चिंतनीय है पृथ्वी पर बढ़ता तापमान और सिमटते वन
पृथ्वी केवल एक खगोलीय पिंड नहीं, बल्कि जीवन की वह अद्भुत संरचना है, जिसमें असंख्य तंत्र एक साथ संतुलन में कार्य करते हैं। वायु, जल, मृदा, वनस्पति और जीव-जंतु- ये सभी मिलकर एक ऐसा पारिस्थितिक तंत्र रचते हैं, जो करोड़ों वर्षों की विकास प्रक्रिया का परिणाम है। किंतु वर्तमान समय में यह संतुलन अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है। मानव-जनित कारणों से पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ रहा है और इसका सीधा प्रभाव वनों तथा वन्यजीवों के अस्तित्व पर पड़ रहा है। प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला पृथ्वी दिवस इस संकट को समझने और उससे उबरने की दिशा में सामूहिक संकल्प का प्रतीक है। जब हम इस विराट सृष्टि के स्वरूप पर विचार करते हैं, तो सबसे पहले जिस तत्व का बोध होता है, वह है पृथ्वी। यही वह धरा है, जिसने अनादि काल से समस्त जीव-जगत को अपने आंचल में स्थान दिया है। यह केवल मिट्टी, जल और पाषाण का समूह नहीं, बल्कि जीवन का आधार, चेतना का केंद्र और अस्तित्व का स्तंभ है। -डॉ. जितेंद्र शुक्ला (वन्यजीव विशेषज्ञ)
भारतीय मनीषा ने पृथ्वी को ‘माता’ कहकर संबोधित किया और मनुष्य को उसका ‘पुत्र’ माना। यह संबंध केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि गहन वैज्ञानिक और दार्शनिक आधार पर टिका हुआ है। प्रतिवर्ष मनाया जाने वाला पृथ्वी दिवस हमें इसी संबंध का स्मरण कराता है और यह प्रश्न उठाता है कि क्या हम अपनी माता के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह कर पा रहे हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह स्पष्ट हो चुका है कि औद्योगिक युग के आरंभ से अब तक पृथ्वी के औसत तापमान में लगभग 1 डिग्री से अधिक की वृद्धि हो चुकी है। यह वृद्धि भले ही नगण्य प्रतीत हो, परंतु इसके परिणाम अत्यंत व्यापक हैं। पृथ्वी की ऊष्मा संतुलन प्रणाली, जिसमें सूर्य से प्राप्त ऊर्जा और अंतरिक्ष में उत्सर्जित ऊर्जा का संतुलन शामिल है- अब असंतुलित हो रही है। वायुमंडल में कार्बन युक्त गैसों की मात्रा बढ़ने से यह ऊष्मा पृथ्वी की सतह पर अधिक समय तक बनी रहती है, जिससे तापमान में वृद्धि होती है।
वर्तमान समय में वायुमंडल में कार्बन युक्त गैसों की सांद्रता ऐतिहासिक रूप से उच्च स्तर पर पहुंच चुकी है। यह वृद्धि मुख्यतः जीवाश्म ईंधनों के दहन, वनों की कटाई और औद्योगिक प्रक्रियाओं के कारण हुई है। परिणामस्वरूप, पृथ्वी की सतह, महासागरों और वायुमंडल का तापमान निरंतर बढ़ रहा है। वन इस संतुलन को बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वृक्ष प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम से वायुमंडल से कार्बन युक्त गैसों को अवशोषित करते हैं और प्राणवायु का उत्सर्जन करते हैं। तापमान वृद्धि का सीधा प्रभाव वनों की संरचना और उनकी जैव विविधता पर पड़ता है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, तापमान में वृद्धि के कारण अनेक वृक्ष प्रजातियां अपने पारंपरिक आवास क्षेत्रों से विस्थापित हो रही हैं। वे ऊंचाई वाले या ठंडे क्षेत्रों की ओर प्रवास कर रही हैं, जिससे वन पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन उत्पन्न हो रहा है।
