दोबारा बातचीत से पूर्व विश्वास बहाली की जरूरत
ट्रंप ने पुन: पाकिस्तान की धरती पर ईरान से वार्ता के संकेत दिए हैं। अब देखना यह है कि वार्ता कब होती है और दोनों देश क्या शर्तें रखते हैं।
इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच हुई शांति वार्ता फिलहाल बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। जब वार्ता शुरू हुई थी, तभी यह कयास लगाए जा रहे थे कि इसमें कोई हल नहीं निकलेगा। यह आशंका सच साबित हुई। अमेरिका अपनी मांगों पर अड़ा हुआ है और ईरान अपनी मांग को लेकर। युद्ध विराम अभी जारी है। ट्रंप ने पुन: पाकिस्तान की धरती पर ईरान से वार्ता के संकेत दिए हैं। अब देखना यह है कि वार्ता कब होती है और दोनों देश क्या शर्तें रखते हैं। ईरान की सबसे बड़ी शर्त है कि उसे युद्ध में हुए नुकसान का मुआवजा मिले और होर्मुज जलडमरूमध्य में टोल वसूली का अधिकार मिले, लेकिन अमेरिका उसे यह छूट देने को तैयार नहीं है।
अमेरिका चाहता है कि ईरान अपनी लंबी दूरी की मिसाइलों पर कैपिंग करे और परमाणु बम बनाने की जिद छोड़ दे, पर ईरान इस शर्त पर राजी नहीं है। अब सवाल यही है कि जब दोनों देश अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं, तो वार्ता कैसे सफल होगी और युद्ध विराम कब तक टिकेगा, हालांकि अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य को घेर रखा है और उसकी सेना ने तो तेल लेकर जा रहे ईरानी जहाजों को भी रोक दिया है। अब उसकी इस कार्रवाई को उकसावा माना जा रहा है।
इस युद्ध का खामियाजा पूरी दुनिया भुगत रही है। युद्ध में शामिल न होने के बाद भी ईरान के हमले में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, बहरीन जैसे देशों के तेल डिपो, बड़े-बड़े औद्योगिक कारखाने, पेयजल के स्रोत, हवाई अड्डे तबाह हो गए। उनके नागरिकों की मौत भी हुई। अब अमेरिका इन देशों के इंफ्रास्ट्रक्चर को दुरुस्त करने के नाम पर बड़े पैमाने पर कमाई करेगा। उसकी कंपनियां वहां निवेश करेंगी। साथ ही डोनाल्ड ट्रंप इन देशों को बड़े पैमाने पर हथियार भी बेचेंगे। युद्ध में हुए आर्थिक नुकसान की भरपाई इन्हीं देशों से करेंगे।
ईरान से संघर्ष में अमेरिका को 20 बिलियन डॉलर से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है, जबकि इससे कहीं ज्यादा का नुकसान खाड़ी में उसके सहयोगी देशों ने ईरानी हमले से झेला है। दुनिया के तमाम देशों में कच्चे तेल और गैस के लिए त्राहि- त्राहि मची हुई है। ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में बारूदी सुरंगे बिछाकर तमाम देशों के तेल और गैस से भरे जहाजों को रोक रखा है। सिर्फ कुछ मित्र देशों के जहाजों को ही उसने अनुमति दी है, वहां से गुजरने के लिए। ऐसे में तीन हजार से अधिक जहाज वहां तेल और गैस भरकर खड़े हैं। इस मौके का फायदा भी अमेरिका ही उठा रहा है। उसने तमाम देशों को तेल बेचने का ऑफर भी दे दिया है।
अमेरिका ने होर्मुज पर कब्जे की अपनी मंशा जाहिर कर दी है और उसे घेर कर यह घोषणा कर दी है कि जो देश ईरान को टोल देंगे, उनके जहाज को वह वहां से नहीं जाने देगा। चीन इस घेरेबंदी के बाद भी वहां से निकला, जबकि यह स्पष्ट नहीं हो सका कि उसने ईरान को टोल दिया था या नहीं। उधर, तेल भरे जहाज रोके जाने से ईरान नाराज है और उसने कड़ी प्रतिक्रया दी है। अब पाकिस्तान फिर से चीन की अंदरूनी मदद से ईरान को वार्ता के लिए मना रहा है. लेकिन विदेशी मामलों के जानकार मान रहे हैं कि दोबारा वार्ता तभी सफल होगी जब खुले मन से दोनों देश वार्ता की मेज पर बैठेंगे। दोनों पक्षों को अपनी- अपनी शर्तों में कुछ ढील देनी होगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही पुन: वार्ता के संकेत दे रहे हैं, लेकिन उनके अड़ियल रुख से वार्ता की सफलता पर हर किसी को संदेह है। खाड़ी देशों और इजरायल में भारी तबाही मचाने के साथ ही अमेरिकी लड़ाकू विमानों और ड्रोन को गिराकर अपनी ताकत का अहसास कराने वाला ईरान अमेरिकी शर्तों पर झुकने को तैयार नहीं है। हां, उसने इस बात के संकेत जरूर दिए हैं कि अमेरिका कुछ झुकेगा तो वह भी झुकने को तैयार है। ईरान चाहता है कि उसे होर्मुज में टैक्स वसूली का अधिकार मिले। उसके यहां जो क्षति हुई है उसका मुआवजा मिले। साथ ही उसके ऊपर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध हटें। यह शर्तें मानना अमेरिका के लिए कठिन है, क्योंकि इन शर्तों को मानने के बाद ट्रंप अपने देश की जनता के सामने हारे हुए योद्धा से कम नहीं दिखेंगे जो वह दिखना नहीं चाहते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मई माह में चीन का दौरा करने वाले हैं। इस दौरे से पहले वे ईरान पर निर्णायक जीत चाहते हैं, इसीलिए वे वार्ता के लिए दोबारा उतावले हैं। अगर ईरान उनकी शर्तें मान लेता है, तो ट्रंप आसानी से घोषित कर पाएंगे कि अमेरिका और उसके सहयोगी इजरायल ने यह युद्ध जीत लिया है, लेकिन ईरान आसानी से उन्हें इस युद्ध से बाहर नहीं निकालने देगा। ट्रंप यदि युद्ध जीत कर आते हैं, तो चीन पर वार्ता से पहले बड़ा दबाव होता वे खुद को जीते हुए योद्धा की तरह वहां पेश करते, लेकिन अब दबाव ट्रंप पर है, क्योंकि वे यहां बहुत लंबी-लंबी बातें नहीं कर पाएंगे।
