‘जनसांख्यिकीय लाभ’ की थ्योरी और बेरोजगारी

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Published By Virendra Pandey
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फोटो कुमार सिद्धार्थ
कुमार सिद्धार्थ, वरिष्ठ पत्रकार
 
अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा जारी रिपोर्ट केवल तथ्‍यों का संकलन नहीं, बल्कि उस संकट का दस्तावेजी‍करण है, जिसमें आज का शिक्षित युवा जूझ रहा है। उसके पास उपाधियां हैं, आकांक्षाएं हैं, सपने हैं, लेकिन अवसर सीमित हैं।

भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। यह तथ्य अक्सर गर्व के साथ दोहराया जाता है कि देश की बड़ी आबादी कार्यशील आयु वर्ग में है और यही भारत के विकास की सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन जब यही युवा, खासकर शिक्षित युवा, रोजगार के लिए भटकते नजर आते हैं, तब यह ‘जनसांख्यिकीय लाभ’ एक कठिन प्रश्न बनकर सामने खड़ा हो जाता है। हाल ही में जारी ‘भारत में कामकाज की स्थिति-2026’  रिपोर्ट ने इस जटिल वास्तविकता को ठोस तथ्यों के साथ सामने रखा है और देश के युवाओं की शिक्षा, रोजगार और श्रम बाजार से जुड़े कई अहम रुझानों को रेखांकित किया है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी द्वारा जारी रिपोर्ट केवल तथ्यों का संकलन नहीं, बल्कि उस संकट का दस्तावेजी‍करण है, जिसमें आज का शिक्षित युवा जूझ रहा है। उसके पास उपाधियां हैं, आकांक्षाएं हैं, सपने हैं, लेकिन अवसर सीमित हैं।

पिछले चार दशकों में भारत में उच्च शिक्षा का दायरा तेजी से बढ़ा है। विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और तकनीकी संस्थानों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। इस रिपोर्ट के अनुसार, उच्च शिक्षा में नामांकन दर अब 28 फीसदी तक पहुंच चुकी है और इसमें लड़कियों की भागीदारी खासतौर पर बढ़ी है, हालांकि पुरुषों के नामांकन में गिरावट दर्ज की गई है। यह वर्ष 2017 के 38 फीसदी से घटकर वर्ष 2024 के अंत तक 34 फीसदी रह गई है। इसके पीछे मुख्य वजह यह है कि युवा वयस्क अपने परिवार की जरूरत को पूरा करने के लिए कमाने के अवसर तलाशने लगते हैं।

यह बदलाव सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह संकेत देता है कि शिक्षा अब समाज के व्यापक वर्गों तक पहुंच रही है, लेकिन इस प्रगति के साथ एक गहरी विडंबना भी जुड़ी है- शिक्षा बढ़ तो रही है, लेकिन रोजगार के अवसर उसी अनुपात में नहीं बढ़ पा रहे हैं। रिपोर्ट बताती है कि 20 से 29 वर्ष के 6.3 करोड़ स्नातकों में से लगभग 1.1 करोड़ बेरोजगार हैं। यह युवा रोजगार की वास्तविकता है, जो वर्षों की पढ़ाई के बाद भी रोजगार से वंचित हैं। रिपोर्ट बताती है कि युवाओं को जो नौकरियां मिलती भी हैं, वह अक्सर अस्थायी, कम वेतन वाली या कौशल के अनुरूप नहीं होतीं। स्नातक होने के एक वर्ष के भीतर केवल सात फीसदी युवाओं को ही स्थायी वेतन वाली नौकरी मिल पाती है।

