प्राकृतिक सौंदर्य का दर्शनीय स्थल अमरकंटक
मध्य प्रदेश भारत के उत्तर और दक्षिण तथा पूर्व और पश्चिम का संधि- स्थल ही नहीं है, अपितु भौगोलिक दृष्टि से यहां पहाड़ पठार, घने वन, विस्तृत मैदान और नदी घाटियों का आकर्षक एवं समृद्ध प्रकृति का वरदान भी है। प्रकृति, कला और सौंदर्य की दृष्टि से यह पर्यटकों के लिए स्वर्ग है। ऐसा संयोग कम ही स्थलों को मिलता है, जहां प्रकृति की सुंदर छटा भी बिखरी हो और साथ ही धार्मिकता का पुण्य-लाभ भी प्राप्त हो, कदाचित मध्य प्रदेश का अमरकंटक ऐसा ही अनुपम स्थान है। -गौरीशंकर वैश्य विनम्र
अमरकंटक में प्रकृति रोमांचित करती है। घने जंगल आनंदित करते हैं तथा अध्यात्म और धर्म इस नगरी को एक विशिष्ट पहचान दिलाते हैं। वास्तव में यह ऐसी जगह भी है, जो दो बड़ी नदियों नर्मदा और सोन का उद्गम स्थल भी है। पूर्व से पश्चिम की दिशा में बहने वाली देश की दो नदियों में एक नर्मदा का उद्गम एक छोटे कुंड से हुआ देखकर आश्चर्य होता है। पानी की झिर इस कुंड से होकर बड़े आयताकार कुंड में एकत्र होती है।
इस जलसंरचना का निर्माण कल्चुरी काल में किया गया। इसी प्रकार सोनमूढ़ा नर्मदाकुंड से 1.5 किलोमीटर की दूरी पर मैकल पहाड़ियों के किनारे पर है। सोन नदी 100 फीट ऊंची पहाड़ी से एक झरने के रूप में यहां से गिरती है। इनके उद्गम को देखेंगे, तो लगेगा ही नहीं कि छोटे - छोटे कुंडों से निकलकर काफी दूर तक बहुत पतली धारा में बहने वाली ये नदियां देश की संस्कृति और धार्मिकता एवं विकास को नए आयाम देती हैं।
पहाड़ों पर बसा अमरकंटक
मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले में विंध्य और सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित अमरकंटक को तीर्थराज की संज्ञा भी दी गई है। यह समुद्र तट से लगभग 1065 मीटर ऊंचाई पर स्थित हिल स्टेशन की अनुभूति कराता है। कल्चुरी कालीन प्राचीन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध अमरकंटक घने जंगल तथा औषधीय गुणों से भरपूर पौधों की सम्पदा के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ खदानें भी हैं और जलप्रपात भी, जल के अदृश्य स्रोत भी और सुंदर आश्रम तथा मंदिर भी। यहाँ का शांत वातावरण पर्यटकों को सहज ही आत्ममुग्ध कर देता है। अमरकंटक की यात्रा आध्यात्मिक स्पर्श कराती है। यहाँ आते ही हवा में ताजगी और शुद्धता का आभास होने लगता है।
प्राचीन मान्यताओं के अनुसार माता सती के दो अंग इस क्षेत्र में गिरे थे, अतः यह क्षेत्र दो शक्तिपीठों का क्षेत्र होने के कारण अति पवित्र है। उन दो स्थानों में से एक सोनमूढ़ा सोन नदी के उद्गम स्थल के पास है और दूसरा माँ नर्मदा के उद्गम के पास स्थित देवी पार्वती जी का मंदिर है। यहाँ से मनमोहक झरने, पवित्र तालाब, ऊँची पहाड़ियों और शांत वातावरण यात्रियों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं।
100 फीट ऊंचा जलप्रपात
पहले अमरकंटक शहडोल जिले में था। अब यह अनूपपुर जिले में है।यह मैकल पर्वत श्रृंखला पर स्थित है। पत्थरों की चारदीवारी के अंदर पत्थर से निर्मित नर्मदाकुंड मंदिर, शिव परिवार, कार्तिकेय मंदिर, श्री सूर्यनारायण मंदिर, सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, ग्यारह रुद्र मंदिर, अन्नपूर्णा, गुरु गोरखनाथ, श्री रामजानकी, श्री राधाकृष्ण मंदिर, श्री ज्वालेश्वर महादेव, सर्वोदय जैन मंदिर, कबीर चबूतरा, कपिलाधारा, माई की बगिया आदि स्थल सदियों पुरानी स्थापत्यकला को सहेजे हुए हैं, जहाँ धार्मिक पर्यटकों को आना उपकृत करता है। मंदिर परिसर के आसपास परिक्रमावासियों के समूह अमरकण्टक को तपस्थली के रूप में प्रतिबिंबित करते हैं। नर्मदा विश्व की एक मात्र सरिता है, जिसकी परिक्रमा की जाती है। कुंड से आगे निकलकर नर्मदा कल - कल बहने लगती है। लगभग 6 किलोमीटर की यात्रा कर नर्मदा 100 फीट ऊँचा जलप्रपात बनाती है, जिसे कपिलाधारा के नाम से जाना जाता है। हरे - भरे वातावरण से घिरे इस झरने के आगे दूध धारा है, जो छोटा जलप्रपात है। यहाँ पर्यटक निडर होकर स्नान करते हैं। कालिदास भी यहाँ आए थे और वे यहाँ की सुंदरता में निमग्न हो गए। उनके मेघदूत के बादल इसी अमरकंटक नगरी के ऊपर से विचरण करते हैं। जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ने भी यहाँ आकर तप किया था।
