सर्पविष का विज्ञान: संरचना और प्रभाव

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Published By Anjali Singh
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भारत में आदिकाल से सांप से संबंधित फोकलोर और वैज्ञानिक साहित्य उपलब्ध है। आयुर्वेद में विष चिकित्सा में इनका वर्णन है। अंग्रेजों के समय में भारत उपमहाद्वीप ही नहीं, बल्कि श्रीलंका और बर्मा में पाए जाने वाले सांपों की प्रजातियों और इनके जहर के बारे में विशेष अध्ययन और डॉक्यूमेंटेशन वर्क हुआ था। इन पुस्तकों में सभी किस्म सांपों के हाथ से बनाए गए रंगीन चित्र दिए गए हैं। इनके बारे में बहुत सा अध्ययन ब्रिटेन की लैब्स में उन दिनों अंग्रेज वैज्ञानिकों ने किया था और मनुष्य में सांप के काटने के बाद शरीर में फैलने वाले इन जहरों को बे-असर करने के उपाय विकसित किए गए थे। 

आधुनिक मॉलिक्यूलर बायोलॉजीकल अध्ययनों से विभिन्न जहरीले सांपों के जहर की विस्मित करने वाली संरचनाएं सामने आईं हैं। दवा उद्योग में सांपों के विभिन्न प्रकार के जहर की बड़ी मांग है, क्योंकि इस पर अरबों रुपये का उद्योग खड़ा किया गया है। मनुष्य और पालतू पशुओं की जान बचाने के लिए या एन्वीनोमिंग के लिए जो एंटीबाडीज और अन्य उत्पाद दवा फैक्ट्रीज में बनाए जाए हैं, उससे पहले इन पर व्यापक अध्ययन किया जाता है और खास तरह की प्रोसस्सेस को विकसित किया जाता है। अब सांप के काटे का टीका बनाने के लिए घोड़ों का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं है,  क्योंकि बायोटेक्नोलॉजी और केमिकल विधियों से इन्हें बड़ी मात्रा में निर्मित करना सिद्ध किया जा चुका है।

लोग सांप के प्रति एक ही प्रकार का नजरिया रखते हैं: मार देना। यह बिल्कुल प्रकृति विरुद्ध काम है। सांपों के परिवेश अर्थात हैबिटैट और व्यवहार का अध्ययन करने वाले कुछ और कहते हैं। भारत में सांपों की करीब 300 किस्में हैं और इनके रंग और हैबिटैट भी अलग है। इनमें से नाग अर्थात कोबरा, वाईपर की दो किस्में और करात ही जहरीले हैं। सांप प्रजातियों की खुराक अलग-अलग होती है। भारत में सभी सांप जहरीले नहीं हैं। इनमें चार प्रकार के जहर होते हैं। ये एक प्रकार के कुदरती एंजाइम अथवा प्रोटीन होते हैं और इनकी रासायनिक और मॉलिक्यूलर संरचना अलग-अलग तरह की होती है। ज्यादातर जहर चार प्रकार के असर वाले यथा न्यूरोटॉक्सिक, साइटोटॉक्सिक, हीमोटॉक्सिक और मायोटॉक्सिक हैं। 

अर्थात कोई जहर शरीर के नर्वस सिस्टम, दूसरा, रक्त कोशिकाओं, तीसरा शरीर के उत्तकों की कोशिकाओं और चौथा मांशपेशियों की कोशिकाओं को नष्ट करता है। सांप अपने शरीर में जहर का निर्माण अथवा सिंथेसिस शिकार को बेदम करने के लिए और अपनी रक्षा करने के लिए करते हैं। इन चारों किस्म के जहर का निर्माण करने के लिए सांप के शरीर में विशेष कोशिकाएं/ग्रंथियां होती हैं। विष का उत्पादन अत्यधिक विशिष्ट लार स्रावी ग्रंथियों के भीतर होता है। रूपांतरित ग्रंथियां अथवा एपिथीलियल कोशिकाएं विभिन्न प्रोटीन घटकों का संश्लेषण करती हैं। सांपों के जहर की एक बड़ी वैरायटी फोस्फोलायीपेज ए-2 डाइजेस्टिव एंजाइम से ‘तेज विकास’ की प्रक्रिया के जरिए विकसित हुई है। इन जहरों के अलग-अलग टिश्यू टारगेट, मेम्ब्रेन रिसेप्टर और सेल प्लाज्मा मेम्ब्रेन को बदलने के अलग-अलग तरीके होते हैं। जहर जैसे असरात दिखाने वाले फोस्फोलायीपेज ए-2 की किस्मों से होने वाले दो सबसे आम असर हैं न्यूरोटॉक्सिसिटी और मायोटॉक्सिसिटी। 

