भीषण गर्मी में प्रकृति का उपहार माउंट आबू
अगर आप हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ घूम चुके हैं, तो इस भीषण गर्मी में राजस्थान का इकलौता हिल स्टेशन माउंट आबू बड़ी राहत प्रदान कर सकता है। यहां के ठंडे मौसम का मजा लेने के लिए हमने मई के तीसरे हफ्ते में घूमने का कार्यक्रम बनाया। अरावली की हरी-भरी पहाड़ियों से घिरे खूबसूरत शहर माउंट आबू का अधिकतम तापमान इस दौरान 35 डिग्री तो न्यूनतम तापमान 24 डिग्री सेल्सियस के आसपास मिला। माउंट आबू समुद्र तल से 1722 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। प्राकृतिक सुंदरता के साथ यह स्थान जैन धर्म के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है।
माउंट आबू का इतिहास पुराणों से जुड़ा है। पुराणों के समय में इसे ‘अरबुदारण्य’ या ‘अरभुदा का वन’ कहा जाता था। मान्यता है कि ऋषि विश्वामित्र से प्रेरणा लेने के बाद ऋषि वशिष्ठ ने यहीं विश्राम किया था और यज्ञ करके पृथ्वी पर धर्म की रक्षा के लिए देवताओं से वरदान मांगा था। एक अन्य पौराणिक कथा में अर्भुदा नामक सर्प का उल्लेख है, जिसने यहां भगवान शिव के वाहन नंदी का जीवन बचाया था। वैसे इतिहास के अनुसार अरबुदा पर्वतमाला या माउंट आबू गुर्जरों की जन्मभूमि के लिए भी प्रसिद्ध है। माउंट आबू का समीपस्थ हवाई अड्डा 176 किमी दूर उदयपुर में है। निकटतम रेलवे स्टेशन करीब 28 किमी की दूरी पर आबू रोड है। यह रेलवे स्टेशन दिल्ली और मुंबई को जोड़ने वाली रेल लाइन पर स्थित है।
मानव निर्मित नक्की झील और टॉड रॉक व्यू पॉइंट से नजारे
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भारत की पहली मानव निर्मित झील, नक्की झील, माउंट आबू में घूमने का सबसे लोकप्रिय स्थान है। यहां आप नौका विहार कर सकते हैं और आसपास की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच सूर्यास्त का नजारा देख सकते हैं। नक्की झील महात्मा गांधी की अस्थियों को विसर्जित करने के स्थान के रूप में भी प्रसिद्ध है। यहां आप खूबसूरत यादगार तस्वीरें ले सकते हैं। नक्की झील के पास ही टॉड रॉक व्यू पॉइंट है। इसे यहां का प्रतीक कहा जाता है। इसका आकार एक मेढक जैसा है। यह विशाल चट्टानी संरचना अद्भुत आकृतियों में पाई जाने वाली आग्नेय चट्टानों का उत्कृष्ट उदाहरण है। यहां बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। चट्टान पर चढ़ना काफी आसान है और यहां से नक्की झील और आसपास की हरियाली के मनोरम दृश्य बेजोड़ नजर आते हैं।
300 सीढ़ी ऊपर गुरु शिखर व सफेद संगमरमर का जैन मंदिर
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गुरु शिखर को माउंट आबू का सबसे ऊंचा स्थान माना जाता है। घूमने के लिए एक बेहतरीन जगह है। गुरु शिखर पर स्थित गुरु दत्तात्रेय के मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 300 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। गुरु शिखर के बाद हम तीन किमी दूर स्थित दिलवारा जैन मंदिर पहुंचे। 11वीं और 13वीं शताब्दी के बीच स्थापित यह जैन मंदिर स्थापत्य कला की उत्कृष्ट कृति है। यह पांच मंदिरों का परिसर है। सफेद संगमरमर से तराशे गए इन मंदिरों के भीतरी भाग में दरवाजों से लेकर छत तक हर कहीं जटिल नक्काशी देखी जा सकती है। जैन मंदिर के पास स्थित लाल मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर की सभी दीवारें लाल रंग से रंगी हुई हैं। यह मंदिर स्वयंभू शिव मंदिर के रूप में भी प्रसिद्ध है। मंदिर के भीतर स्थापित प्रतिमा जनेऊ पहने हुए है।
पीस पार्क में मौन के साथ ध्यान की अद्भुत धारा
अरावली की चोटियों गुरु शिखर और अचलगढ़ के बीच स्थित पीस पार्क ब्रह्मा कुमारी संस्था का हिस्सा है। शांति और सुकून का अनूठा संगम इस पार्क को मौन और शांतिपूर्ण मनोरंजन के लिए सुंदर पृष्ठभूमि प्रदान करता है। यहां कैक्टस की विभिन्न प्रजातियों से सुसज्जित रॉक गार्डन, फलों का बगीचा, नींबू का कोना देखा जा सकता है। खूबसूरत गुलाब उद्यान, पत्थर की गुफा और झोपड़ियों जैसे स्थानों में लोग ध्यान लगाते हैं। कुल मिलाकर प्रकृति की गोद में स्थित यह एकांत स्थान नया अनुभव देता है।
मगरमच्छ पार्क और अभ्यारण की सैर
ट्रेवर टैंक यानी मगरमच्छ पार्क मानव निर्मित मगरमच्छ प्रजनन स्थल है। यह स्थान प्राकृतिक सुंदरता से भरपूर है और मगरमच्छ, पक्षियों और अन्य वन्यजीवों (जैसे काला भालू) को देखने के लिए बेहतरीन जगह है। हरे-भरे वातावरण के कारण यह पिकनिक स्थल भी है। इसी तरह 288 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला माउंट अबू वन्यजीव अभ्यारण्य समृद्ध वनस्पति और जीव-जंतुओं से भरा है। यहां लोमड़ी, पैंगोलिन, धूसर जंगली मुर्गा, धारीदार लकड़बग्घा और तेंदुए सहित कुछ दुर्लभ और विदेशी जंगली जानवरों की प्रजातियां संरक्षित हैं।
अचलगढ़ किला के साथ अचलेश्वर महादेव मंदिर
माउंट आबू से अचलगढ़ किला लगभग 26 किमी दूर है। परमार वंश द्वारा निर्मित इस किले का महाराणा कुंभा द्वारा वर्ष 1452 में जीर्णोद्धार किया गया था। अचलेश्वर महादेव मंदिर, इसी किले के बाहर स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। मान्यता है कि यह मंदिर भगवान शिव के पैर के निशान के चारों ओर बना है। यहां का शिवलिंग प्राकृतिक रूप से बना है। यह मंदिर अपने शांत वातावरण, सुंदर नक्काशी और भगवान शिव के वाहन नंदी की असंख्य बैल मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। मंदिर के अंदर एक गड्ढा भी है, जिसे नरक का प्रवेश द्वार माना जाता है।
