प्रसंगवश : स्वच्छता अभियान ने बदली है गांवों की तस्वीर
स्वच्छता किसी भी समाज की बुनियादी पहचान होती है। यह केवल स्वास्थ्य से नहीं, बल्कि सामाजिक विकास और सम्मान से भी जुड़ी होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता का स्तर किसी जिले के समग्र विकास का आईना होता है। अधिकांश ग्रामीण इलाकों में खुले में शौच एक आम समस्या थी। गांवों की गलियों और खेतों के आसपास गंदगी फैली रहती थी, जिससे मलेरिया, डायरिया और टाइफाइड जैसी बीमारियों का खतरा बना रहता था, लेकिन वर्ष 2014 में स्वच्छ भारत मिशन लागू होने के बाद से इस स्थिति में धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिला है।
स्वच्छ भारत मिशन ने ग्रामीण क्षेत्र में अहम किरदार अदा किया है, जिसके तहत सरकार द्वारा प्रत्येक पात्र परिवार को शौचालय निर्माण के लिए 12,000 रुपये की सहायता राशि प्रदान की जाती है। इस राशि में केंद्र और राज्य सरकार का संयुक्त योगदान होता है, जिसमें लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत हिस्सा राज्य सरकार का होता है। इस सहायता राशि ने गरीब और निम्न आय वर्ग के परिवारों को अपने घर में शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित किया। दूसरी ओर अब गांवों की सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर पहले की तुलना में कम गंदगी दिखाई देती है। लोग घर के आसपास साफ-सफाई बनाए रखने के लिए प्रेरित हुए हैं।
केंद्र और राज्य सरकार ने स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए कई अन्य योजनाएं भी लागू की हैं। स्वच्छ भारत मिशन के दूसरे चरण में अब केवल शौचालय निर्माण ही नहीं, बल्कि ठोस और तरल कचरा प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसके तहत गांवों में कचरा संग्रहण केंद्र, कम्पोस्ट गड्ढे और प्लास्टिक कचरा प्रबंधन इकाइयों के निर्माण के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है। छोटे गांवों के लिए प्रति व्यक्ति लगभग 60 रुपये तक ठोस कचरा प्रबंधन और 280 रुपये तक गंदे पानी के प्रबंधन के लिए सहायता दी जाती है। इससे गांवों में स्वच्छता बनाए रखने की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित हो रही है।
वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में भी स्वच्छता को एक महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया है। इस बजट में स्वच्छ भारत मिशन के लिए कुल लगभग 9,692 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिसमें ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम के लिए 7,192 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता बनाए रखने के लिए यह राशि महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
गांव के विद्यालयों और आंगनबाड़ी केंद्रों में शौचालय निर्माण होने से बच्चों, विशेषकर लड़कियों की उपस्थिति में भी सुधार हुआ है। इससे न केवल स्वच्छता बढ़ी है, बल्कि शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। इसके बावजूद चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। कई बार शौचालय बनने के बाद भी उसका नियमित उपयोग नहीं किया जाता या उसकी साफ-सफाई पर ध्यान नहीं दिया जाता। इसी प्रकार कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए पर्याप्त संसाधनों और तकनीकी ज्ञान की कमी भी एक बड़ी समस्या है। ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी और पुराने व्यवहार भी इस दिशा में बाधा बनते हैं, इसलिए केवल सरकारी योजनाएं ही नहीं, बल्कि सामुदायिक सहभागिता भी इस अभियान की सफलता के लिए आवश्यक है।
यदि देश के सभी गांवों को शत-प्रतिशत स्वच्छ और ODF बनाना है, तो कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, हर घर में शौचालय निर्माण सुनिश्चित करने के साथ-साथ उसके नियमित उपयोग की आदत विकसित करनी होगी। दूसरे, गांव स्तर पर कचरा प्रबंधन की स्थायी व्यवस्था स्थापित करनी होगी, जिसमें कूड़े को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर उसका उचित निस्तारण किया जाए। तीसरे, स्कूलों और पंचायतों के माध्यम से लगातार जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, ताकि स्वच्छता को केवल एक योजना नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा बनाया जा सके। (यह लेखिका के निजी विचार हैं)