यह धारणा लंबे समय तक बनी रही कि शिक्षा ही बेरोजगारी से मुक्ति का रास्ता है, लेकिन आज स्थिति उलट दिखती है। रिपोर्ट के अनुसार, 15 से 25 वर्ष के स्नातकों में बेरोजगारी दर लगभग 40 फीसदी है, जबकि 25 से 29 वर्ष के युवाओं में यह करीब 20 फीसदी है। यह स्थिति एक संकेत है कि शिक्षा और रोजगार के बीच का संबंध कमजोर हो गया है। डिग्री/उपाधि होने के बावजूद नौकरी नहीं मिलना युवाओं में निराशा और असंतोष को जन्म देता है। आज के युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि ‘अधूरा रोजगार’ भी है। बड़ी संख्या में युवा ऐसे काम कर रहे हैं, जो उनकी शिक्षा और कौशल के अनुरूप नहीं हैं। कई इंजीनियर डिलीवरी का काम कर रहे हैं, स्नातक डाटा एंट्री या अस्थायी अनुबंधों पर निर्भर हैं। यह केवल व्यक्तिगत हानि नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संसाधनों की भी बर्बादी है। जिस शिक्षा पर इतना निवेश किया गया, वह अपेक्षित उत्पादकता में परिवर्तित नहीं हो पा रही है।

रिपोर्ट इस ओर भी इंगित करती है कि केवल शिक्षा का विस्तार पर्याप्त नहीं है, उसकी गुणवत्ता और उपयोगिता भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सन् 2010 से 2021 के बीच प्रति लाख युवाओं पर कॉलेजों की संख्या 29 से बढ़कर 45 हो गई है। औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) की संख्या में भी लगभग 300 फीसदी की वृद्धि हुई है। इसके बावजूद क्षेत्रीय असमानताएं बनी हुई हैं और शिक्षकों की कमी एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आई है। निर्धारित मानकों के मुकाबले निजी और सरकारी कॉलेजों में शिक्षक-छात्र अनुपात काफी अधिक है, लेकिन इन संस्थानों से निकलने वाले युवाओं के पास वह कौशल नहीं है, जिसकी मांग उद्योगों में है। यह स्थिति बताती है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था अभी भी ‘डिग्री केंद्रित’ है, न कि ‘कौशल केंद्रित’।

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि उच्च शिक्षा में गरीब परिवारों की भागीदारी बढ़ी है, जो वर्ष 2007 के आठ फीसदी से बढ़कर 2017 में 15 फीसदी हो गई है, हालांकि यह एक सकारात्मक परिवर्तन दिखता है, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठता है कि क्या इन युवाओं को शिक्षा के बाद समान अवसर मिल रहे हैं?

महंगे पेशेवर पाठ्यक्रम अब भी संपन्न वर्ग के लिए अधिक सुलभ हैं। परिणामस्वरूप, बेहतर वेतन और स्थायी रोजगार के अवसर भी उसी वर्ग तक सीमित रह जाते हैं। इस प्रकार शिक्षा में समानता बढ़ने के बावजूद रोजगार में असमानता बनी रहती है। भारत की अर्थव्यवस्था में भी बदलाव हो रहा है। युवा कृषि से हटकर सेवा और विनिर्माण क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं। सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी), मोटर वाहन और व्यावसायिक सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है, जबकि पेशेवर क्षेत्र में जाति एवं स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव कम हुआ है, लेकिन इन क्षेत्रों में भी रोजगार सृजन की गति अपेक्षित नहीं है। एक ओर उच्च कौशल वाली नौकरियां सीमित हैं, दूसरी ओर कम कौशल वाले कार्यों में अस्थिरता और कम वेतन की समस्या है। यह असंतुलन युवाओं के सामने एक कठिन स्थिति पैदा करता है। वे न तो पूरी तरह रोजगार पा रहे हैं,और न ही अपने कौशल का सही उपयोग कर पा रहे हैं।

देश के पास सीमित वक्त है, जिसमें वह अपने जनसांख्यिकीय लाभ को आर्थिक विकास में बदल सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष  2030 के बाद कामकाजी आयु वर्ग की आबादी का अनुपात घटने लगेगा। इसका मायने है कि आने वाले कुछ वर्षों में रोजगार सृजन को गति देना आवश्यक है। यदि यह अवसर चूक गया, तो बड़ी संख्या में बेरोजगार और असंतुष्ट युवा सामाजिक और आर्थिक संकट का कारण बन सकते हैं।


(यह लेखक के निजी विचार हैं)