इतिहास और विरासत स्टीफंस कॉलेज  

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Edited By Anjali Singh
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दिल्ली के चांदनी चौक के किनारी बाजार में 1 फरवरी 1881 जब सेंट स्टीफंस कॉलेज की नींव रखी गई, तब किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि यह छोटा सा संस्थान भारत का सबसे प्रतिष्ठित कॉलेज बन जाएगा। उस दिन सैमुअल स्कॉट एलनट (Samuel Scott Allnutt) इसके पहले प्रिंसिपल बने। एक साधारण शुरुआत के साथ चला यह सफर आज 147 वर्ष पूरे कर चुका है। इस लंबे अंतराल में कॉलेज को पहली बार एक महिला प्रिंसिपल मिली है। इनका नाम है सुजैन एलियास। सेंट स्टीफंस कॉलेज  न केवल संस्थान के इतिहास में एक मील का पत्थर है, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था में लैंगिक समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है।– विवेक शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार 

सेंट स्टीफंस कॉलेज ने हमेशा दूरदर्शी, मेहनती और समर्पित प्रिंसिपलों का नेतृत्व पाया है। इनके मार्गदर्शन में कॉलेज ने न केवल शैक्षणिक उत्कृष्टता हासिल की, बल्कि राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद, पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जिया-उल-हक जैसे राष्ट्राध्यक्षों सहित देश-विदेश के हर क्षेत्र में प्रभावशाली व्यक्तित्व तैयार किए। कॉलेज की यह विरासत आज भी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है।

छात्रों के समग्र विकास का पक्षधर

19 वीं शताब्दी के अंत में दिल्ली उच्च शिक्षा के लिए उपेक्षित शहर था। एलनट ने दो किराए के कमरों में कॉलेज की शुरुआत की। शुरू में मात्र पांच छात्र और तीन शिक्षक थे, लेकिन एलनट की दूरदृष्टि अद्भुत थी। उन्होंने सिर्फ पढ़ाई पर ही ध्यान केंद्रित नहीं किया, बल्कि गरीब, कमजोर और पिछड़े वर्ग के छात्रों को शिक्षा उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया। कॉलेज को पंजाब विश्वविद्यालय से जोड़ा गया, जिससे इसका शैक्षणिक आधार मजबूत हुआ। एलनट का योगदान केवल प्रशासनिक नहीं था। वे छात्रों के समग्र विकास के पक्षधर थे। उनकी मेहनत से छात्र संख्या तेजी से बढ़ी और संस्थान की नींव पक्की हुई। 1898 में उन्होंने प्रिंसिपल पद छोड़ दिया, लेकिन उनका प्रभाव आज भी महसूस किया जाता है। हर वर्ष 7 दिसंबर को उनके निधन दिवस को ‘फाउंडर्स डे’ के रूप में मनाया जाता है। इस दिन कॉलेज समुदाय उनके योगदान को याद करता है और नई पीढ़ी को प्रेरित करता है।

पुराण पुरुष

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सेंट स्टीफंस कॉलेज के इतिहास में सुशील कुमार रुद्रा एक पुराण पुरुष के समान हैं। 1906 से 1923 तक वे कॉलेज के प्रिंसिपल रहे और पहले भारतीय प्रिंसिपल बने। उस दौर में जब स्टाफ में अधिकांश अंग्रेज थे, एक भारतीय को इस पद पर नियुक्त करना स्वयं में एक क्रांतिकारी कदम था।

रुद्रा महात्मा गांधी और दीनबंधु सी.एफ. एंड्रयूज के घनिष्ठ मित्र थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का खुलकर समर्थन किया। 13 अप्रैल 1915 को गांधी जी पहली बार दिल्ली आए, तो रुद्रा के निमंत्रण पर ही। गांधी दंपति उस समय कश्मीरी गेट स्थित रुद्रा के घर में ठहरे थे। आज उस इमारत में दिल्ली चुनाव आयोग का कार्यालय है। रुद्रा छात्रों के बीच ‘बारासाहिब’ के नाम से प्रसिद्ध थे। उन्होंने कॉलेज में नाइट स्कूल शुरू किया ताकि कर्मचारियों के बच्चे भी शिक्षा से वंचित न रहें।