विभिन्नताओं के बावजूद, सांप का जहर एक जैसा सेल्यूलर घाव कैसे पैदा करते हैं, जो विकास के नजरिए से बहुत ज्यादा सुरक्षित है। वे शुरू में प्लाज्मा मेम्ब्रेन में गड़बड़ी पैदा करते हैं, जिससे साइटोसोलिक कैल्शियम आयन Ca2+ की मात्रा में भारी बढ़ोतरी होती है, जिससे सेल का क्षरण होता है। यह प्रक्रिया उन तरीकों से होती है, जिसमें मांसपेशियों के सेल्स और न्यूरोमस्कुलर जंक्शन प्रभावित होते हैं। उक्त कैल्शियम आयन एक धनात्मक आवेश वाला आयन है और कई जैविक तथा शारीरिक प्रक्रियाओं के लिए जरूरी है। यह एक द्विसंयोजी धनायन है, जिसका मतलब है कि जब एक उदासीन कैल्शियम परमाणु अपने दो सबसे बाहरी इलेक्ट्रॉन खो देता है, तो उस पर +2 का आवेश आ जाता है। 

इस धनात्मक आवेश के कारण यह ऋ णात्मक आवेश वाले आयनों (ऋ णायनों) -जैसे कि फॉस्फेट और कार्बोनेट, के साथ आयनिक बंध बना पाता है। यह प्रक्रिया कैल्शियम लवणों के निर्माण और हड्डियों के खनिजीकरण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जहरों से होने वाले अलग-अलग सिस्टमिक पैथोफिजियोलॉजिकल नतीजे सेल टॉक्सिसिटी के अलग-अलग तरीकों की वजह से नहीं होते, बल्कि टारगेट किए गए टिश्यू और सेल्स की अंदरूनी शारीरिक और जैविक विशेषताओं की वजह से होते हैं। फोस्फोलायीपेज ए-2 एक ऐसा एंजाइम है, जो फॉस्फोलिपिड्स के हाइड्रोलिसिस को उत्प्रेरित करता है। 

वाइपर सांप की किस्म के विष के मामले में, फोस्फोलायीपेज ए-2 द्वारा पैदा की गई स्थानीय विकृति अन्य विषाक्त घटकों -मुख्य रूप से जिंक-निर्भर मेटालोप्रोटीनेज, की क्रिया से और भी अधिक जटिल हो जाती है। ये घटक रक्तस्राव, फफोले और अन्य ऐसे बदलाव पैदा करते हैं, जो ऊतकों को व्यापक नुकसान पहुंचाने और ऊतकों के खराब पुनर्निर्माण के कारण होने वाले दीर्घकालिक परिणामों अर्थात सीक्वेली के लिए जिम्मेदार होते हैं। 

इसके अलावा, विषाक्त पदार्थों के कारण ऊतकों को होने वाला नुकसान बैक्टीरिया के संक्रमण के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करता है। यह संक्रमण स्थानीय विकृति को और भी अधिक जटिल बना देता है और अंततः गैंग्रीन तथा ऊतकों के नष्ट होने का कारण बन सकता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रभावित अंग को काटकर अलग करने की आवश्यकता पड़ सकती है। इन फोस्फोलायीपेज ए-2  टॉक्सिन्स के समूह का गहन अध्ययन किया जाता है, क्योंकि कई देशों में सर्पदंश से मरने वाले लोगों की बड़ी संख्या बहुत गंभीर है। टॉक्सिन्स का अध्ययन इसलिए भी किया जाता है, क्योंकि वे ऊतकों और कोशिकाओं की कार्यप्रणाली  के अज्ञात पहलुओं को उजागर करने में मदद कर सकते हैं।