‘सामूहिक एकांत’ की तरफ बढ़ता समाज
आज किसी भी घर का दृश्य देखें तो एक अजीब-सा ‘सामूहिक एकांत’ दिखाई देता है। लोग साथ बैठते हैं, परंतु प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी स्क्रीन में डूबा रहता है।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा अभिभावकों से यह अपील कि बच्चे मोबाइल की लत से दूर रहें, हमारे समय की एक गहरी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक चिंता को सामने लाती है। यह उस दौर का संकेत है, जहां दुनिया ‘ग्लोबल विलेज’ से सिमटकर सचमुच ‘डिजिटल हथेली’ में आ गई है। आज सूचना, मनोरंजन और संवाद- सब कुछ एक क्लिक की दूरी पर उपलब्ध है। कभी ज्ञान के लिए पुस्तकालयों की शरण लेनी पड़ती थी, संवाद के लिए पत्र लिखे जाते थे और मनोरंजन सामूहिक अनुभव हुआ करता था। आज यह सब एक छोटे से स्क्रीन में समाहित है। इस सुविधा ने जीवन को सरल अवश्य बनाया है, लेकिन इसके साथ एक सूक्ष्म परिवर्तन भी हमारे भीतर प्रवेश कर चुका है। हमारी चेतना, धैर्य और उस गहरे संतोष में, जो मानसिक संतुलन का आधार होता है।
आज किसी भी घर का दृश्य देखें तो एक अजीब-सा ‘सामूहिक एकांत’ दिखाई देता है। लोग साथ बैठते हैं, परंतु प्रत्येक व्यक्ति अपनी-अपनी स्क्रीन में डूबा रहता है। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क की जैविक प्रवृत्तियों के सुनियोजित दोहन का उदाहरण है। हमारे मस्तिष्क में ‘डोपामिन’ नामक रसायन हमें नई उत्तेजनाओं और पुरस्कारों की ओर आकर्षित करता है। जब भी हमें कोई नई या सुखद अनुभूति मिलती है- प्रशंसा, उपलब्धि या अचानक मिला आनंद—डोपामिन सक्रिय होता है और मस्तिष्क उसी अनुभव को दोहराने की इच्छा करता है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स ने इसी तंत्र को अपनी संरचना का आधार बना लिया है। कुछ सेकेंड के छोटे वीडियो या ‘रील्स’ बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के बार-बार नई उत्तेजना प्रदान करते हैं। एक वीडियो समाप्त होते ही मस्तिष्क अगले ‘डोपामिन शॉट’ की अपेक्षा करने लगता है और इस तरह एक अंतहीन क्रम शुरू हो जाता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति अनजाने में घंटों स्क्रीन पर स्क्रॉल करता रहता है। यह अनुभव उस मृगतृष्णा के समान है, जिसमें दूर से चमकता पानी दिखाई देता है, लेकिन पास पहुंचने पर वह केवल रेत साबित होता है। समय के साथ यह त्वरित मनोरंजन आनंद के बजाय थकान, बेचैनी और एक प्रकार के आंतरिक खालीपन में बदलने लगता है, फिर भी मन उसी चक्र का अभ्यस्त हो जाता है।
इस निरंतर उत्तेजना का सबसे गहरा प्रभाव हमारी एकाग्रता पर पड़ता है। मानव मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से गहराई में जाकर विचार करने और किसी विषय को समझने की क्षमता रखता है, लेकिन जब उसे हर कुछ सेकंड में नया दृश्य, नई ध्वनि और नई सूचना मिलने की आदत पड़ जाती है, तो उसके लिए ठहरकर सोचना कठिन हो जाता है। परिणामस्वरूप लंबी पुस्तकें, गंभीर लेख और गहन चिंतन उबाऊ प्रतीत होने लगते हैं। विभिन्न अध्ययनों में भी यह संकेत मिला है कि बढ़ते स्क्रीन समय के साथ ध्यान अवधि में गिरावट आई है। यह केवल समय की बर्बादी का प्रश्न नहीं, बल्कि हमारी आलोचनात्मक सोच, निर्णय क्षमता और बौद्धिक परिपक्वता पर भी प्रभाव डालता है।
यहीं पर डिजिटल युग का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। हमारे पास उत्तेजना के साधन पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन संतोष का स्तर घटता जा रहा है। इसे समझने के लिए डोपामिन और सेरोटोनिन के अंतर को देखना उपयोगी है। डोपामिन त्वरित उत्तेजना और पुरस्कार से जुड़ा है, जबकि सेरोटोनिन स्थिरता, संतुलन और गहरे संतोष से संबंधित है। डिजिटल संसार मुख्यतः डोपामिन आधारित अनुभव प्रदान करता है, इसलिए वह हमें लगातार नई उत्तेजनाओं की ओर खींचता है।
इसके विपरीत, वे अनुभव जो मनुष्य को भीतर से समृद्ध करते हैं, जैसे प्रकृति के बीच समय बिताना, किसी के साथ गहरी बातचीत करना, कोई कला सीखना या शांत होकर अपने विचारों के साथ समय बिताना, ये सेरोटोनिन से जुड़े होते हैं। इन अनुभवों में त्वरित आकर्षण नहीं होता, लेकिन वे धीरे-धीरे मन को स्थिर और संतुष्ट बनाते हैं। विडंबना यह है कि आधुनिक जीवन में उत्तेजना के साधन तो बढ़ते जा रहे हैं, परंतु संतोष के स्रोत लगातार कम होते प्रतीत होते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि तकनीक स्वयं में समस्या है। तकनीक मानव बुद्धि की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, जिसने शिक्षा, चिकित्सा, ज्ञान और संचार के क्षेत्र में असंख्य संभावनाएं खोली हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सुविधा धीरे-धीरे आदत में और आदत निर्भरता में बदल जाती है, इसलिए समाधान तकनीक के त्याग में नहीं, बल्कि उसके संतुलित उपयोग में निहित है।
डिजिटल जीवन के बीच कुछ सरल अनुशासन विकसित किए जा सकते हैं, जो मानसिक संतुलन बनाए रखने में सहायक हों। जैसे- भोजन का समय केवल भोजन और संवाद के लिए हो, शयनकक्ष को विश्राम का स्थान बनाए रखा जाए, समय-समय पर ‘डिजिटल उपवास’ किया जाए और दिन का कुछ हिस्सा बिना किसी डिजिटल व्यवधान के रचनात्मक या बौद्धिक गतिविधियों को दिया जाए। बच्चों के संदर्भ में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि उन्हें केवल स्क्रीन से दूर रखने का प्रयास न किया जाए, बल्कि उन्हें खेल, पुस्तक, संगीत और प्रकृति जैसे अनुभवों से जोड़ा जाए, ताकि वे जीवन के वास्तविक आनंद को पहचान सकें।
आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि हम डिजिटल आकर्षण की इस चमकदार दुनिया के बीच भी उस धीमी और गहरी आवाज को सुनते रहें, जो हमें भीतर से संतुलित और सजग बनाती है। यदि हम लगातार उत्तेजना के शोर को अपने भीतर हावी होने देंगे, तो वह हमारे धैर्य, हमारी गहराई और हमारी मानवीय संवेदनाओं को प्रभावित करेगा, परंतु यदि हम सजगता के साथ तकनीक का उपयोग करें, तो वही तकनीक ज्ञान, सृजन और सार्थक संवाद का माध्यम बन सकती है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