प्रमुख स्थल :
भगवान शिव का त्रिमुखी मंदिर
अमरकंटक के प्रमुख मंदिरों में भगवान शिव का त्रिमुखी मंदिर है। इसे कल्चुरी शासक कर्ण देव महाचंद्र ने 1041-1073 ई ० में निर्माण कराया था। मंदिर में कल्चुरी कालीन शिल्पकारों की बनाई आकृतियाँ सम्मोहित करती हैं।
कपिलाधारा
अमरकंटक की यात्रा कपिलाधारा देखे बिना अधूरी रहेगी। यहाँ 100 फीट की ऊँचाई से पानी गिरता है। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि कपिल मुनि यहाँ रहते थे। कपिल मुनि ने सांख्य दर्शन की रचना इसी स्थान पर की थी। कपिलाधारा के निकट ही कपिलेश्वर मंदिर भी बना है। इस जगह के आसपास कई गुफाएँ हैं, जहाँ अब भी साधु - संत ध्यानमग्न देखे जा सकते हैं।
कबीर चबूतरा
कबीरपंथियों के लिए इस स्थान का बहुत महत्व है। कहा जाता है कि संत कबीरदास संवत 1569 में बांधवगढ़ से जगन्नाथपुरी प्रवास के समय यहाँ लंबे समय तक रहे थे। उन्होंने यहाँ पर ध्यान लगाया था। ऐसी मान्यता है कि इस स्थान पर कबीरदास के प्रवास के बीच गुरु नानक देव जी उनसे मिलने आए थे। कबीर चबूतरे के निकट ही रानी झरना (कबीर झरना) भी है। कबीर चबूतरे के ठीक नीचे एक जलकुंड है, जिसके बारे में कहा जाता है कि सुबह की किरणों के साथ ही यहाँ के जलकुंड का पानी दूध की तरह सफेद हो जाता है।
धूनी पानी
यहाँ गर्म पानी का झरना है। इसके बारे में कहा जाता है कि यह झरना औषधीय गुणों से भरपूर है।इसमें स्नान करने से शरीर के असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं।
दुग्धधारा
दुग्धधारा एक ऐसा झरना है , जिसका जल दूध के समान प्रतीत होता है, इसीलिए इसे दुग्धधारा के नाम से जाना जाता है।
सोनमूढ़ा
यह सोन नदी का उद्गम स्थल है। यहाँ से घाटी और जंगल से ढकी पहाड़ियों के सुंदर दृश्य देखे जा सकते हैं।
माँ की बगिया
यह माता नर्मदा को समर्पित है। कहा जाता है कि इस हरी - भरी बगिया से शिव जी की पुत्री नर्मदा पुष्पों को चुनती थीं। यह बगिया नर्मदा कुंड से एक किलोमीटर की दूरी पर है।
सर्वोदय जैन मंदिर
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यह मंदिर भारत के अद्वितीय मंदिरों में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इस मंदिर को बनाने में सीमेंट और लोहे का प्रयोग नहीं किया गया है। मंदिर में स्थित मूर्ति का वजन 24 टन के लगभग है। भगवान आदिनाथ अष्ट धातु के कमल सिंहासन पर विराजमान हैं, कमल सिंहासन का वजन 17 टन है। प्रतिमा को मुनि श्री विद्यासागर जी महाराज ने 6 नवंबर, 2006 को विधि - विधान से स्थापित किया था।
नर्मदा परिक्रमा
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नर्मदा परिक्रमा विधि - विधान - नियम से की जाए,तो 1300 किमी से भी अधिक लंबी परिक्रमा होती है,जो 3 वर्ष 3 महीने 13 दिन में पूर्ण होती है, किन्तु आज के समय में मोटरसाइकिल या चौपहिया वाहन के द्वारा यात्रा को जल्दी पूरा कर लिया जाता है। नर्मदा परिक्रमा में नर्मदा नदी को पार नहीं किया जाता है। परिक्रमा में सभी स्थानों पर दर्शनीय स्थल देखने को मिलते हैं।
यहां कैसे पहुंचें
अमरकंटक जबलपुर और बिलासपुर के निकट है। शहडोल से भी सड़क मार्ग से पहुँचा जा सकता है।अमरकंटक का निकटतम हवाई अड्डा जबलपुर में है। यहाँ से अमरकंटक की दूरी 245 किमी है। जबलपुर - बिलासपुर ट्रैक पर पेंट्रा रोड स्टेशन अमरकंटक के सबसे समीपस्थ रेलवे-स्टेशन है। बिलासपुर, अनूपपुर और जबलपुर जंक्शन से भी अमरकंटक पहुँचा जा सकता है। शहडोल रेलवे-स्टेशन से अमरकंटक से 80 किमी तथा अनूपपुर रेलवे-स्टेशन से 72 किमी दूर है, जहाँ से लगातार बसें और टैक्सियां चलती रहती हैं।
-गौरीशंकर वैश्य विनम्र
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