैं और बांग्लादेश वही कर रहा है।
2011 में लगभग तैयार समझौता इसलिए रुक गया था, क्योंकि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने समझौते को यह कह कर रुकवा दिया था कि उत्तर बंगाल के किसानों के लिए ही पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं है, हम बांग्लादेश को इतना अधिक पानी कैसे दे सकते हैं? अब यदि बंगाल की राजनीतिक परिस्थिति बदली भी हो, तब भी यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि केंद्र और पश्चिम बंगाल की नई सरकार वहां के किसानों के हितों की अनदेखी कर बांग्लादेश को 50 प्रतिशत पानी देने को तैयार हो जाएंगी। उत्तर बंगाल की कृषि अर्थव्यवस्था, चाय बागान, सिंचाई और ग्रामीण आजीविका इस नदी से गहराई से जुड़ी हैं, इसलिए कोई भी सरकार केवल भू-राजनीतिक दबाव में एकतरफा रियायत देने का जोखिम नहीं उठाएगी।
भारत के सामने एक कठिन रणनीतिक दुविधा है। यदि वह समझौते को लगातार टालता है, तो बांग्लादेश चीन की ओर अधिक झुक सकता है। यदि वह अत्यधिक रियायत देता है, तो घरेलू राजनीतिक और कृषि असंतोष बढ़ सकता है, इसलिए समाधान टकराव नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और संस्थागत दृष्टिकोण में है। हमें समझना होगा कि केवल सुरक्षा चिंताओं से समस्या हल नहीं होगी, बांग्लादेश के साथ भरोसे और विकास साझेदारी को मजबूत करना भी उतना ही आवश्यक है। भारत सरकार को यहां संवेदनशीलता और सतर्कता दोनों का संतुलित परिचय देना होगा।