वे खेलों के प्रेमी भी थे। दिल्ली जिला क्रिकेट संघ (DDCA) के संस्थापकों में शामिल रुद्रा ने खेल को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाया। 1923 में रिटायरमेंट के बाद 1925 में उनका निधन हो गया। उनकी स्मृति में हर वर्ष 12 फरवरी को ‘रुद्रा डिनर’ का आयोजन किया जाता है। दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी (DBS) के प्रभारी ब्रदर सोलोमन जॉर्ज के अनुसार, 1877 में स्थापित ब्रदरहुड ऑफ द एसेंशन ऑफ क्राइस्ट (जिसका बाद में नाम दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी पड़ा) आज भी कॉलेज का संचालन करती है।

शरणार्थियों के हमदर्द

देश के बंटवारे के बाद दिल्ली लाखों शरणार्थियों की आमद की गवाह बनी। उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में स्थित दिल्ली यूनिवर्सिटी कैंपस के आसपास शरणार्थी परिवार बसने लगे थे। एक दिन सेंट स्टीफंस के प्रिंसिपल प्रो. डगलस राजाराम और उनकी पत्नी नॉर्थ कैंपस के बाहर खड़े थे। उन्होंने कुछ बच्चे गमले तोड़ते देखे। पूछने पर बच्चों ने कहा, “यहां स्कूल है ही नहीं।”

यह जवाब राजाराम को झकझोर गया। डीयू  में उनकी अच्छी पहुंच का फायदा उठाते हुए उन्होंने तुरंत मौरिस नगर में एक छोटी जगह पर स्कूल शुरू कराया। वह स्कूल पिछले वर्ष अपनी 75 वीं वर्षगांठ मना चुका है और अब बड़े कैंपस में संचालित हो रहा है। राजाराम स्वयं सेंट स्टीफंस के छात्र रह चुके थे। वे 1945 से 1960 तक कॉलेज के प्रिंसिपल रहे। उनके नेतृत्व में कॉलेज ने विभाजन के बाद की चुनौतियों का सामना किया और नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ा।

विरासत को आगे बढ़ाना

एलनट ने नींव रखी, रुद्रा ने भारतीय स्वरूप दिया और राजाराम ने इसे मजबूत किया। इन तीन प्रिंसिपलों को सेंट स्टीफंस की आत्मा कहा जा सकता है। इनके अलावा भी अनेक प्रिंसिपलों ने कॉलेज को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। आज जब पहली महिला प्रिंसिपल कॉलेज की बागडोर संभाल रही हैं, तो यह विरासत को नई दिशा देने का अवसर है।

नई प्रिंसिपल सुजैन एलियास से अपेक्षा की जाती है कि वे शैक्षणिक उत्कृष्टता, समावेशिता और सामाजिक जिम्मेदारी को और मजबूत करें। कॉलेज की 145 वर्ष से अधिक की यात्रा साबित करती है कि शिक्षा सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण का माध्यम है।

आज सेंट स्टीफंस न केवल दिल्ली बल्कि पूरे देश का गौरव है। यहां पढ़ने वाले छात्र न सिर्फ ज्ञान प्राप्त करते हैं, बल्कि मूल्यों, नैतिकता और नेतृत्व कौशल से लैस होकर बाहर निकलते हैं। पहली महिला प्रिंसिपल के नेतृत्व में कॉलेज नई पीढ़ी को प्रेरित करते हुए अपनी शताब्दी की विरासत को और समृद्ध करेगा।

यह बदलाव सिर्फ नाम का नहीं, बल्कि सोच का भी है। 1881 की उस साधारण शुरुआत से लेकर आज की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था तक का सफर दिखाता है कि समर्पण, दूरदृष्टि और निरंतरता से कोई भी संस्थान ऊंचाइयों को छू सकता है। सेंट स्टीफंस की नई प्रिंसिपल से पूरे देश को उम्मीद है कि वे इस गौरवशाली परंपरा को नई ऊर्जा और समावेशी दृष्टिकोण के साथ आगे ले जाएंगी।