AISHE Report 2023-24: पहली बार घटी UG एडमिशन की संख्या, जानिए क्यों बदल रहा है छात्रों का रुझान और क्या हैं इसके संकेत

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
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AISHE 2023-24 रिपोर्ट में पहली बार देशभर में अंडरग्रेजुएट (UG) दाखिलों में गिरावट दर्ज हुई है। वहीं पोस्ट ग्रेजुएट और पीएचडी पाठ्यक्रमों में नामांकन बढ़ा है। विशेषज्ञों ने इसके पीछे नई शिक्षा नीति, स्किल एजुकेशन, बढ़ती फीस और बदलती सोच को प्रमुख कारण बताया है।

नई दिल्लीः देश में उच्च शिक्षा को लेकर पहली बार एक नया रुझान देखने को मिला है। शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन (AISHE) 2023-24 रिपोर्ट के मुताबिक, देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में अंडरग्रेजुएट (UG) पाठ्यक्रमों में दाखिले की संख्या में पहली बार कमी दर्ज की गई है। दूसरी ओर पोस्ट ग्रेजुएट (PG) और पीएचडी कार्यक्रमों में छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि छात्रों की प्राथमिकताओं, शिक्षा व्यवस्था और रोजगार से जुड़ी सोच में हो रहे बदलाव का संकेत भी है।

AISHE रिपोर्ट में क्या सामने आया?

AISHE की 2022-23 और 2023-24 रिपोर्ट की तुलना के अनुसार, वर्ष 2023-24 में अंडरग्रेजुएट पाठ्यक्रमों में दाखिले पिछले वर्ष की तुलना में करीब एक लाख कम रहे। हालांकि कुल उच्च शिक्षा नामांकन में वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2022-23 में कुल नामांकन 4.46 करोड़ था, जो 2023-24 में बढ़कर 4.50 करोड़ हो गया। इसी अवधि में छात्राओं की संख्या 2.18 करोड़ से बढ़कर 2.24 करोड़ पहुंच गई, जबकि 18 से 23 वर्ष आयु वर्ग का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो (GER) भी 29.5 से बढ़कर 30 हो गया।

UG एडमिशन में गिरावट के पीछे क्या वजहें हैं?

विशेषज्ञों के अनुसार, इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं। पूर्व यूजीसी अध्यक्ष प्रोफेसर सुखदेव थोराट का कहना है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के तहत स्कूली स्तर पर कौशल आधारित शिक्षा को बढ़ावा दिया गया है। अब कक्षा 6 से ही व्यावसायिक शिक्षा पर जोर दिया जा रहा है, जिससे बड़ी संख्या में छात्र पारंपरिक डिग्री कार्यक्रमों के बजाय स्किल आधारित कोर्स चुन रहे हैं।

उन्होंने बताया कि चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम, मल्टीपल एग्जिट सिस्टम और कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET) जैसे बदलावों का भी प्रवेश प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ा है। मल्टीपल एग्जिट व्यवस्था के कारण कई छात्र डिग्री पूरी होने से पहले ही सर्टिफिकेट या डिप्लोमा लेकर पढ़ाई छोड़ रहे हैं।

बढ़ती फीस और कम होती छात्रवृत्तियां भी बनी चुनौती

रिपोर्ट के अनुसार, कई छात्रवृत्ति योजनाओं के बंद होने और सरकारी फंडिंग में कमी का असर भी उच्च शिक्षा पर पड़ा है। सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों पर वित्तीय दबाव बढ़ने से फीस में बढ़ोतरी हुई है, जिससे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के लिए उच्च शिक्षा हासिल करना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो गया है।

प्रोफेसर थोराट के मुताबिक, राष्ट्रीय प्रतिभा खोज परीक्षा (NTSE), सेकेंडरी एजुकेशन के लिए लड़कियों की प्रोत्साहन योजना, बेगम हजरत महल छात्रवृत्ति और मौलाना आजाद नेशनल फेलोशिप जैसी योजनाओं के बंद होने का असर भी छात्रों पर पड़ा है। उनका मानना है कि इसका सबसे अधिक प्रभाव सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों पर देखने को मिल रहा है।

रोजगार और बदलती सोच ने भी बदला ट्रेंड

हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर फुरकान कमर के अनुसार, अब केवल नीतियां ही नहीं बल्कि युवाओं की सोच भी तेजी से बदल रही है। उन्होंने कहा कि युवा आबादी में कमी आने से स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या भी घट रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि कई छात्र और उनके परिवार अब यह मानने लगे हैं कि केवल डिग्री हासिल करने से रोजगार की गारंटी नहीं मिलती। वहीं, निजी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों की ऊंची फीस भी बड़ी चुनौती बन गई है। ऐसे में कई छात्र महंगे डिग्री कोर्स के बजाय स्किल डेवलपमेंट, व्यावसायिक प्रशिक्षण और अन्य वैकल्पिक करियर विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

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