वनाग्नि की घटनाओं में वृद्धि भी तापमान वृद्धि का एक गंभीर परिणाम है। उच्च तापमान, कम आर्द्रता और सूखे की स्थिति वनों को अत्यधिक ज्वलनशील बना देती है। एक बार आग लगने पर यह तेजी से फैलती है और विशाल क्षेत्रों को नष्ट कर देती है। इन आगों के कारण न केवल वृक्षों की हानि होती है, बल्कि वायुमंडल में बड़ी मात्रा में कार्बन युक्त गैसें भी उत्सर्जित होती हैं, जो तापमान वृद्धि को और बढ़ाती हैं। वन्यजीवों पर इसका प्रभाव अत्यंत गंभीर है। प्रत्येक जीव की एक तापीय सीमा होती है, जिसके भीतर वह जीवित रह सकता है। जब तापमान इस सीमा से बाहर जाता है, तो उनके शरीर की जैव-रासायनिक क्रियाएं प्रभावित होती हैं।
जल स्रोतों का सूखना इस संकट को और गहरा करता है। जंगलों में रहने वाले जीव जल के लिए लंबी दूरी तय करने को विवश हो जाते हैं, जिससे उनका जीवन और अधिक संकटग्रस्त हो जाता है। यह स्थिति कई बार मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष को जन्म देती है, जो दोनों के लिए हानिकारक है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह स्पष्ट है कि पृथ्वी का पर्यावरण एक जटिल और संतुलित तंत्र है। इसमें वन और वन्यजीव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वन वायुमंडल से हानिकारक तत्वों को अवशोषित करते हैं और जीवनदायी वायु प्रदान करते हैं। वे वर्षा चक्र को संतुलित रखते हैं और जल स्रोतों को संरक्षित करते हैं। वन्यजीव इस तंत्र की दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वे बीजों के प्रसार में सहायक होते हैं, जिससे नए वृक्षों का जन्म होता है। वे खाद्य श्रृंखला का हिस्सा होते हैं, जिससे विभिन्न जीवों की संख्या संतुलित रहती है। यदि यह संतुलन बिगड़ता है, तो इसका प्रभाव पूरे पर्यावरण पर पड़ता है।
तापमान वृद्धि के कारण जल स्रोतों का सूखना भी वन्यजीवों के लिए एक बड़ी चुनौती है। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह ज्ञात हुआ है कि वैश्विक ताप वृद्धि के साथ-साथ वर्षा के पैटर्न में भी परिवर्तन हो रहा है। इससे अनेक क्षेत्रों में सूखे की स्थिति उत्पन्न हो रही है, जिससे जल स्रोत समाप्त हो रहे हैं। जल के अभाव में वन्यजीवों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे उनकी ऊर्जा खपत बढ़ती है और वे अधिक जोखिम में आ जाते हैं।
जैव विविधता के संदर्भ में भी यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि वर्तमान समय में प्रजातियों के विलुप्त होने की दर प्राकृतिक दर से कई गुना अधिक हो गई है। यह संकेत करता है कि हम एक ऐसे कालखंड में प्रवेश कर चुके हैं, जहां व्यापक स्तर पर जैव विविधता का ह्रास हो रहा है। समाधान के स्तर पर हमें बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है। सबसे पहले, वनों का संरक्षण और विस्तार आवश्यक है।
वृक्षारोपण केवल संख्या बढ़ाने का प्रयास नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लगाए गए वृक्ष दीर्घकाल तक जीवित रहें और पारिस्थितिक संतुलन में योगदान दें। इसमें समाज और शासन की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। पर्यावरण संरक्षण के लिए कठोर नियम बनाए जाने चाहिए और उनका पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। शिक्षा के माध्यम से लोगों में जागरूकता फैलाना आवश्यक है, ताकि वे अपने कर्तव्यों को समझ सकें। युवा पीढ़ी इस परिवर्तन की आधारशिला बन सकती है। उनकी ऊर्जा, नवाचार और समर्पण इस अभियान को सफल बना सकते हैं। यदि युवा इस दिशा में आगे बढ़ें, तो निश्चित ही एक सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
