नया समझौता भारत-रूस मैत्री का अहम पड़ाव
भारत और रूस के बीच हुए अहम समझौते के तहत अब दोनों देश एक-दूसरे के देश में तीन हजार सैनिकों के अतिरिक्त 10 लड़ाकू विमान, पांच युद्धपोत तैनात कर सकेंगे।
रूस, भारत का स्वाभाविक मित्र है। जब भी भारत पर किसी भी तरह का संकट आया, रूस ने संकटमोचक की भूमिका अदा की। रूस को अपने पाले में करने के लिए पाकिस्तान ने एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है, लेकिन भारत और रूस के बीच हुए एक अहम समझौते ने न सिर्फ पाकिस्तान को परेशान कर दिया है, बल्कि चीन और अमेरिका जैसे देश भी सकते में हैं। अमेरिका तो कभी नहीं चाहता कि रूस और भारत की दोस्ती बनी रहे। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो इस दोस्ती को खत्म कराने के लिए एक के बाद एक चाल चली, लेकिन वे कामयाब नहीं हुए। भारत की रूस से दोस्ती और गहरी हो गई।
भारत और रूस के बीच हुए अहम समझौते के तहत अब दोनों देश एक-दूसरे के देश में तीन हजार सैनिकों के अतिरिक्त 10 लड़ाकू विमान, पांच युद्धपोत तैनात कर सकेंगे। दशकों पुराने दोनों रणनीतिक साझेदारों के बीच हुआ ये ऐतिहासिक करार से पाकिस्तान के हुक्मरान चिंतित हैं। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस वक्त क्वाड और नाटो की तर्ज पर ही इस्लामिक नाटो का खाका खींचने में लगे हुए हैं। उनके इस प्लान को तुर्किए, मिश्र और सऊदी अरब ने समर्थन दिया है। इससे भारत की चिंता बढ़ी है।
पाकिस्तान के दोगलेपन का जो इतिहास है, उससे यह सभी को पता है कि इस्लामिक नाटो यदि बन भी जाता है, तो बहुत दिन तक टिक नहीं पाएगा, क्योंकि पाकिस्तान स्वार्थी देश है और जहां उसे लगेगा कि इस गठबंधन से उसका आर्थिक नुकसान हो रहा है, तो वह तुरंत बाहर भी आ जाएगा। पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच नाटो की तरह ही पिछले वर्ष समझौता हुआ था। इसके तहत इनमें से किसी भी देश पर हमला दोनों देशों पर हमला माना जाएगा, लेकिन ईरान द्वारा सऊदी अरब पर की गई बमबारी के दौरान पाकिस्तानी सेना चुप रही। उसने सऊदी अरब की तरफ से ईरान को कोई जवाब नहीं दिया।
भारत और रूस के बीच लॉजिस्टिक्स सपोर्ट के पारस्परिक आदान-प्रदान के इस समझौते से अब पूरी दुनिया को पता लग गया है कि यह दोस्ती अटूट है। उसे न तो ट्रंप टैरिफ रूपी हथियार से तोड़ पाएंगे न ही चीन, रूस पर दबाव बनाकर खत्म करा पाएगा। पाकिस्तानी एक्सपर्ट तो अब यहां तक कहने लगे हैं कि रूस, भारत पर दांव लगाकर बेवकूफी कर रहा है, हालांकि पाकिस्तानी एक्सपर्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति के कायल नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि भारत बड़ी ही खूबसूरती से अमेरिकी निवेश, रूस के हथियार और चीन के उत्पाद एक साथ चाहता है और इसमें सफल भी हो रहा है।
रूस की चीन के साथ पारंपरिक दोस्ती है। कई मौकों पर चीन ने रूस की मदद भी की है। ऐसे में अब पाकिस्तान को यह लग रहा है कि कहीं चीन और भारत के कड़वाहट भरे दिन दूर न हो जाएं। अगर चीन और भारत की दोस्ती रूस के जरिए और गहरी होती है, तो इसका नुकसान पाकिस्तान को ज्यादा होगा। भारत में इसी साल होने वाली ब्रिक्स देशों की बैठक में चीनी राष्ट्रपति के भी आने की उम्मीद है। गलवान घाटी में हुई झड़प के बाद दोनों देशों के बीच कड़वाहट आई थी, लेकिन अब धीरे-धीरे वह खत्म हो रही है। इसमें रूस भी बहुत हद तक दोनों देशों की मदद कर रहा है।
चीन नहीं चाहता था कि रूस और भारत के बीच यह समझौता हो, लेकिन इस समझौते पर उसने किसी तरह की कोई प्रतिक्रिया भी नहीं दी है, क्योंकि वह भारत से बिगड़ चुके रिश्ते को बहाल करने में लगा हुआ है। इस समझौते से अब भारत, रूस के मुरमांस्क और सेवेरोमोर्स्क में स्थित बड़े बंदरगाहों का उपयोग आसानी से कर सकेगा। यह समझौता सामरिक दृष्टि से भी दोनों देशों के लिए बड़ा मददगार होगा। रूस को हिंद महासागर में भारतीय नौसेना से लॉजिस्टिक्स सहयोग मिलेगा। इससे रूस को ईंधन भरने, मरम्मत, कलपुर्जे और अन्य सहायता मिलने में आसानी होगी। यह समझौता दोनों देशों को लंबी दूरी के अभियानों में पैसे और समय की बचत करने में मदद भी करेगा।
इंडो-रशियन रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट’ फरवरी 2025 में हुआ था, जो अब पूरी तरह से लागू हो गया है। इसके तहत दोनों देशों की सेनाएं संयुक्त सैन्य अभ्यास, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और मानवीय सहायता अभियानों में संयुक्त रूप से शामिल होंगी। यह केवल सैन्य तैनाती तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें लॉजिस्टिक सहयोग का भी प्रावधान किया गया है। दोनों देश युद्धपोतों को बंदरगाह सेवा, मरम्मत सुविधा, पानी, भोजन और अन्य तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराने के साथ ही सैन्य विमानों के लिए एयर ट्रैफिक कंट्रोल, उड़ान से जुड़ी सूचनाएं, नेविगेशन सिस्टम का उपयोग, पार्किंग और सुरक्षा जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध कराएंगे।
भारत रूस से सर्वाधिक हथियारों की आपूर्ति करता है। अगर इतिहास की बात करें तो रूस हर मौके पर भारत के साथ खड़ा रहा है। 1971 में जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ, तो ब्रिटेन-अमेरिका जैसे देश भारत के विरुद्ध खड़े हो गए थे। उस समय सोवियत संघ (रूस) ही था, जिसने सीना तानकर भारत की मदद का न सिर्फ एलान किया, बल्कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों को स्पष्ट रूप से कहा कि यदि किसी ने पाकिस्तान की सैन्य मदद करने की कोशिश की तो वह भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ेगा।
यहां तक संयुक्त राष्ट्र संघ में भी रूस ने वीटो करके भारत को राजनयिक सुरक्षा प्रदान की थी। रूस की सक्रियता के कारण ही चीन, पाकिस्तान की मदद नहीं कर पाया था, जबकि पाकिस्तान को उम्मीद थी कि ब्रिटेन, अमेरिका और चीन उसके पक्ष में भारत के विरुद्ध हमले करेंगे। विदेशी मामलों के कुछ जानकार कहते हैं कि भारत और रूस के बीच कई और सामरिक समझौते जल्द होंगे, जो दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूत करेंगे।
