मुरीद रूमी के लिए ईरान से तुर्की पहुंचे शम्स
मुरीद रूमी के लिए ईरान से तुर्की पहुंचे शम्स शम्स तबरेजी 13 वीं सदी के एक महान फारसी सूफी संत, दार्शनिक और कवि थे, जिन्हें प्रसिद्ध कवि जलालुद्दीन रूमी के आध्यात्मिक गुरु के रूप में जाना जाता है। मौलाना शम्स अल-दीन मुहम्मद इब्ने मलिकदादे तब्रीजी का जन्म लगभग 1184 ईस्वी में ईरान के अजरबैजान प्रांत की राजधानी तब्रीज में हुआ था। -करन सिंह मौर्य, बरेली
‘शम्स’ अरबी शब्द है, जिसका अर्थ सूरज होता है और वे सचमुच अपने समय के आध्यात्मिक आकाश में सूर्य की भांति चमके। उनके पिता का नाम इमाम अलाउद्दीन या अली बताया जाता है, जबकि उनके दादा मलिक दाद थे। उस समय का परिवेश राजनीतिक और धार्मिक उथल-पुथल से भरा हुआ था। धर्मयुद्ध, मंगोल आक्रमण और सत्ता परिवर्तन ने पूरे क्षेत्र को प्रभावित किया था।
बाल्यावस्था में ही शम्स को शिक्षा हेतु शेख अबू बक्र-ए-सल्लह बाफ के सुपुर्द कर दिया गया। उन्होंने अपने गुरु से आध्यात्मिक साधना के अनेक आयाम सीखे, किंतु स्वयं शम्स का मानना था कि उनके भीतर कुछ ऐसा था, जिसे कोई पूरी तरह पहचान नहीं सका। ईश्वर की खोज की तीव्र लगन उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती रही, इसी कारण वे “शैख परिंदा” अर्थात उड़ता हुआ संत कहे जाने लगे। वे साधारण जीवन जीते हुए भी गहन आध्यात्मिक ज्ञान के धनी थे। फारसी और अरबी साहित्य, सूफी दर्शन, इस्लामी कानून तथा विज्ञान में उनकी गहरी पकड़ थी।
युवावस्था में शम्स ईश्वर प्रेम में इतने डूब जाते थे कि कई-कई दिनों तक भोजन की सुध तक नहीं रहती थी। वे दरवेशों और सूफी संतों के साथ समय बिताते और परमात्मा से एक ऐसी आत्मा की प्रार्थना करते, जो उनके प्रेम और अनुभूति को समझ सके। अंततः 21 नवंबर 1244 को तुर्की के कोन्या में उनकी मुलाकात जलालुद्दीन रूमी से हुई। यह ऐतिहासिक मिलन दोनों के जीवन में परिवर्तन का कारण बना। शम्स ने रूमी को केवल एक विद्वान मौलवी से उठाकर प्रेम और भक्ति में डूबे महान सूफी कवि में परिवर्तित कर दिया।
रूमी शम्स के व्यक्तित्व और उनके दिव्य प्रेम से इतने प्रभावित हुए कि वे पूरी तरह उनके समर्पित हो गए। किंतु रूमी के शिष्यों और स्थानीय विद्वानों को यह संबंध स्वीकार नहीं हुआ। ईर्ष्या और विरोध के कारण शम्स को कोन्या छोड़ना पड़ा। उनके जाने से रूमी गहरे विरह में डूब गए। बाद में जब यह ज्ञात हुआ कि शम्स दमिश्क में हैं, तो रूमी ने अपने पुत्र वलद को उन्हें वापस लाने के लिए भेजा। शम्स पुनः कोन्या लौटे, किंतु विरोध की भावना समाप्त नहीं हुई।
अंत में परिस्थितियां ऐसी बनीं कि शम्स एक बार फिर कोन्या से चले गए और फिर कभी दिखाई नहीं दिए। उनके जीवन के अंतिम चरण को लेकर अनेक कथाएं प्रचलित हैं, किंतु सत्य आज भी रहस्य बना हुआ है। शम्स का जीवन सादगी, आत्मिक खोज और ईश्वर प्रेम का प्रतीक था। वे बाहरी आडंबर से दूर, केवल आंतरिक साधना में विश्वास रखते थे। उनका संपूर्ण जीवन इस सत्य को उजागर करता है कि सच्ची आध्यात्मिकता बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि आत्मा की गहराइयों में बसती है।
