संपादकीय: परीक्षा एजेंसी पर प्रश्न
नीट जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा का रद्द होना अक्षम्य प्रशासनिक त्रुटि और देश की सार्वजनिक परीक्षा व्यवस्था पर गहरा धब्बा है। जिस परीक्षा के आधार पर भविष्य के चिकित्सा छात्र चुने जाने हों, उसके प्रश्नपत्र व्हाट्सऐप और टेलीग्राम समूहों में पांच-पांच हजार रुपये में बिकते पाए जाएं, तो यह भ्रष्टाचार प्रतिभा और परिश्रम के साथ राष्ट्रीय विश्वासघात है। भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक अब अपवाद नहीं, एक ‘समानांतर उद्योग’ बन चुका है। बार-बार यही कहानी दोहराया जाना केवल तकनीकी सुरक्षा की नहीं, बल्कि संगठित अपराध, प्रशासनिक मिलीभगत और कमजोर जवाबदेही की भी है। हर बार जांच समिति, नई गाइडलाइन, ‘कड़ी कार्रवाई’ के दावे, लेकिन फिर वही विफलता। प्रश्न यह है कि दुनिया के अनेक देश करोड़ों परीक्षार्थियों की परीक्षाएं अपेक्षाकृत सुरक्षित ढंग से करा सकते हैं, तो भारत क्यों नहीं? एनटीए की भूमिका सवालों के घेरे में है।
संसदीय समिति की रिपोर्ट के अनुसार 2014 के बाद, इसके द्वारा कराई गई अनेक परीक्षाएं विवादों और भीषण अनियमितताओं का शिकार हुईं। परिणामों में देरी, तकनीकी खामियां, पेपर लीक और परीक्षा प्रबंधन की कमजोरियां लगातार सामने आती रहीं। इसके बावजूद कोई संस्थागत जवाबदेही तय नहीं हुई और छात्रों और अभिभावकों का भरोसा कमजोर पड़ता गया। इसका बड़ा बोझ ईमानदार छात्रों पर पड़ता है, जिन्होंने वर्षों मेहनत की, कोचिंग पर लाखों रुपये खर्च किए, मानसिक दबाव झेला, उनका भविष्य कुछ अपराधियों और भ्रष्ट नेटवर्क के कारण अनिश्चित हो जाता है। अब दोबारा परीक्षा होगी तो लाखों छात्रों का यात्रा, आवास और तैयारी का अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा।
उनकी मानसिक लय टूटेगी। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों पर इसका प्रभाव और अधिक गंभीर होगा। दोबारा परीक्षा कराने का लगभग 500 करोड़ रुपये के अतिरिक्त व्यय का भार कौन उठाएगा? अंततः यह करदाताओं के पैसे से ही आएगा। यह संकट शिक्षा की नैतिकता पर भी प्रश्न खड़ा करता है। यदि सफलता परिश्रम और प्रतिभा से नहीं, पैसे और पहुंच से खरीदे गए प्रश्नपत्र से तय होगी, तो फिर परीक्षा का क्या अर्थ? चिकित्सा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह बहुत खतरनाक है। सरकार ने सीबीआई जांच और दस दिन में नए परीक्षा कार्यक्रम की घोषणा करके संदेश दिया है कि वह परीक्षा की शुचिता पर समझौता नहीं करेगी, लेकिन मात्र जांच पर्याप्त नहीं। देश में ऐसे मामलों में दोष सिद्धि की दर अत्यंत कम है।
अधिकांश आरोपी सुदीर्घ कानूनी प्रक्रिया का लाभ उठाते रहते हैं। समाधान केवल परीक्षा रद्द करने में नहीं, पूरी संरचना बदलने में है। सरकार को सार्वजनिक परीक्षा अधिनियम को कठोरता से लागू करना होगा। डिजिटल एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र प्रणाली, एआई आधारित निगरानी, सीमित समय में सुरक्षित डाउनलोड, स्थानीय प्रिंटिंग नियंत्रण और परीक्षा केंद्रों का स्वतंत्र ऑडिट अनिवार्य करना चाहिए।
दक्षिण कोरिया, चीन और सिंगापुर जैसे देश में परीक्षा सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा जितनी गंभीरता से लेते हैं, भारत को भी यही दृष्टिकोण अपनाना होगा। सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता केवल प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास का आधार है। यदि युवा पीढ़ी को यह लगने लगे कि व्यवस्था ईमानदार परिश्रम का सम्मान नहीं करती, तो लोकतंत्र और राष्ट्र दोनों के भविष्य पर गहरा संकट खड़ा हो सकता है।
